मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस लोभ के चंगुल में एक-दो नहीं हैं।
भगत मुड़िया जटाधारी, ज्ञानी गुनी अपार।
षट दर्शन भटकत फिरे, एक लोभ की लार॥
इसके बाद आता है—मोह। 'मोह सकल व्याधिन को मूला। ता ते उपजत बहु विधि सूला।' मोह सभी बीमारियों की जड़ है। यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। जैसे मछली पानी में रहती है, इसी तरह मोह अज्ञान में रहता है। इस मोह की स्त्री है—तृष्णा; बेटी है—इच्छा; बेटा है—लालच; मंत्री है—पारखण्ड; वजीर है—कपट; मित्र हैं—रोग और शोक। इस प्रकार इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है। जीव को सत्य-पथ से हटाने के लिए यह अकेला ही काफी है। इसी के कारण पक्षपात होता है। इसकी उत्पत्ति ही माया से है।
मोह नृपति माया ते भयऊ। प्रबल घटा तिहूँ पुर सी छयऊ॥
वरनो तासु नाम गुण बैना। महा मोह राजा को सैना॥
इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार भी है।
निज अज्ञान देश राजधानी। आलस महल आशा पटरानी॥
इच्छा बेटी खरी कठोरी। बाँधे अनेक जीव उठि भोरी॥
कुमति सखी ताके संग रहई। निति उठि हृदय सबन की दहई॥
लौंडी छूत टहल घर करई। जाके परसत सब जग डरई॥
लौंडा लालच नाहिं अधावे। वरजत निलज सबके घर जावे॥
रोग शोक संशय बहु भांति। पर द्रोही और द्रुन्द संधाती॥
ये राजा के पुत्र प्रचंडा। जाके डर त्रासे नौखंडा॥
पाप सबन को औगुन जानी। दुख दरिद्र मोह अभिमानी॥
अधर्म ध्वजा जाके अगवानी। बाजा प्रकट कलह निशानी॥
दम्भ क्षत्र चौतरा शूला। जहाँ सिंहासन बैठे फूला॥
कपट वजीर असत्य खवासा। पारखंड मंत्री संग प्रकाशा॥
यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। इसकी स्त्री है—तृष्णा, बेटी है—इच्छा, बेटा है—लालच, मंत्री है—पारखंड, वजीर है—कपट, मित्र हैं—