मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय । १२७ भीतर न जाना । रात में वृक्षों की जड़ से दूर रहना । जुआ कभी न खेलना। अपना जूता खुदही हाथ में लेकर न चलना। सोते हुए न खाना, हाथ में रखकर दूसरे हाथसे न खाना और बैठने के आसन पर रखकर भी न खाना चाहिए। सूर्य अस्त होजाने के बाद जिसमें तिल मिला हो वह चीज़ न खाना नंगा होकर न सोना और जूठे मुँह कहीं इधर उधर न जाना चाहिए ॥ ७३-७५ ॥ आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् । आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ ७६ ॥ अचक्षुर्विषयं दुर्गं न प्रमाद्येन कर्हिचित् । न विण्मूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत् ॥ ७७ ॥ अधितिष्ठेन्न केशांस्तु न भस्मास्थिकपालिकाः । न कार्पासास्थि न तुषान्दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥ ७८ ॥ न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः । न मूर्खैर्न विलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥ ७९ ॥ गीला पाँव से अर्थात् पैर धोकर भोजन करना । पर गीले पैरों से सोना न चाहिए। जो हाथ पैर धोकर पवित्रता से भोजन क- रताहै वह दीर्घ आयुष्य पाता है । वेजानेहुए किला वगैरह में कभी न जाना। मल-मूत्र को न देखना और दोनों भुजाओं से नदी तैर कर पार न जाना चाहिए। बाल, राख, हड्डी, टूटा ठीकरा, बि- नौल और भूसी के ऊपर न बैठना चाहिए। इनपर जो नहीं बैठता उसकी उमर बढ़ती है। पतित, चाण्डाल, मूर्ख, अभिमानी, चमार आदि हीन जाति और नट वगैरह के साथ उठना-बैठना कभी न चाहिए ॥ ७६-७९ ॥ न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम् । न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत् ॥ ८० ॥