भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 120 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

अहं ब्रह्मास्मि कह ब्रह्मा। ताते रचना को आरंभा ॥
अहंते सकल सृष्टि यह ठाढ़ी। कथा कहानी जग में बाढ़ी ॥
यहि अहं अज्ञान को मूला। ताते जीव सहे सो शूला ॥
अहं बोलि यह जीव सिधरै। बहुरि नवीन कलेवर धरै ॥
आवा गौन अहं ते होई। यक तन तजि दूसर गह सोई ॥
ज्यों ज्यों जीव तुच्छता गहई। त्यों त्यों अधिक अहं से लहई ॥
ज्यों ज्यों श्रेष्ठ पदन को पावै। त्यों त्यों ताही दीनता आवै।

अहंकार के कारण ही साधक अपने को अहं ब्रह्मास्मि कहता है। अहंकार के कारण ही यह सृष्टि है। यही अज्ञान का मूल भी है और इसी कारण से जीव दुख पाता है। इसी कारण जीव का आवागमन लगा रहता है, एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को धारण करता है। जैसे-जैसे जीव में मानसिक तुच्छता आती जाती है, ऐसे ऐसे जीव में अहंकार बढ़ता जाता है; जैसे-जैसे जीव श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता जाता है, उसमें दीनता आती जाती है।

भृगु मुनि विष्णु को मार्ग्यो लाता। सो करि क्षमा कहौ मृदुबाता ॥
देखो दारिद्री कं गाला। धन पाये तेहि गर्व विशाला ॥
गये न हंकार हरि प्यारे। जीवहि अहं तुच्छ करि डारे ॥
अहंकार के है षट अंगा। ताते जीव केरि मति भंगा ॥
जब मति भंग जीव की होई। नाना विधि को तन गह सोई ॥
देह सदा वासना ते पूरी। सुखी होय करि ताको दूरी ॥
जबलों रहै वासना मन में। तबलों विचार विषय के बन में ॥
जीव कहाव देह अभिमानी। ताको मुक्तिपात्र नहिं जानी ॥
निर्बासनिक होय निस्प्रेही। जत्त पूज्य है साधू येही ॥
जिनके हृदय में अभिमाना। तिनको कबहु उगै न ज्ञाना ॥

भृगु मुनि ने विष्णु जी को लात मारी तो उन्होंने उसे क्षमा कर दिया और फिर मीठी वाणी में पूछा कि कहीं लगी तो नहीं। देखो, जब कोई द्रिद्री धन पा लेता है तो अहंकारी हो जाता है। यह अहंकार जीव