मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 120 में से
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संतो आवै जाय सो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिं वाके, ना कहूँ गया ना आया ॥
का मकसूद मच्छ कछ होई, संखासुर न संघारा ।
है दयाल द्रोह नहिं वाके, कहहु कवन को मारा ॥
वै करता नहिं वराह कहाये, धरनि धरो नहिं भारा ।
ई सभ काम साहब के नाहीं, झूठ कहै संसारा ॥
खंभ खोरि जो बाहर होई, ताहि पतिजे सभ कोई ।
हरनाकुस नख ओद्र विदारा, सो करता नहिं होई ॥
बावन रूप बलि को जांचे, जो जांचे सो माया ।
बिना विवेक सकल जग भरमे, माये जग भरमाया ॥
परसुराम छत्री नहिं मारे, ई छल माया कीन्हा ।
सतगुरु भेद भगति नहिं जाने, जीवहिं मिथ्या दीन्हा ॥
सिरजनहार न व्याही सीता, जल पखान नहिं बंधा ।
वे रघुनाथ एक कै सुमिरै, जो सुमिरै सो अंधा ॥
गोपी ग्वाल न गोकुल आया, करते कंस न मारा ।
है मेहरबान सभहिन को साहिब, नहिं जीता नहिं हारा ॥
वै करता नहिं बौध कहाये, नहीं असुर संहारा ।
ग्यनहीन करता के भरमे, माये जग भरमाया ॥
वै करता नहिं भया कलंकी, नहिं कलिग्रहिं मारा ।
ई छल बल सब माया कीन्हा, जत्त सभ टारा ॥