भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 649 में से

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के छिद्रों को खुद जाने । राजा, कछुवे के समान राजकीय अङ्गों को छिपा रक्खे, जिससे अपना छिद्र न ज़ाहिर होवे। बगला की भांति एकचित्त होकर, राजकार्यों का विचार करे। सिंह के समान शत्रुओं से पराक्रम रक्खे, भेड़िये के समान मौक़ा पाकर शत्रुक्षय करे। और खरगोश के समान, आपत्तियों से भग जावे ॥ १०३-१०६॥ एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः । तानानयेद्वशं सर्वान्सामदिभिरुपक्रमैः ॥ १०७ ॥ यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैनिभिः । दण्डेनैव प्रसह्यैतांञ्छनकैर्वशमानयेत् ॥ १०८ ॥ सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः । सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ १०६ ॥ यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति । तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ॥ ११० ॥ इस प्रकार विजय करनेवाले राजा के जो शत्रु हों उनको साम- दाम-भेद से अपने वश में करे। यदि पहले तीन उपायों से शत्रु वश में न हो तो, उनको दण्ड द्वारा, धीरे धीरे अधीन करे। विचार- वान् पुरुष साम, दाम, भेद, दण्ड इन चार उपायों में, राज्यवृद्धि के लिए साम और दण्ड की प्रशंसा करते हैं। जैसे खेत निराने वाला घास उखाड़ कर अन्न की रक्षा करता है, वैसे, राजा चोर, लुटेरों का नाश करे, राष्ट्र की रक्षा करे ॥ १०७-११० ॥ मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया । सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः॥१११॥ शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा । तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥११२॥ २६

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