मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८८ मनुस्मृति । तपःस्वाध्यायनिष्ठाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ॥ १३४ ॥ ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः । हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्ष्वपि ॥ १३५ ॥ अश्रोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारगः । अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात्पिता स्याद्वेदपारगः ॥१३६॥ ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्य स्याच्छ्रोत्रियः पिता । मन्त्रसंपूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽर्हति ॥ १३७ ॥ कोई ब्राह्मण आत्मज्ञानी, कोई तप में तत्पर, कोई तप और स्वाध्याय में तत्पर और कोई कर्मनिष्ठ ही होते हैं । इनमें ज्ञानी को श्राद्ध में ग्रहण करे, और देवकर्म में इन चारों को ग्रहण करना चाहिए । जिसका पिता वेदज्ञ न हो, पर पुत्र वेदपारंगत हो अथवा पुत्र वेदवेत्ता न हो, पिता वेदपारंगत हो इन दोनों में जिसका पिता वेदपारगामी हो वह श्रेष्ठ है और दूसरा भी मान्य होता है ॥ १३४-१३७ ॥ न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः । नारिं न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद् द्विजम् ॥ १३८ ॥ यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च । तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ॥ १३६ ॥ यः संगतानि कुरुते मोहाच्छ्राद्धेन मानवः । स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रो द्विजाधमः ॥ १४०॥ श्राद्ध में मित्र को भोजन न करावे, मित्रों का संग्रह धन से करना चाहिए । जो अपना शत्रु वा मित्र न हो उसी ब्राह्मण को भोजन देना चाहिए । जो श्राद्ध और यज्ञ कर्म में केवल मित्रों को ही भोजन देता है, उसका फल परलोक में नहीं मिलता । जो अज्ञानी पुरुष श्राद्ध के द्वारा मैत्री बांधता है उसको स्वर्ग नहीं होता ॥ १३८-१४० ॥