मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ मनुस्मृति । सारसं रज्जुवालं च दात्यूहं शुकसारिके ॥ १२ ॥ प्रतुदाञ्जालपादांश्च कोयष्टिनखविष्किरान् । निमज्जतश्च मत्स्यादान् शौनं वल्लूरमेव च ॥ १३ ॥ बकं चैव बलाकां च काकोलं खंजरीटकम् । मत्स्यादान् विड्वराहांश्च मत्स्यानेव च सर्वशः ॥१४॥ यो यस्य मांसमश्नाति स तन्मांसाद उच्यते । मत्स्यादःसर्वमांसादस्तस्मान्मत्स्यान्विवर्जयेत्॥१५॥ दश दिन के भीतर ब्याई गौ का दूध, ऊंटनी का दूध, एक खुर वाली गधी, घोड़ी आदि का दूध, भेंड़ का दूध, गर्भवती गौका दूध और जिसका बच्चा मरगया हो उस गौ का दूध न पीना चा- हिए। भैंस को छोड़कर, सब जंगली पशुओं का दूध और स्त्री का दूध और बिगड़कर खट्टा हुआ पदार्थ न खाना। खट्टे पदार्थों में दही, मट्ठा, अच्छे फूल फल के अर्क गुलाब, केवड़ा आदि खाना पीना चाहिए। कच्चा मांस खानेवाले पक्षी, शकुनवाले पक्षी, गांव- वासी पक्षी, अभक्ष्य पक्षी, एक खुरवाले ऊंट, घोड़ा और टिड्डी ये सब अभक्ष्य हैं। बतक, हंस, चकवा, गांव का मुरग़ा, सारस, जल- काक, पपीहा, तोता और मैना ये सब अभक्ष्य हैं। चोंच से मार कर खानेवाले, पैरों में जालवाले (बाज़ वगैरह) कोयल, नखसे फाड़कर खानेवाले, जल में गोता लगाकर मछली खानेवाले, कसाईखाने का मांस और सूखा मांस ये सब अभक्ष्य हैं। बगला, बतक, काला कौआ, खंजन, मछली खानेवाले पक्षी, सुअर और सब भांति की मछली ये सब अभक्ष्य हैं। जो जिसका मांस खाता है वह उस मांस का खानेवाला कहलाता है। पर मछली खाने वाला सब का मांस खानेवाला कहा जाता है। इस लिए मछली न खाना चाहिए। क्योंकि मछली सबका मांस खाती है ॥८-१५॥ पाठीनरोहितावाद्यौ नियुक्तौ हव्यकव्ययोः ।