भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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करने से वह निष्फल होजाता है। जिस प्रकार चींटी धीरे धीरे मिट्टी का ढेर लगा देती है उसी भांति गृहस्थ को धीरे धीरे पर- लोक की सहायता के लिए धर्म का संग्रह करना चाहिए। परलोक में मदद के लिए पिता, माता, पुत्र, स्त्री और सम्बन्धी नहीं रहते किन्तु वहां केवल धर्म ही साथ में रहता है। प्राणी अकेला जन्म लेता है, अकेला मरता है और अकेला ही पुण्य-पाप को भोगता है। काठ मिट्टी के समान मृत शरीर को ज़मीन में छोड़कर, स- म्बन्धी लोग मुँह फेरकर, घर चले जाते हैं। एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३७-२४१ ॥ तस्माद्धर्मं सहायार्थं नित्यं संचिनुयाच्छनैः । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ २४२ ॥ धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हन्ति किल्विषम् । परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम् ॥ २४३ ॥ उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह । निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमांस्त्यजेत् ॥ २४४ ॥ इस लिए परलोक में सहायता के लिए नित्य धीरे धीरे धर्म का संग्रह करना उचित है। क्योंकि धर्म सहायक होने से प्राणी दुस्तर नरक को तर जाता है। धर्म प्राण, निष्पाप पुरुष को धर्म तत्काल परलोक को लेजाता है। पुरुष को सदा उत्तम पुरुषों से सम्बन्ध करना चाहिए। अधमों को त्यागना चाहिए। इससे कुल की उन्नति होती है ॥ २४२-२४४ ॥ उत्तमानुत्तमान्गच्छन् हीनान्हीनांश्च वर्जयन् । ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवायेन शूद्रताम् ॥ २४५ ॥ दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । अहिंस्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथा व्रतः ॥ २४६ ॥ एधोदकं मूलफलमन्नमभ्युद्यतं च यत् ।