भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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१५४ मनुस्मृति । गृहस्थ को यज्ञ आदि कर्मों में सुपात्र को दान देना चाहिए। गृहस्थ के यहां कोई मांगने आवे तो उसको शान्तभाव से जो हो सके देना चाहिए। क्योंकि कभी कोई ऐसा पात्र मिल जाता है, जो दाता को सब पापों से तार देता है ॥ २२६-२२८ ॥ वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः । तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदेश्चक्षुरुत्तमम् ॥ २२९ ॥ भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः । गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् ॥ २३० ॥ वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः । अनडुहः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम् ॥ २३१ ॥ विविध-विषय । जल पिलानेवाला तृप्ति, अन्नदाता अक्षय सुख, तिलदाता अभीष्ट संतान और दीपक का दान करनेवाला उत्तम नेत्र पाता है। भूमिदाता भूमि, सुवर्णदाता उमर, गृहदाता उत्तम गृह, चांदी- दाता उत्तम रूप को पाता है। वस्त्रदाता चन्द्रलोक पाता है, घोड़ा देनेवाला अश्विनीकुमार का लोक, वृषभदाता पूर्णलक्ष्मी और गो- दान करनेवाला सूर्यलोक पाता है ॥ २२९-२३१ ॥ यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः । धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्ममार्ष्टिताम् ॥ २३२ ॥ सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते । वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम् ॥ २३३ ॥ येन येन तु भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति । तत्तत्तेनैव भावेन प्राप्नोति प्रतिपूजितः ॥ २३४ ॥ योऽर्चितं प्रतिगृह्णाति ददात्यर्चितमेव च ।