मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंआप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारै ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फाँस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्यनाम नहिं पावै ॥
चारों भाई राजपाट छोड़ सरयू नदी में शरीर त्यागकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गये । फिर इच्छा से दुबारा कृष्ण रूप में जन्म लिया । साहिब कह रहे हैं कि जिस राम को दुनिया जपती है, उनका ऐसा व्यवहार रहा । कई जीव मार दिये गये । यह काल बड़ा ही प्रचंड है, जो त्रिदेव को भी मार देता है । जब तक सत्य नाम की प्राप्ति नहीं हो जाती, जीव काल के जाल से मुक्त नहीं हो सकता है ।
आगे साहिब धर्मदास से कह रहे हैं—
सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊँ । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊँ ॥
कह रहे हैं कि अब मैं तुम्हें कृष्णावतार की बात बताता हूँ ।
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्त्र गोपी निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करें नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरि के गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्या सुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव बैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बल पौरुष जिहिं कै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आँखी ॥