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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

तेरा बैरी मन

तेरा बैरी मन


तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन

इस बात को गंभीरता से लेना होगा। क्या यह मन हमारा बैरी है? यह मन सच में हमारा बैरी है। तो कैसा है यह मन? हम सब इससे बेखबर क्यों हैं? क्या कर रहा है मन? कहाँ रहता है यह मन? मन को क्या पड़ी है हमें परेशान करने की? ये चंद सवाल हैं, जो बड़े अहम हैं। आदमी इनपर चिंतन नहीं कर रहा है।

मन को क्या पड़ी कि हम सबको इतना परेशान कर रहा है? आत्मा को आखिर मन क्यों उलझा रहा है? जैसे मनुष्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, पेट पालने के लिए नौकरी कर रहा है, मेहनत कर रहा है, ऐसे ही मन को क्या पड़ी है? इतना परेशान क्यों कर रहा है? कुछ तो वजह है।

प्रेतात्माएँ किसी में क्यों आती हैं? प्रेतात्माएँ तीन कारण से आती हैं। पहला तो इनको बदला चुकाना होता है। फिर दूसरा, इनकी वृत्तियाँ अच्छी नहीं हैं, विषय-विकारों के लिए आती हैं। एक बात ध्यान में रहे कि जो मर जाता है, उसकी जैसी वृत्तियाँ होंगी, वैसा ही होगा। इस तरह वो पहचान में आयेगा। जो जिस स्वभाव का है, मरने के बाद भी वैसा ही होगा।

पहली बात कि प्रेतात्मा किसी में भी प्रवेश लेती है—बदला लेने के लिए। दूसरा, विकारों के कारण, गंदे काम करने आती हैं। तो तीसरा, उन्हें एक शरीर चाहिए। तब कॉन्शिएस में प्रवेश लेती हैं। इसके लिए वो भोले लोगों के ढूँढ़ती हैं।

...तो मन को क्या पड़ी कि आत्मा को तंग कर रहा है ? जैसे प्रेतात्मा को पिंड़ा चाहिए, ऐसे ही मन को आत्मा चाहिए। नहीं तो कुछ काम नहीं हो पायेगा। वो नहीं चाहता है कि कुछ आत्माएँ निकल जाएँ। वो सावधान है। बेशुमार आत्माएँ हैं। यदि थोड़ी-सी निकल गयीं तो क्या फर्क पड़ता है ? नहीं, फर्क पड़ता है। क्योंकि वो जानता है कि यदि एक भी निकल गया तो कइयों को निकाल ले जायेगा और मेरे लिए खतरा हो जायेगा। इसलिए उलझाता है। यदि आप चिंतन करेंगे तो यह दिखेगा। जैसे शरीर में धड़ दिख रहा है, गर्दन दिख रही है, यह दिखेगा। पर यह चिंतन नहीं करने दे रहा है, किसी भी तरह आत्मा के नजदीक नहीं पहुँचने दे रहा है। इसलिए इस मन से सावधान रहना।

तेरा बैरी कोई नहीं तेरा बैरी मन ॥

मन आपका सबसे बड़ा शत्रु है। आपने घर में पशु रखे होंगे। आजकल वैज्ञानिक युग है; ट्रेक्टर आदि चलते हैं। फिर भी कुछ लोग बैल रखते हैं। बैल को रखने वाले ने उसे जन्म नहीं दिया। फिर क्यों गुलाम बनाकर रखा हुआ है ? न तो उसने बैल को बनाया, न जन्म दिया। फिर क्यों रखा है ? केवल काम करवाने के लिए। यानी अपना काम करवाने के लिए बैल को रखा हुआ है। क्योंकि आप तेज दिमाग के हैं। उसे कैद करके रखा हुआ है। उसे भागने भी नहीं दे रहे हैं। वो भागना भी चाहता होगा। आखिर क्यों नहीं भागने दे रहे हैं आप ? अपने मतलब के लिए।

कुछ ने गाय रखी होती है। बाँधकर रखी होती है। क्योंकि दूध चाहिए। वो बेचारी जाना चाहती होगी, पर वो नहीं जाने देते हैं। रखने वाले ने गाय को जन्म नहीं दिया; बनाया भी नहीं। पर रस्सों से अच्छी तरह से बाँधकर रखा है। वो कभी भाग जाती है तो दूँढ़कर फिर पकड़ लाते हैं और बाँध देते हैं।

बैल को कोई अपने शिकंजे से निकलने नहीं देता है। बैल की कोई पेश नहीं चलती है। वो अपने आप को छुड़ा नहीं पाता होगा। डंडे

भी पड़ते होंगे बैल को। वो रस्सों से बाँधा रहता है। इसी तरह आत्मा को भी एक मतलब के लिए मन ने बाँधा हुआ है। इस पर साहिब कह रहे हैं—

सध्याद के काबू में हैं सब जीव बेचारे॥

कह रहे हैं कि दुनिया के सब जीव एक शैतानी ताकत के हाथ में हैं। एक गीत सुना है—

जिंदगी क्या है, गम का दरिया है।
ना जीना यहाँ बस में, ना मरना यहाँ बस में॥

कुछ लोग हैं कि जीना नहीं चाहते हैं, पर जीना पड़ता है। कुछ लोग हैं कि जीना चाहते हैं, पर मरना पड़ता है। इसका मतलब है कि सब किसी शैतानी ताकत के हाथ में नाच रहे हैं। पर विडंबना यह है कि सभी उस शैतानी ताकत को परमात्मा की संज्ञा दे रहे हैं। तभी तो साहिब कह रहे हैं—

जो रक्षक तहँ चीहनत नाहीं, जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं॥

साहिब ने बड़ी क्रांति लाई। जो अपना है, जिसकी सुरति करनी चाहिए, जिसकी भक्ति करनी चाहिए, उसकी कोई नहीं कर रहा है। जो भक्षक है, जो वैरी है, सब उसी की सुरति कर रहे हैं, सब उसी की भक्ति कर रहे हैं।

साहिब ने पूरे समीकरण बदल दिये। कह रहे हैं—

गण गंधर्व ऋषि मुनि अरु देवा, सब मिल लाग मनहिं की सेवा॥

यानी परमात्मा की सेवा में कोई नहीं लगा है। सब किसी शैतानी ताकत, जिसे मन कहा जाता है, को माने जा रहे हैं।

जस नट मरकट को दुख देई। नाना नाच नचावन लेई॥

जैसे बंदर बाजीगर के इशारों पर नाचता है, यह आत्मदेव भी दुनिया में ऐसे ही काम कर रहा है।

कुछ ने बाजीगर का खेल देखा होगा। मैंने भी देखा। मैं छोटेपन से ही बड़ों के साथ बैठता था, बच्चों के साथ नहीं, क्योंकि उनकी शरारतें

करना मुझे पसंद नहीं था। तो हमारे गाँव में मदारी आया; उसने डमरू बजाया। पहले भीड़ को इकट्ठा करने के लिए उसने अपना डमरू बजाया। सब बच्चे इकट्ठा हुए; अन्य लोग भी इकट्ठा हुए। मैंने भी सोचा कि देखते हैं, क्या करता है! उसने पिठरे में एक काठ रखी थी। कुछ सामान उसने गठरी में बाँधकर एक तरफ रखा तो कुछ दूसरी तरफ। उसके कंधे पर एक बंदर बैठा था। उसने सबसे कहा कि यह बंदर बड़ा बुद्धिमान है; जो कहो, वो करता है। आज यह आपको दिखायेगा कि ससुराल में कैसे जाते हैं। उसने बंदर को पैंट, शर्ट और टोपी पहना रखी थी। लेकिन था वो बंदर ही। पहले ज़माने में आदमी लाठी में एक गठरी बाँधता था। वो लाठी कंधे पर रखकर जाता था। लाठी को बड़ा हथियार मानते थे। नदी-नालों को पार करने में भी आसानी हो जाती थी और कोई चोर आ जाए, तो भी काम आती थी। तो लोग पास में रखते थे।

तो बंदर को अब दो पाँव पर चलकर ससुराल जाने का डरामा करना था। कुत्ता और बंदर दो पाँवों पर नहीं चल पाते हैं; उन्हें दिक्कत होती है। वो दिन-भर तमाशा दिखाता होगा। उस दिन उसका मूड ठीक नहीं था। मदारी ने एक मूढ़ा एक तरफ रखा, एक दूसरी तरफ, कहा कि यह अब वहाँ जायेगा। बंदर ने बंदर की तरह छलाँग लगाई और वहाँ जाकर बैठ गया। ऐसे में तो पैसा मिलना नहीं था। मदारी ने उसे इशारे में कहा कि ऐसे नहीं, इंसान की तरह चलकर जा। उसने फिर बंदर को तमाशा दिखाने को कहा। बंदर फिर दो कदम चला और फिर बंदर की तरह छलाँग लगाकर वहाँ बैठ गया। मदारी ने उसे चार सोटियाँ लगाई। बंदर तिलमिला उठा। बच्चे हँसने लगे। मैं गंभीर था। मैंने सोचा कि यह कितना ज़ालिम है; उसे पीड़ा हुई है। अपनी-अपनी सोच है न! तो मदारी ने उसे कहा कि बीड़ी पी। वो बंदर कुछ नहीं कर रहा था। उसे ससुराल में जाकर पानी भी पीना था, बीड़ी भी पीनी थी। पानी का गिलास उसने फेंक दिया, बीड़ी भी फेंक दी। मदारी ने फिर सोटी उठाई और दी 4-5। वो दिन भर बीड़ी पीता होगा। उस समय उसका मूड नहीं था। जो

भी अधीन है, वो सुखी नहीं है। पर मजबूरी में बंदर ने बीड़ी भी पी। आखिर में मदारी ने जो-जो चाहा, उससे करवाकर छोड़ा, क्योंकि वो अधीन था। पक्का करवाया। साहिब भी कह रहे हैं—

जस नट मरकट को दुख देई। नाना नाच नचावन लेई ॥

मन को क्यों जरूरत पड़ी? साँड को बाँधने की जरूरत पड़ी कि हल चलाना है। कुछ बैलगाड़ी में भी बैल को जोतते हैं; कुछ कोल्हू में लगाते हैं। बहुत काम करवाते हैं बैल से। यू.पी. में बैलों से बड़े काम करवाए जाते हैं।

आत्म-देव को भी निरंजन ने जकड़ा है। आदमी खुद हल नहीं चला सकता है, इसलिए बैल को जकड़ा है। इस तरह निरंजन और माया काम नहीं कर सकते हैं। आत्मा को लगा रखा है। आत्मा से शरीर का सारा काम करवा रहे हैं। आत्मा का शरीर से नाता ही क्या है! यह मन-माया का खेल है। आत्मा कभी चाहती है कि निकलूँ, पर नहीं निकल पाती है। क़तई बैल को कोई नहीं छोड़ना चाहता है। हालाँकि बैल को जन्म नहीं दिया; बनाया नहीं। अच्छा, बैल आदमी के काबू में आया कैसे? पहले-पहले ऐसे आया होगा कि 84 लाख में यह भी था। इसे इंसान ने देखा होगा और पकड़ लिया होगा। गाय को भी पकड़ा होगा। जब कुछ बच्चे हुए होंगे तो दूसरे ने कहा होगा कि मुझे भी एक दो। फिर उसने किसी चीज़ के बदले वो दिया होगा।

हमारे गाँव में हाथियों ने दो आदमियों को मार दिया। वो दिन में नहीं आते हैं। वो रात के समय घरों में घुसकर खाने की चीज़ें लेते हैं और यदि आदमी मिल जाए तो मार देते हैं। तो इंसान उसे अपने मतलब के लिए पकड़ लेता है। अभी भी जंगलों में बड़े हाथी हैं। इंसान कैसे पकड़ता है? बड़ी तरकीब से पकड़ता है। जंगल में एक पेड़ के कुछ दूर सामने एक खड्डा खोदते हैं और उसे छोटी-छोटी लकड़ियों और घास-फूस के साथ ढक देते हैं। पेड़ के साथ एक हथिनी को बाँध देते हैं। हाथी हथिनी को देखकर आता है। उसे कुछ होश नहीं रहता है। वो सीधा उस

खड़े में गिर पड़ता है। खड़ा ज्यादा गहरा नहीं होता है। 10-12 दिन वहाँ रहने दिया जाता है उसे। ऐसे में कमजोर हो जाता है। फिर पेड़ के साथ रस्सी के सहारे से महावत नीचे जाता है। पीछे कुछ रस्सी को पकड़े रखते हैं। वो हाथी को धीरे-धीरे पुचकारता है। उसे रोटी भी देता है। हाथी मान जाता है कि यह भला करने के लिए आया। नहीं, भला नहीं करने आया। इसी तरह से निरंजन अवतार धारण करके आता है तो दुनिया सोचती है कि यही परमात्मा है, हमें बचाने आया है। तो धीरे-धीरे हाथी को पालतू बना देते हैं। फिर उसे खड़े में से बाहर निकालते हैं। क्यों? हाथी को क्यों पकड़ा? एक दिन मैं असाम साइड में जा रहा था तो देखा कि हाथी रेल के डिब्बे में लकड़ी चढ़ा रहे थे। बड़ा काम करते हैं हाथी। बड़ा बुद्धिमान भी है हाथी। सूँढ़ से धकेल रहे थे। फिर सूँढ़ से धकेलकर ऊपर कर रहे थे। फिर क्या कराते हैं हाथी से? एक कहावत भी है कि जिंदा हाथी लाख का और मरा सवा लाख का। पर आजकल एक लाख से कुछ नहीं बनता है। मैं रखबंधू की चारदीवारी करवा रहा था तो 20 लाख की चारदीवारी बनाई। छोटे आश्रम की चारदीवारी में 5-6 लाख लग जाते हैं। तो हाथी जिंदा लाख का; मरा तो सवा लाख का। पर आजकल 5-6 लाख है हाथी की कीमत। मेरे पास महा घटिया लोग भी आते हैं और राजे लोग भी आते हैं। अभी काफ़ी बुद्धिजीवी मेरे पास आ रहे हैं। एक हाथी का व्यापारी आया। उसने कहा कि यदि आपकी आज्ञा हो तो आपके लिए हाथी लाऊँ? मैंने पूछा कि हाथी के व्यापारी हो क्या? कहा—हाँ। आसाम से लाकर यहाँ पर बेचता हूँ।

अमृतसर में घोड़े बिकते हैं। वहाँ घोड़ा-मण्डी है। अच्छे लंबे-चौड़े घोड़े हैं। पहले यहाँ पंजाब से आते थे पशु, पर अब यहाँ से पंजाब में जा रहे हैं। इस तरह अन्य पशुओं की तरह हाथी की भी बिक्री होती है। हाथियों से बड़े काम लिये जाते हैं। पहले तो राजा लोग सवारी भी करते थे। आजकल झांकियों आदि में, भीख माँगने आदि के लिए हाथी का इस्तेमाल करते हैं। मंदिरों, देवस्थानों आदि में हाथियों का प्रयोग

होता है। तो मैंने उससे पूछा कि क्या कीमत है हाथी की? कहा—पाँच से छः लाख। वो बोला कि हथिनी की कीमत 5 से 7 लाख है। हथिनी मँहगी है। मैंने पूछा कि क्यों है मँहगी? कहा कि बच्चा देती है। कुछ साल में बड़ा हो जाता है। मैं छोटी हथिनियों को लाता हूँ, अपने बगीचे में पत्तियाँ खिलाकर जवान करता हूँ। वो खुद खा लेती हैं। ज्यादा खर्चा भी नहीं है। फिर वे बच्चे देती हैं। तब मैं उन्हें बेचता हूँ।

हाथी के चमड़े, दाँतों आदि से बड़े काम होते हैं। हाथी के दाँतों से चूड़ियाँ बनती हैं, जो शादियों आदि अवसरों पर पहनते हैं। तो उसने कहा कि बड़ी कीमती बिकती हैं।

इंसान ने हाथी को इसलिए रखा कि उससे काम करवाना है; कुछ मतलब है। मन ने इसलिए इस आत्मा को बाँधा हुआ है कि उससे अपने काम करवाने हैं, दुनिया को चलाना है। रूह को मन ने बाँधकर रखा है। क्यों बाँधा? जैसे इंसान ने अपने मतलब के लिए घोड़े को बाँधा है, गाय को बाँधा है।

मन ने आत्मा को किस फँदे में बाँधा है? मेरा बेटा, मेरा भाई आदि के फँदों में आत्मा को बाँध दिया गया है। रूह अपने को नहीं जान पा रही है। विरोधी ताकतें रूह को बाँधे हुए हैं। आत्मदेव बुरे बँधनों में हैं। इसलिए साहिब कह रहे हैं—

बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव।

जिसने बाँधा है, बड़े यत्न से बाँधा है। अब बैल को उसका मालिक नहीं जाने देना चाहता है। भैंसे आदि किसी को नहीं जाने दे रहा है कोई। अच्छी तरह से बाँधकर रखे हुए हैं सब अपने-अपने स्वार्थों के लिए अपने-अपने पशुओं को। इस तरह—

बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव।

जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥

आत्मदेव को बहुत बंधनों में कैद किया गया है। इसकी पेश नहीं चल रही है। यह नहीं निकल पा रहा है जालिम मन के बंधन से। इससे

निरंजन पूरे-पूरे काम करवा रहा है। जो भी काम कर रहे हैं, आपका कोई काम नहीं है। जो घर बनाया, यह निरंजन का काम है, आत्मा का नहीं। फकीरचंद के पास बैल हैं। वो बैल से जो भी काम करवाता होगा, वो अपने वाला ही करवाता होगा। उस काम से बैल को कोई मतलब नहीं होगा। बैल का कोई काम नहीं है। इस तरह—

जीव पड़ा बहु लूट में, नहीं कछु लेन न देन ॥

निरंजन जो भी करवा रहा है, आत्मा का उससे कोई वास्ता नहीं है। आत्मा को घर की जरूरत ही नहीं है, पर निरंजन उससे घर बनवा रहा है। शादी करवा रहा है। शादी से आत्मा को क्या लेना! आत्मा तो स्त्री-पुरुष कुछ भी नहीं है। खेतीबाड़ी करवाई जा रही है। खेतीबाड़ी से आत्मा का क्या वास्ता! आत्मा को भूख-प्यास नहीं लगती है। तभी तो साहिब बार-बार समझा रहे हैं—

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई।

हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ॥

तो फकीरचंद ने बैल को नहीं छोड़ा है। उसे रोटी भी खिलाता होगा ताकि जिंदा रहे और उसका (फकीरचंद का) काम करता रहे। उसे जो रोटी खिला रहा होगा, वो भी अपने मतलब के लिए। निरंजन ने भी शादी में, इंद्रियों आदि का मजा इसलिए डाल दिया ताकि जिंदा रहे और उसका काम करता रहे।

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सुर नर मुनि सबको ठगे, मनहिं लिया औतार।
जो कोई या ते बचे, तीन लोक से न्यार ॥

मन का स्वरूप

मन का स्वरूप


मन सारी दुनिया को कठपुतली का नाच नचाया करता है। मन ही साहिब की सब निर्मल आत्माओं को बहुत लम्बे समय से शरीर रूपी पिंजड़े में भ्रमित किये हुए है। यही श्रद्धालुओं और सच्चाई की खोज करने वालों को आदिकाल से भटकाए हुए हैं; अतः आत्मा के कल्याण के लिए, इसे बन्धन से छुड़ाने के लिए हमें सर्वप्रथम मन के स्वरूप को जानना होगा।

विभिन्न पंथों, सम्प्रदायों और धर्मों से सम्बन्धित धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने और उनके प्रचारकों और श्रद्धालुओं से वार्तालाप करने से पता चलता है कि कुछ पंथ और सम्प्रदाय ‘मन क्या है?’ प्रश्न के विषय में खामोश हैं। वे केवल इतना मानते हैं कि मन बहुत अद्भुत शक्ति का भण्डार है। यह काबू में नहीं आता। इसके विपरीत कुछ पंथों तथा सम्प्रदायों ने इस प्रश्न पर अपने-अपने ढंग से रोशनी डाली है, जिससे उनके विचारों में भिन्नता आ गई है।

आखिर ‘मन क्या है’ यह एक गम्भीर विषय बन जाता है। इस विषय में जो कुछ विचार प्रकट हुए हैं, वे इस प्रकार हैं।

कुछ विचारकों के मत में मन और आत्मा एक ही चीज़ हैं। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनों में कोई भी अन्तर नहीं। यह मन आत्मा की संकल्प- शक्ति है। वे यह तर्क देते हैं कि अगर मन आत्मा से भिन्न माना जाए तो फिर इसे शरीर का अंग मानना पड़ेगा और इन

हालात में शरीर के मिटने के साथ यह भी मिटेगा; परन्तु ऐसा होता नहीं। कुछ अन्य पंथों का मत है कि मन और आत्मा अलग-अलग चीज़ हैं। केवल मानव शरीर के अन्दर ही वे एक-दूसरे से बँध जाते हैं। मन की संगत के कारण ही आत्मा को पीड़ा उठानी पड़ती है; लेकिन जब किसी सद्गुरु के आशीर्वाद से यह गाँठ खुल जाती है तो आत्मा, जो ईश्वर का अंश है, वापिस अपने घर चली जाती है, जबकि मन, जो ब्रह्म का अंश है, त्रिकुटी में वापिस अपने स्थान पर चला जाता है।

यदि इन विभिन्न पंथों की विचारधाराओं का विचारपूर्वक अध्ययन किया जाए तो यही पता चलेगा कि मन के बारे में उनकी विचारधारा में कहीं-न-कहीं त्रुटि है। कहीं भी मन का स्वरूप स्पष्ट नहीं हो रहा। आओ, देखते हैं कि साहिब क्या कह रहे हैं, इस विषय में।

तन मन कौ खोजहु रे भाई, तन छुटे मन कहाँ समाई।
सनक सनन्दन ये दोनामां, भगति करी मन उनहुँ न जाना।
शिव विरंचि नारद मुनि ज्ञानी, मन की गति उनहुँ नहिं जानी।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण शेषा, तन भीतरी मन उनहुँ न देखा॥

कबीर साहिब कह रहे हैं कि हे भाईयो! इस मन की खोज करो। सोचो तो ज़रा कि तन के छूटने पर यह मन कहाँ चला जाता है! इस विषय को सनक, सनन्दन, जयदेव, नामदेव आदि महान् भक्त भी समझ नहीं पाए। इतना ही नहीं, 'शिव विरंचि नारद मुनि ज्ञानी, मन की गति उनहुँ नहिं जानी' यह कबीर साहिब क्या कह रहे हैं? ज़रा सोचो तो! कितनी बड़ी बात कह रहे हैं! इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना होगा। लेकिन यहीं नहीं रुकेंगे, पूरी बात को समझना है।

अच्छा, यह तो समझ में आ रहा है कि यह मन जीवात्मा को ठगने के लिए एक निपुण ठग की तरह है। इसने बड़े-बड़े मुनियों, योगियों आदि को भी धोखा दिया है। योगियों ने अनेक प्रकार से ध्यान किया, अनेक प्रकार के जप-तप किये, शरीर को कष्ट दिया, शरीर सुखा

डाला, परन्तु फिर भी यह मन वश में नहीं हुआ, पकड़ में नहीं आया। आखिर यह मन है कौन? आगे आओ! देखो, साहिब क्या कह रहे हैं?

निराकार      मन      ही      को      जानो'

आगे कह रहे हैं—

मन हि सरूपी देव निरंजन, तोहिं रहा भरमाई।
हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जा में तोहिं राखा भरमाई॥

पता चल रहा है कि मन निराकार है, निरंजन है। इसी ने निर्मल आत्मा को गन्दे से शरीर रूपी पिंजड़े में भ्रमित किया हुआ है। फिर एक स्थान पर साहिब चेता रहे हैं—

अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना॥

साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, ( ज्योति निरंजन ) जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बंध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है; दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह में डालता है; उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है; पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे चन्द्रमा के भ्रम में बार-बार मुँह में डालता है और अंत में परम दुःख को प्राप्त होता है। साहिब कहते हैं कि इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अन्तिम सत्य मान बैठे हैं, संसार के अधिष्ठाता निरंजन की तरफ ही जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुःख को प्राप्त हो रहे हैं; क्योंकि वे आवागमन से छूट नहीं पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।

मन के रूप

मन के रूप


हम देखते हैं कि एक मिसाइल है, जो आकाश में घूम रही है। उसका नियन्त्रण पृथ्वी पर से हो रहा है। एक छोटे से रिमोट कण्ट्रोल द्वारा उसे किसी भी दिशा में घुमाया जा सकता है। इस शरीर पर भी रिमोट कण्ट्रोल वाला कार्य हो रहा है। मन जो चाहता है, इससे करवाकर छोड़ता है।

कोई भी आदमी अच्छा है या बुरा है, इसको नापने का पैमाना है। जिसका जितना काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर नियन्त्रण है, वो उतना ही अच्छा होगा। जिसका जितना इंद्रियों पर नियन्त्रण है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने स्वभाव पर अधिकार है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने मन पर काबू है, उतना ही अच्छा होगा। जिसका मन जितना स्थूल होगा, उतना ही बुरा होगा।

मन की दो अवस्थाएँ हैं—स्थूल और सूक्ष्म। इन दोनों को समझना। मन की स्थूल अवस्था है—इंद्रियाँ। जिसकी भी इंद्रियाँ अधिक चलायमान हो रही हैं, समझना मन बहुत बेकाबू है। इंद्रियाँ मन का स्थूल रूप है। कोई बार बार कई चीजें खा रहा है, स्वाद ले रहा है, समझना कि मन चंचल है। मन को नापने के फार्मूले हैं। अपने मन को आप चेक करें। मन के बहाव में मत बहना। अगर ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले चक्षु इंद्रि को साधो। ये आँखें सौंदर्य की तलाश में बार बार घूम रही हैं तो समझना मन भटका रहा है। सुंदर रूप चक्षु की पूजा। हमेशा ये आँखें सौंदर्य चाहती हैं। यही इनका भोजन है। कहीं सुंदर मुखड़ा दिखा, वहीं टिकेंगी। समझना ये है मन का स्थूल खेल। अगर स्थूल रूप में मन

नियंत्रण में नहीं है तो सूक्ष्म में कभी भी नहीं हो सकता है। पहले इंद्रियों को चेक कर लेना। इंद्रियों से ही आदमी को जाना जा सकता है कि इसका मन नियंत्रण में है या नहीं है।

अगर कोई यह कहे कि उसका मन अमुक बात सुनकर निर्मल हो गया, अमुक कथा सुनकर उसका मन निर्मल हो गया, कहीं जाकर या तीर्थ में नहा कर मन निर्मल हो गया तो इसमें शंका है। कभी नहीं हो सकता मन ऐसे निर्मल। अगर दो डुबकियाँ लगाने से मन निर्मल हो जाए तो कहना क्या। फिर तीर्थों में रहने वाले ठगी, छल, कपट कैसे कर सकते हैं। इससे सिद्ध हो रहा है कि मन इतनी जल्दी निर्मल होने वाला नहीं है। मन को काबू करना है।

सौ मन साबुन से एक कोयला उजला नहीं हो सकता। लेकिन कोई अगर कहे कि कोयले को धोकर हमने सफेद कर लिया तो हम मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। पर कोई कहे कि मन को निर्मल कर लिया, हम किसी भी हालत में मानने को तैयार नहीं होंगे। मन निर्मल हो ही नहीं सकता है। काबू करना, इस पर सवारी करना, इस पर नियंत्रण करना।

मन पर काबू कैसे? मन नितांत खराब चीज है। मन का स्थूल रूप इंद्रियाँ अगर सक्रिय हो रही हैं, अपने अपने विषयों की तरफ दौड़ रही हैं तो मन मोटा हो जाता है। मन को पोषण इंद्रियों से मिलता है।

मन के चलाए तन चले, ताको सर्वस्व जाए॥

जिसका भी तन मन के चलाए चल रहा है, सर्वस्व नाश हो जाएगा।

जो भी आदमी मन का गुलाम है, वो अच्छा नहीं है। इसलिए इस मन पर नियंत्रण करना। ये कान अपनी बढ़ाई चाहते हैं, इन पर नियंत्रण करना।

ऐसे मन साधारणतया समझ में नहीं आएगा। वातावरण में बहुत से जीवाणु हैं। पानी में अनेक प्रकार के कीड़े हैं। नौ लाख किस्म के जीव

हैं जल में। उनमें एक-दो लाख किस्म के आप देख सकते हैं खुली आँखों से, बाकी दिखाई नहीं देंगे। इसी तरह—मन को कोई देख न पाए। मन का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा है। यह बहुत खतरनाक शक्तियों से सम्पन्न है। मन बहुत जल्दी से किसी को समझ में नहीं आता है।

सूक्ष्म रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मन के रूप हैं। प्रत्येक मानव शरीर में मन चार रूपों में स्थित है—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों अपने-अपने तरीके से आत्मा को भ्रमित कर रहे हैं। जैसे पानी के तीन रूप हैं—तरल, ठोस तथा वाष्प; लेकिन तत्व रूप से तीनों एक ही हैं; बर्फ भी पानी ही है और वाष्प भी; इसी तरह मन के चार रूप हैं, पर मूल रूप से एक ही मन है। जब हमारा मन कोई इच्छा करता है तो यह मन कहलाता है। सारी इच्छाएँ मन से हैं। आत्मा कोई इच्छा नहीं करती है। आत्मा को किसी भी पदार्थ की कोई ज़रूरत नहीं है, वो किसी पर आश्रित ही नहीं है, वो अपने आप में परिपूर्ण और आनन्दमयी है, उसे कुछ नहीं चाहिए, फिर इच्छा क्या करेगी!

देखते हैं कि यह मन कैसी इच्छाएँ करता है। विचार करने पर पता चलता है कि मन मूल रूप से हमारे शरीर के उपयुक्त इच्छाएँ ही करता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए आगे आने वाला नहीं है। कभी-कभी हम बच्चों को अच्छी तालीम दिलवाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं। कभी अन्य-अन्य इच्छाएँ करते हैं। सोचो! क्या यह सब इच्छाएँ आत्मा कर रही है? नहीं! आत्मा का कोई रिश्ता-नाता नहीं है। जगत के सब रिश्ते मन बनाता है। सदी-गर्मी से बचने के लिए हम घर बनाते हैं। आत्मा को सदी-गर्मी लगती ही नहीं; सदी-गर्मी तो शरीर को लगती है, फिर आत्मा को क्या ज़रूरत पड़ी है, किसी घर की! कभी-कभी हम कहते हैं, हमारी आत्मा जलेबी खाने को कह रही है, हलवा-पूरी खाने को कह रही है। क्या यह ठीक बात है? नहीं। हमारी आत्मा कुछ भी नहीं खाती। इसमें तो मुँह ही नहीं है; खायेगी क्या! यह तो मन और इन्द्री का समझौता था। इन्द्री को मन ने ही उत्तेजित किया।

इन्द्री के स्वार्थ की पूर्ति के लिए मन ने कार्य किया और इन्द्री मन की आज्ञा के पालन में जुट गयी। आत्मदेव को यहाँ पर धोखा दिया गया। उसने अपने को इन्द्री मान लिया और उसके स्वार्थ की पूर्ति में अपनी ताकत का सहयोग दिया। लोग कहते हैं कि दुनिया में सात अजूबे पर मुझे दुनिया में एक ही अजूबा नज़र आ रहा और वो यह कि आत्मा अपने को शरीर मान रही है। क्या कोई टॉवर कौतुक है! क्या कोई ब्रिज कौतुक है! नहीं है कौतुक। कौतुक है तो बस एक ही। इस आत्मा को भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती; इसका कोई मां-बाप, रिश्ता-नाता नहीं। कितना बड़ा कौतुक है! इसी को साहिब अपने शब्दों में कह रहे हैं—

मन फूला-फूला फिरे जगत में, कैसा नाता रे।
माता कहे है पुत्र यह मेरा, बहिन कहे बीरन मेरा रे।
भाई कहे यह भुजा हमारी, नारी कहे नर मेरा रे।
पेट पकड़कर माता रोवे, बाँह पकड़कर भाई रे।
लपटि झपटि तिरिया रोवे, हंस अकेला जाई रे॥

हम सभी सैद्धान्तिक रूप से तो स्वीकार करते हैं कि 'आत्मा अमर है'। हम ठीक से समझते हैं कि हमारी आत्मा इस भवसागर में जब तक पड़ी रहेगी, यह बंधन में रहेगी। तभी तो हम सब भवसागर से छूटने का प्रयास करते हैं, आत्मा की मुक्ति की बात करते हैं। हम सभी सैद्धान्तिक रूप से शरीर को नाशवान् भी मानते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि जो भी शरीरधारी हुए हैं, सब एक-एक करके जा रहे हैं। हमसे पहले जो शरीरधारी हुए, कोई भी नज़र नहीं आता, चाहे वे बड़े-बड़े महापुरुष ही क्यों न थे, उन्हें भी एक बिन्दु पर पहुँचकर इस शरीर को छोड़ना पड़ा था। इसलिए हम सब सैद्धान्तिक रूप से मानते हैं कि शरीर नाशवान् है। लेकिन विडम्बना यह है कि व्यवहार में हम बिल्कुल विपरीत जा रहे हैं। व्यवहार में तो हम 'आत्मा' नाम की कोई चीज़ मान ही नहीं रहे हैं, क्योंकि हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर रहे, और न ही हम शरीर को

व्यवहार में नाशवान् मान रहे हैं, क्योंकि हम शरीर से बहुत प्यार कर रहे हैं, जितने भी कार्य हैं, सब इसी की सुख-सुविधा के लिए कर रहे हैं। दूसरी ओर आत्मा के कल्याण के लिए, आत्मा को बंधन से छुड़ाने के लिए हम कोई भी कार्य नहीं कर रहे हैं।

‘आत्मा अमर है’ जानकर भी हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर पाते हैं और शरीर को भी व्यवहार में नाशवान् नहीं समझते हैं। आखिर क्यों ? संत कहा करते हैं कि वेद-शास्त्रों या अन्य-अन्य धार्मिक पुस्तकों का हम कितना ही अध्ययन क्यों न कर लें; लेकिन जब तक हम यथार्थ में अपनी आत्मा से परिचित न हो जाएँ, उसे देख न लें; हम अपने को शरीर से परे एक आत्मा मानकर व्यवहार नहीं कर सकते। वर्तमान में हम अपने को आत्मा न समझकर एक शरीर ही मान रहे हैं। आत्मा को ज्ञान है कि वो अमर है, इसलिए आत्मा अपनी अमरता की प्रवृत्ति के कारण ही शरीर में बैठकर उसे भी अमर मान रही है, सत्य मान रही है, नित्य मान रही है, जो कि वास्तव में नाशवान् है, अनित्य है, झूठ है।

मन का दूसरा रूप है—बुद्धि। जब भी मन कोई फैसला करता है तो इसी मन को बुद्धि कहा जाता है। वह बैरी है, वो मित्र है, यह काम करना है, वो काम नहीं करना है आदि कार्य बुद्धि करती है। बुद्धि के भी सारे फैसले, सारे निर्णय शरीर के विषय में होते हैं। आत्मा के विषय में तो इसे सोचने का समय ही नहीं। महापुरुषों के सत्संग से प्रभावित होकर ही हम थोड़ी देर आत्मा के विषय में सोच पाते हैं। ऐसा तभी सम्भव हो पाता है, जब महापुरुषों की अलौकिक वाणी हमारी आत्मा को छू जाती है और फिर हम विचारों में खो जाते हैं। विचार आत्मा का गुण है। पर थोड़ी देर बाद पुनः मन की दुनिया में रम जाते हैं।

मन का तीसरा रूप है—चित्त। चित्त का काम है—याद करना। यह चित्त भी आत्मा के कल्याण के लिए कभी आगे नहीं आने वाला, प्रभु को याद नहीं करने वाला। कभी-कभी हम पुरानी बातों को याद करते हैं कि उसने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया था। फिर कभी-कभी

हम बीते हुए दिनों को याद करते हैं। पचास साल, सौ साल पुरानी बातें भी याद आ जाती हैं, पर कभी भी यह चित्त प्रभु की याद नहीं आने देता। यह गम्भीर विषय है। हम कहीं उलझे हुए हैं। हमें इस पर गहराई से विचार करना है।

चौथा रूप है—अहंकार। इसका काम है—क्रिया करना। उदाहरण के लिए मन ने इच्छा की कि आम खाना है। इस पर बुद्धि फैसला करती है। पहले देखती है कि आम खरीदने के लिए पैसे भी हैं या नहीं। यदि पैसे ही नहीं हैं तो बुद्धि मन से कह देती है—ओ मन! पैसे नहीं हैं, आम नहीं खा सकते। मन शांत हो जाता है। मान लो कि आम खरीदने के लिए पैसे हैं। बुद्धि फौरन फैसला करती है—हाँ, आम खायेंगे। अब आम कहाँ मिले। यह बताता है चित्त। हमने चलते-फिरते कहीं आम की दुकान देखी थी। चित्त में यह बात बैठ गयी थी; उसे याद आ गया। अब फिर हम चलकर आम खरीदने के लिए जाते हैं। यही अहंकार कहलाता है।

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“वेद चारों नहीं जानत सत्य पुरुष कहानियां ॥”

क्या कहते वेद ?

  1. ऋग्वेद—परमात्मा निराकार है।
  2. यजुर्वेद—परमात्मा साकार है।
  3. अथर्ववेद—कर्म ही परमात्मा है।
  4. साम वेद—आत्मा ही परमात्मा है।

मन का परिवार

मन का परिवार


आओ, मन के परिवार की तरफ चलते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ही मन का शरीर है। इन पाँचों का अपना-अपना परिवार है। इस तरह मन का एक बहुत बड़ा परिवार है। इन सबने मिलकर आत्मा को कसकर पकड़ा हुआ है। इस पर साहिब कह रहे हैं—

बहु बन्धन ने बांधिया, एक विचार जीव।
जीव विचार क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥

साहिब कह रहे हैं कि यह जीवात्मा अनेक बंधनों से बँधी हुई है। यह तो तभी छूटकर अपने देश जा सकती है, जब मालिक स्वयं आकर इसे छुड़ा ले जाए।

सबसे पहले काम की तरफ चलते हैं। यह काम, सभी को अपने वश में किया हुआ है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को भी यह काम नचाता आया है। काम का भी परिवार है। काम की स्त्री है—रति। यह रति क्या है? संभोग क्रिया ही रति है। काम की यही पत्नी है। दोनों मिलकर वार करते हैं। ये दुश्मन ऐसे हैं कि दिखाई भी नहीं देते, वार पूरा करते हैं। फिर लालच इसका पुत्र है। जहाँ ये सब नहीं, वहाँ संभोग नहीं। फिर लोलुपता यानी उसी में रहना। तू-ही-तू बस। यह लोलुपता है। यह भी काम की बहू है। किसी से कोई लड़ाई करे तो उसके घर के सारे सदस्य भिड़ जायेंगे, एक हो जायेंगे। इस तरह ये सब भिड़ते हैं।

प्रबल अविद्या का परिवारा॥

गोस्वामी जी रामायण में बोल रहे हैं—

इन सब मिल जीवहि घेरा ॥

ये दिख नहीं रहे हैं। इन्होंने आत्मा को घेरा है। आत्मा यहाँ बँधी है। वो पीड़ित है। ये समझ नहीं आ रहे हैं। बड़े बारीक दुश्मन से पाला पड़ा है।

एक मनोवैज्ञानिक मिला; वो एक ही सवाल में ढेर हो गया। मैंने कहा कि मन क्या है? कहाँ रहता है? जब पूरी बात हुई तो कहने लगा कि महाराज, जो बात आप कर रहे हैं, वो आजतक किसी स्लेबस में नहीं है।

जब यह काम मनुष्य पर सवार होता है तो उसे कुछ भी होश बाकी नहीं रहने देता। कामातुर मनुष्य बड़े-बड़े अनर्थक कार्य कर डालता है। काम ने सभी को अपने अधीन किया है।

एक पौराणिक कथा है कि 'नेमि' नाम का एक ऋषि काम के प्रताप से बचने के लिए जंगल में जाकर छिप गया। वहाँ ज़मीन के भीतर एक खड्ड में बैठ कर तप करने लगा। उसने सोचा कि शरीर में किसी भी तरह विषय-विकार उत्पन्न न हों, इसलिए रोटी खाना भी छोड़ दिया। वो दो-तीन दिन में एक बार ही उस खड्ड से बाहर आता था और वहाँ एक नीम के पेड़ को थोड़ा चाटकर ही अपना काम चलाता था। तभी किसी राजा के यहाँ यज्ञ का आयोजन हुआ। सब पंडितों को बुलाया गया। पंडितों ने राजा से कहा, हे राजन्! यदि नेमि ऋषि (शृंगी ऋषि) इस इतने बड़े यज्ञ का भोग लगा लेगा तो निश्चय ही यह यज्ञ सफल हो जाएगा। अब समस्या यह थी कि उसे बुलाकर लाए कौन! नेमि ऋषि तो किसी के यहाँ आता जाता ही नहीं था। राजा के महल में एक वेश्या रहती थी। उसने ऋषि को बुला लाने का दायित्व अपने ऊपर लिया। इसके लिए उसने कुछ समय माँगा। राजा की आज्ञा पाकर वेश्या वहाँ जंगल में आयी। वहाँ पहुँचकर वह एक स्थान पर छिपकर ऋषि के खड्ड से बाहर आने का इंतजार करने लगी। तीसरे दिन ऋषि ने बाहर आकर वहाँ नीम के पेड़ को दो-तीन बार चाटा और वापिस अपने खड्ड में चला गया। वेश्या

सब कुछ चुपचाप देख रही थी; सहसा उसे कुछ सूझ गया और उसने पेड़ के उस स्थान पर थोड़ी शक्कर लगा दी। अगली बार जब ऋषि बाहर आकर उस पेड़ को चाट रहा था तो वेश्या ने देखा कि ऋषि ने पिछली बार से अधिक बार पेड़ को चाटा है। जब वो चाट कर चला गया तो वेश्या ने तीसरे दिन वहाँ पर शहद लगा दिया और खुद छिपकर देखने लगी। ऋषि ने इस बार पिछली बार से भी ज्यादा चाटा। फिर वेश्या ने उस जगह अनाज लगाना शुरू किया। अब ऋषि रोज खड़ड से बाहर आकर उस पेड़ को चाटने लगा। वेश्या को लगा, अब मामला ठीक है। उसने अब रोटी बनाकर वहाँ रखना शुरू किया। उधर ऋषि ने भी दिन में दो बार बाहर आकर भोजन करना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे ऋषि का शरीर पुष्ट होने लगा; उसमें विषय-विकार उत्पन्न होने लगे। उसे मालूम पड़ गया कि यहाँ पर कोई स्त्री है, जो उसके लिए यह सब कर रही है। बस फिर क्या था! ऋषि की निगाहें चारों ओर उसे खोजने लगीं। वेश्या जान गयी कि उसका काम पूरा हो चुका है। वो खुद उसके सामने आ गयी। ऋषि ने उससे शादी कर ली और कुछ ही समय में वो तीन बच्चों का पिता भी बन गया।

अब ऋषि पूरी तरह से वेश्या के अधीन हो चुका था। वेश्या ने उसे राजा के यहाँ चलने को कहा। कुछ देर हाँ-ना करने के बाद जब ऋषि जाने को राजी हो गया तो वेश्या ने महल में राजा को सूचना भिजवा दी कि नेमि ऋषि आ रहा है। चलते समय वेश्या ने दो बच्चों को ऋषि के दोनों कन्धों पर बिठा दिया, एक को उसकी गोद में दे दिया और स्वयं उसके आगे-आगे बड़े ठाट से चलने लगी।

उधर राज्य में नेमि ऋषि के स्वागत की तैयारियाँ होने लगी। लोग अपने-अपने घरों की छतों पर ऋषि के दर्शन पाने के लिए खड़े हो गये। कुछ समय बाद ऋषि ने राज्य में प्रवेश किया। लोगों ने देखा कि एक जटाधारी दो बच्चों को अपने कन्धों पर बिठाए हुए तथा एक को गोद में उठाए हुए अपनी स्त्री सहित चला आ रहा है। किसी ने बताया