मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंचहुँ दिश खनै जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥
लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥
भौँह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥
देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥
छाड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥
राम जी लंका से वापिस आ चुके थे, अपना राज काज कर रहे थे । एक समय अच्छा मुहूर्त जानकर वो लक्ष्मण के साथ एक जगह महल की नींव डलवा रहे थे । इतने में उन्हें लगा कि नीचे कुछ है । यह सोचकर राम जी ने खोदने की आज्ञा दी । खोदने पर वहाँ एक तपस्वी दिखाई दिया, जो तप कर रहा था । उसे देखकर सब डर गये कि कहीं यह शाप न दे दे । जब उसने समाधि छोड़कर आँख खोली तो राम जी ने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया ।
बोलो वचन ऋषी तब, को हो को कहु मोहि ॥
रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सब तोहि ॥
ऋषि ने कहा कि तुम कौन हो, मुझसे कहो ? देखने में तो तुम राजा लगते हो ।
दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥
ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कब करब भुवारा ॥
हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥
कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाड़ो कोट कहा सुन मोरा ॥
राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥
लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म की को कह्यो प्रभाऊ ॥
आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहै सब कोई ॥
दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एक दिवस पित्रन को जाना ॥
वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥
बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो बखाना ॥
सस मनु जबही जाइ बिगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥