मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवां अध्याय । १७५ आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने । सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं पावमानींश्च शक्तितः ॥ ८६ ॥ नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुध्यति । आचम्यैव तु निःस्नेहं गामा लभ्यार्कमीक्ष्य वा ॥ ८७ ॥ आदिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात् । समाप्ते तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेणैव शुध्यति ॥ ८८ ॥ अग्निहोत्री को सूतक के दिन बढ़ाकर, अग्निहोत्र में विघ्न न करना चाहिए। अग्निहोत्री सपिण्ड होने पर भी सूतकी नहीं होता । चाण्डाल, रजस्वला, पतित, प्रसूता, मुरदा और मुरदे को छूने पर स्नान से शुद्धि होती है। अपवित्र वस्तु का दर्शन होने पर, पवित्र होकर आचमनपूर्वक सौर मन्त्र 'उदुत्यं जात- वेदसम्-' और पवमान मन्त्रों का जप करना चाहिए। मनुष्य की गीली हड्डी छूने पर स्नान करके और सूखी हो तो आचमन से विप्र शुद्ध होता है। अथवा गौ का स्पर्श या सूर्यदर्शन से पवि- त्रता होती है। ब्रह्मचारी व्रत की समाप्ति तक जलदान न करे। उसके बाद जलदान करे और तीन रात में ही शुद्ध भी हो जाता है ॥ ८४-८८ ॥ वृथा संकरजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् । आत्मनस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया ॥ ८६ ॥ पाखण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः । गर्भभर्तृद्रुहां चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥ ६० ॥ आचार्यं स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् । निर्हृत्य तु व्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ ६१ ॥ वर्णसंकर, संन्यासी और आत्मघाती को जलदान की ज़रूरत