भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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करना मुझे पसंद नहीं था। तो हमारे गाँव में मदारी आया; उसने डमरू बजाया। पहले भीड़ को इकट्ठा करने के लिए उसने अपना डमरू बजाया। सब बच्चे इकट्ठा हुए; अन्य लोग भी इकट्ठा हुए। मैंने भी सोचा कि देखते हैं, क्या करता है! उसने पिठरे में एक काठ रखी थी। कुछ सामान उसने गठरी में बाँधकर एक तरफ रखा तो कुछ दूसरी तरफ। उसके कंधे पर एक बंदर बैठा था। उसने सबसे कहा कि यह बंदर बड़ा बुद्धिमान है; जो कहो, वो करता है। आज यह आपको दिखायेगा कि ससुराल में कैसे जाते हैं। उसने बंदर को पैंट, शर्ट और टोपी पहना रखी थी। लेकिन था वो बंदर ही। पहले ज़माने में आदमी लाठी में एक गठरी बाँधता था। वो लाठी कंधे पर रखकर जाता था। लाठी को बड़ा हथियार मानते थे। नदी-नालों को पार करने में भी आसानी हो जाती थी और कोई चोर आ जाए, तो भी काम आती थी। तो लोग पास में रखते थे।

तो बंदर को अब दो पाँव पर चलकर ससुराल जाने का डरामा करना था। कुत्ता और बंदर दो पाँवों पर नहीं चल पाते हैं; उन्हें दिक्कत होती है। वो दिन-भर तमाशा दिखाता होगा। उस दिन उसका मूड ठीक नहीं था। मदारी ने एक मूढ़ा एक तरफ रखा, एक दूसरी तरफ, कहा कि यह अब वहाँ जायेगा। बंदर ने बंदर की तरह छलाँग लगाई और वहाँ जाकर बैठ गया। ऐसे में तो पैसा मिलना नहीं था। मदारी ने उसे इशारे में कहा कि ऐसे नहीं, इंसान की तरह चलकर जा। उसने फिर बंदर को तमाशा दिखाने को कहा। बंदर फिर दो कदम चला और फिर बंदर की तरह छलाँग लगाकर वहाँ बैठ गया। मदारी ने उसे चार सोटियाँ लगाई। बंदर तिलमिला उठा। बच्चे हँसने लगे। मैं गंभीर था। मैंने सोचा कि यह कितना ज़ालिम है; उसे पीड़ा हुई है। अपनी-अपनी सोच है न! तो मदारी ने उसे कहा कि बीड़ी पी। वो बंदर कुछ नहीं कर रहा था। उसे ससुराल में जाकर पानी भी पीना था, बीड़ी भी पीनी थी। पानी का गिलास उसने फेंक दिया, बीड़ी भी फेंक दी। मदारी ने फिर सोटी उठाई और दी 4-5। वो दिन भर बीड़ी पीता होगा। उस समय उसका मूड नहीं था। जो