मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीजे बृंद रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्व तेहि साने ॥
पंच तत्व गुण तीन खमीरा । तीनों जन को रच्यो शरीरा ॥
तीन गुण और पाँच तत्वों को मिलाकर निरंजन ने अपने पुत्र उत्पन्न किये और इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण देकर जगत् की रचना की । प्रथम रजगुण के साथ पाँच तत्व दिये, जिससे ब्रह्मा जी हुए और सतगुण के साथ पाँच तत्व दिये तो विष्णु जी हुए और तमगुण के साथ पाँच तत्व देने से शिवजी हुए । इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण से तीनों शरीरों की रचना की ।
कहेउ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो ।
शून्य गुफहि निवास कीन्हो, भेद लह को ताहि हो ॥
वह गुप्त भा पुनि संग सबके, मन निरंजन जानिये ।
मन पुरुष ध्यान उच्छेद देवे, आपु परगट आनिये ॥
निरंजन गुप्त होकर शून्य में समा गया और मन रूप में सबके साथ हो गया । यही मन परम पुरुष का ध्यान नहीं करने देता है ।
यह 24 घंटे तपस्या कर रहा है । एक पल के लिए भी सो नहीं रहा है । 24 घंटे आपको भ्रमित कर रहा है । इस तरह इस मन से बड़ा तपस्वी भी कोई नहीं है ।
<!-- image: Decorative separator consisting of four stylized floral or geometric symbols. -->मैं 'मन' ही सृष्टि से परे ररंकार हूँ ॥
मैं ही साकार-निराकार में विद्यमान हूँ ।
मैं ही आलोकित ज्योतिस्वरूप सौर्य मण्डलों में व्याप्त हूँ ।
मैं ही सप्त आकाश और सप्तसागर पाताल हूँ ।
मैं ही सृष्टि रचना लघु-प्रलय महाप्रलय का आधार हूँ ।