मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब के देखत ग्रास जो कीन्हा । तासों कहैं मुक्ति हरि दीन्हा ॥
शिशुपाल का संहार भी किया । इतने लोग मारे गये । यह सब देखते हुए भी जीवों को काल का स्वभाव पता न चला । दुनिया ने इसे मुक्ति मान लिया । मारे जाने पर दुनिया कहती है कि प्रभु ने मुक्ति दे दी ।
काल सबन को ग्रास्यो, वचन कह्यो समुझाय ॥
कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥
साहिब कह रहे हैं कि काल सबको ग्रसित कर लेता है, सबको मार डालता है, सबको खा जाता है । मैं कैसे समझाऊँ, कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता है ।
ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥
तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥
जिस तरह कोई स्त्री पतिव्रत धर्म को छोड़कर दूसरे से प्रेम करती है, ऐसे ही यह संसार परम-पुरुष की भक्ति को छोड़ काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है । नाम के बिना यह जीव कैसे पार हो सकता है !
भूल परी सब दुनिया, पाखंड के व्यवहार ॥
मूल छाड़ि डारै गहै, कैसे उतरे पार ॥
सारी दुनिया पाखण्ड के व्यवहार में भूली हुई है और मूल को छोड़कर डालियों को पकड़े हुए हैं; फिर पार कैसे हो सकती है !
तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिल व्यवहारा ॥
पांडव पाँच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥
मारन तासु को मतौ विचारा । पांडव कौरव नृप दोइ मारा ॥
दोनों में छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहिं जाना ॥
बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहाँ आई ॥
राजा द्रुपद स्वयंबर ठाना । तहाँ पारथ राहू संघाना ॥
दुर्योधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥
कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पाँच पति भावा ॥
तेहि मारन हेर मतौ विचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥