भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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जोर पसाच गाँठ सो दीन्हा । तब सहस्त्र को उद्यम कीन्हा ॥
जोरि सहस्त्र तृष्णा नहिं साखू । अब लागै जोरन लाखू ॥
लाख जोरि विनवै कर जोरी । अब परमेश्वर मोहि देहि करोरी ॥
जोरि करोर क्षण कल नहिं पऐ । लोभ अग्नि छिन छिन तनु जैरे ॥
ज्यों ज्यों लोभ मिलै नौखंडा । त्यों त्यों लोभ भयो परचंडा ॥

दस मिलें तो बीस चाहिए, बीस मिलें तो पचास, पचास मिलें तो एक सौ, एक सौ के बाद एक हजार, फिर लाख, करोड़ । नहीं, कभी ख़त्म नहीं होता यह लोभ । साहिब धर्मदास से कह रहे हैं—

कलियुग वैराग अस होवे भाई । सुनु धर्मदास मैं कहैं बुझाई ॥
कलियुग पाप कर्म बहु बढ़िहैं । करि करि पाप दुख में परिहैं ॥
ताते दरिद्र होय बहु लोगा । सहिहैं बहुते दुख अरू सोगा ॥
पाइ दुख बहु भेष सों धरिहैं । लागे लोभ पाप बहु करिहैं ॥
मांगि मांगि कछु द्रव्य कमायी । ऋण ब्याज दर दिहैं उठायी ॥
नाम साधु जग माहिं कहायी । खैहैं ब्याज करि कर्म कसायी ॥
मठ मंदिर कारण धन लैहैं । सेवक साख बहुत बढ़ैहैं ॥
पाइ द्रव्य विषय सो भोगहैं । बहु विधि इंद्रिन सुख लगिहैं ॥
विषय भोग को द्रव्य सो चाही । तब पड़िहैं वह तृष्णा माहीं ॥
तृष्णा अति परबल जग भंगी । सदा रहै वह लोभ की संगी ॥

साहिब कह रहे हैं कि कलियुग में मनुष्य लोभ के कारण बड़ा पाप करता है, इसलिए दरिद्र होता है और बड़ा दुख सहता है । कलियुग में पाखण्डी साधु धर्म के नाम पर भीख माँगते हैं और बहुत धन जोड़ लेते हैं । उनके दिल में विषय-भोगों की तृष्णा रहती है । यह तृष्णा लोभ की पत्नी है, जो सदा उसके संग रहती है ।

यह लोभ तो काम और क्रोध से भी बढ़कर है, इसलिए साहिब कह रहे हैं—

कामी नर बहुते तरे, क्रोधी तरे अनन्त ।
लोभी बंदा न तरे, कहैं कबीर सिद्धंत ॥