मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंविहंसी कन्या सुन अस बाता। इक मतिहोय दोइ रंगराता॥
हरस वचन बोली मृदु बानी। नारी नीच बुधि रति विधि ठानी॥
रहस वचन सुन धरम हरषाना। भोग करन को मन में आना॥
आद्य-शक्ति तब हँसते हुए उसके साथ एकमत हो गयी,
उसकी बात मान ली और मीठी वाणी बोलकर गुप्त बात कही और
निरंजन के साथ रहने का निश्चय कर लिया।
भग न कन्या के हती, अस चरित कीन्ह निरंजना।
नख घात किये भग द्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना॥
नख रेष शोनित चला, तिहुँ को सब खास आरंभनी।
आदि उत्पति सुनहु धर्मनि, कोइ नहिं जानत जम मनी॥
त्रियवार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेश हो।
जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीजे शम्भू सेष हो॥
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा। धर्मदास तुम करो विवेका॥
अग्नि पवन जल महि अकाशा। कूर्म उदर ते भयो प्रकाशा॥
पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा। गुण तीनों सीसन सों कीन्हा॥
यहि विधि भये तत्व गुण तीनों। धर्मराय तब रचना कीनो॥
साहिब धर्मदाससे कहते हैं कि कूर्म जी के पेट से पाँच तत्व
निकले थे और उसके तीन शीश निरंजन ने खा लिये थे, उन्हीं से तीन
गुण—रजगुण (ब्रह्मा जी), सत्गुण (विष्णु जी), और तमगुण (शिवजी)
हुए। पाँच तत्व और तीन गुणों से निरंजन ने सब रचना की।
गुन तत सम कर देविहिं दीन्हा। आपन अंस उत्पन कीन्हा॥
बुंद तीन कन्या भग डारा। ता सँग तीनो अंस सुधारा॥
पाँच तत्व गुण तीनों दीन्हा। यहि विधि जग की रचना कीन्हा॥
प्रथम बुंद ते ब्रह्मा भयऊ। रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ॥
दूजो बुंद बिस्नु जो भयऊ। सत्गुण पंच तत्व तिन पयऊ॥