भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 649 में से

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दूसरा अध्याय । ५५ अपने नित्यकर्म में परायण हैं, उनके घरों से ब्रह्मचारी भिक्षा लावे। अपने गुरुकुल में, जाति में और सम्बन्धीयों से भिक्षा न माँगे, यदि दूसरे जगह न मिल सके तो समीप के रिश्ते में छोड़- कर दूरवाले में माँगे ॥ १८०-१८४ ॥ सर्वं वापि चरेद्ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे । नियम्य प्रयतो वाचमभिशस्तांस्तु वर्जयेत् ॥ १८५ ॥ दूरादाहृत्य समिधः संनिदध्याद्विहायसि । सायं प्रातश्च जुहुयात्ताभिरग्निमतन्द्रितः ॥ १८६ ॥ अकृत्वा भैक्षचरणमसमिध्य च पावकम् । अनातुरः सप्तरात्रमवकीर्णिब्रतं चरेत् ॥ १८७ ॥ अगर धर्म-कर्मवाले पुरुषों का गाँव में अभाव हो तो सब गाँवों में भिक्षा को जाय । महापातकी लोगों को छोड़ देवे । और अपनी वाणी का सदा संयम रक्खे । दूर से समिधा-होम की लकड़ी लाकर ऊंचेपर धरे और निरालस होकर प्रातःकाल और सायंकाल उससे अग्नि में हवन करे । ब्रह्मचारी नीरोग होने पर यदि सात रात तक भिक्षा न लावे और हवन न करे तो उसको 'अवकीर्णिब्रत' प्रायश्चित्त ( ११ अध्याय का ) करना चाहिए ॥ १८५-१८७ ॥ भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्व्रती । भैक्षेण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता ॥ १८८ ॥ व्रतवद्देवदैवत्ये पित्र्ये कर्मण्यथर्षिवत् । काममभ्यर्थितोऽश्नीयाद्वतमस्य न लुप्यते ॥ १८६ ॥ ब्राह्मणस्यैव कर्मैतदुपदिष्टं मनीषिभिः । राजन्यवैश्ययोस्त्वेवं नैतत्कर्म विधीयते ॥ १६० ॥ ब्रह्मचारी भिक्षा माँगकर नित्य भोजन करे, एकही के घर का