भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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में कर ले, पर जब क्रोध आता है तो एक पल में सब कुछ हर लेता है। यह क्रोध बने बनाए काम बिगाड़ देता है और सारे फल का नाश कर देता है।

बहुत जतन तप कीनेऊ, सब फल क्रोध नसाय।

कहैं कबीर धन संचै, चोर मूसि लै जाय॥

तपस्वी बड़े यत्न से तप करते हैं, पर क्रोध आता है तो सारे तप को नष्ट कर देता है। जैसे कोई धन का संचय करता है, पर आखिर चोर चुरा ले जाता है, ऐसे ही क्रोध सारे तप का नाश कर देता है।

फिर इसके बाद—लोभ। 'बुरा लोभ ते और न कोई, सकल अधर्म लोभ ते होई'। लोभ की स्त्री—तृष्णा, बेटा है—पाप। यह लोभ पाप का बाप है; क्योंकि सारे पाप मनुष्य लोभ में फँसकर ही करता है। इस पर तो साहिब कह रहे हैं—

कामी नर बहुते तरे, क्रोधी तरे अनन्त।

लोभी बन्दा न तरे, कहैं कबीर सिधन्त॥

साहिब कह रहे हैं कि कामी मनुष्य भी तर जाएगा, क्रोधी भी तर सकता है, पर लोभी बन्दे के लिए मेरा सिद्धान्त भी रुक गया है; वो भी कह रहा है कि लोभी बन्दा नहीं तर सकता। लोभी बन्दे के लिए साहिब ने बड़ा सुन्दर कहा है—

कबीरा कौड़ी-कौड़ी जोरि कै, जोरे लाख करोरि।

चलती बार न कछु मिल्यो, लई लंगोटी तोरि॥

इस लोभ की कहानी भी बड़ी ही निराली है।

पहिले पैसा में मन लावै। पैसा मिले टका को धावै॥
टका देखि मन में सुख भयऊ। दो टका का उद्यम कियऊ॥
दुई जोरे जोरे फिर चारी। लोभ पाति दीन्हों परचारी॥
चारि जोरि मन उपज्यो रंगू। अब दश कै जोर होय जनि भंगू॥
दश जुरै मन रहे न ठोरा। जोरि बीस मन आगे दौरा॥
बीस जोरि मन बाढ़ी आशा। अब जो कैसेहु के जुरे पचासा॥