भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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सब के देखत ग्रास जो कीन्हा । तासों कहैं मुक्ति हरि दीन्हा ॥

शिशुपाल का संहार भी किया । इतने लोग मारे गये । यह सब देखते हुए भी जीवों को काल का स्वभाव पता न चला । दुनिया ने इसे मुक्ति मान लिया । मारे जाने पर दुनिया कहती है कि प्रभु ने मुक्ति दे दी ।

काल सबन को ग्रास्यो, वचन कह्यो समुझाय ॥

कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥

साहिब कह रहे हैं कि काल सबको ग्रसित कर लेता है, सबको मार डालता है, सबको खा जाता है । मैं कैसे समझाऊँ, कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता है ।

ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥

तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥

जिस तरह कोई स्त्री पतिव्रत धर्म को छोड़कर दूसरे से प्रेम करती है, ऐसे ही यह संसार परम-पुरुष की भक्ति को छोड़ काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है । नाम के बिना यह जीव कैसे पार हो सकता है !

भूल परी सब दुनिया, पाखंड के व्यवहार ॥

मूल छाड़ि डारै गहै, कैसे उतरे पार ॥

सारी दुनिया पाखण्ड के व्यवहार में भूली हुई है और मूल को छोड़कर डालियों को पकड़े हुए हैं; फिर पार कैसे हो सकती है !

तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिल व्यवहारा ॥

पांडव पाँच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥

मारन तासु को मतौ विचारा । पांडव कौरव नृप दोइ मारा ॥

दोनों में छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहिं जाना ॥

बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहाँ आई ॥

राजा द्रुपद स्वयंबर ठाना । तहाँ पारथ राहू संघाना ॥

दुर्योधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥

कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पाँच पति भावा ॥

तेहि मारन हेर मतौ विचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥