मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंकीन्हो काल सीस नख घाता। उदरते निकसे पवन अघाता॥
तीन सीस के तीनहु अंशा। ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बंशा॥
पाँच तत्त्व धरती आकाशा। चंद्र सूर्य उडगन रहिवासा॥
निसर्यो नीर अग्नि शशि सूर। निसर्यो नभ ढाकन महि अस्थूला॥
छीना सीस कूर्म को जबही। चले परसेव ठाँव पुनि तबही॥
जबही परसेव बुंद जल दीन्हा। उनचास कोट पृथ्वी को चीन्हा॥
निरंजन बड़े घमण्ड के साथ कूर्म जी के पास पहुँचा, लेकिन कूर्म जी से प्रार्थना नहीं की, और बल से पाँच तत्त्व का बीज उसी प्रकार उनसे छीन लिया, जैसे किसी के शरीर से खून खींचकर निकालते हैं। कूर्म जी शांत थे, उन्होंने सोचा कि यह कौन शैतान यहाँ आ गया है! निरंजन ने देखा कि कूर्म तो बहुत बलवान है। उनका शरीर उससे दुगुना था। निरंजन क्रोधित होकर उसके चारों ओर दौड़ने लगा कि कैसे इससे उत्पत्ति का सामान ले लूँ। उसने नख से उनके शीश पर प्रहार किया और तीन शीश काट कर खा लिए। तब उनके पेट से पाँच तत्त्व का सूक्ष्म बीज लेकर निरंजन शून्य में आया।
उधर कूर्म जी ने तब परम-पुरुष से पुकार की, कहा — यह किस शैतान को यहाँ भेज दिया है! इसने तो मेरे साथ बल का प्रयोग करके पाँच तत्त्व का बीज छीना है। परम-पुरुष ने कूर्म जी से कहा कि तुम शांत रहो, यह तुम्हारा छोटा भाई है, इसे माफ कर दो। लेकिन परम-पुरुष ने सोचा कि यह कैसा निरंजन उत्पन्न हुआ है!
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निरंजन। युग अनेक किय संयम॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई। करि रचना बैठे पछताई॥
धर्मराय तब कीन्ह विचारा। कैसे लो त्रयपुर विस्तारा॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हो पाताल। बिना बीज किमि कीजै ख्याला॥
कौन भांति कस करब उपाई। किहि विधि रचों शरीर बनाई॥
कर सेवा माँगों पुनि सोई। तिहुँ परि जीवित मेरो होई॥