भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

चौथा अध्याय । १२६ दश कसाई के बराबर एक तेली, दश तेली के समान एक कल- वार, दश कलवारों के बराबर एक वेश्याजीवी, और दश वेश्या- जीवियों के बराबर एक राजा होता है। दस हज़ार कसाई खाना चलानेवाले एक कसाई के समान राजा कहा गया है। इसलिए उसका दान बड़ा भयानक है॥ ८३-८६ ॥ यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः । स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ ८७ ॥ तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ । नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥ ८८ ॥ संजीवनं महावीचिं तपनं संप्रतापनम् । संहातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तिकम् ॥ ८९ ॥ लोहशङ्कुमृजीषं च पन्थानं शाल्मलीं नदीम् । असिपत्रवनं चैव लोहदारकमेव च ॥ ९० ॥ जो ब्राह्मण लोभी और शास्त्र के विरुद्ध कर्म करनेवाले राजा से दान लेता है वह क्रम से, नीचे लिखे इक्कीस नरकों में पड़ता है। तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, कालसूत्र, महानरक, संजीवन, महावीची, तपन, संप्रतापन, संहात, सकाकोल, कुड्मल, प्रतिमूर्तिक, लोहशङ्कु, ऋजीष, पंथा, शाल्मली, वैतरणी नदी, असिपत्रवन और लोहदारक ॥ ८७-९० ॥ एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः ॥ ९१ ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् । कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ ९२ ॥ उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः समाहितः । १७