भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पांचवां अध्याय । १८४ पीत्वापोऽध्येष्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपिसन्॥ १४५॥ एष शौचविधिः कृत्स्नो द्रव्यशुद्धिस्तथैव च। उक्तो वः सर्ववर्णानां स्त्रीणां धर्मान्निबोधत ॥ १४६ ॥ न्यायानुसार चलनेवाला शूद्र महीना में बाल को चनवावे, मृत्यु- सूतक और जन्मसूतक में वैश्य के समान व्यवहार करे और ब्राह्मण का जूॅठा अन्न खावे। मुख से शरीर पर जो छीटें पड़ती हैं वे शरीर को जूॅठा नहीं करतीं। मुख में गया मूंछ का बाल और दांतों की झिरियों में रहा अन्न भी जूॅठा नहीं करता । दूसरे को कुल्ला करानेवाले के पैर पर जो छीटें पड़ती हैं उनको भूमि के जल- बिन्दु समान मानना चाहिए। उनसे कोई अशुद्ध नहीं होता । हाथ में अन्न वगैरह हो और जूॅठे अपवित्र वस्तु का स्पर्श होजाय तो उसको बिना भूमि में रक्खे ही, आचमन से पवित्र होजाता है। घमन और दस्त होजाने पर, स्नान करके घी का आचमन करे, भोजन करके कुल्ला करे और मैथुन के बाद स्नान करे तब शुद्धि होती है। सोकर, छींककर, खाकर, थूककर, झूठ बोलकर, जल पीकर और पढ़ने के समय पवित्र होनेपरभी आचमन करना चा- हिए। यह सब संपूर्ण वर्णों की शौचविधि कही गई है, अब स्त्रियों के धर्म सुनो ॥ १४०-१४६ ॥ बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता । न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किंचित्कार्यं गृहेष्वपि ॥ १४७ ॥ बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने । पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्॥ १४८॥ पित्रा भर्त्रा सुतैर्वापि नेच्छेद्विरहमात्मनः । एषां हि विरहेण स्त्री गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले ॥ १४६ ॥ सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया । २४