मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजिसकी पहिचान होवे वह उसका लक्षण कहलाता है; चोदना-लक्षण है जिस का ऐसा अर्थ=कल्याण के साधन अग्निहोत्र आदि कर्म, धर्म है। यहां पर आचार्यों ने उक्त सूत्र की यों भी योजना की है- ‘धर्मः चोदनालक्षणः अर्थः ’=धर्म, विधिरूप; कल्याण- साधन है। इस प्रकार सूत्र की योजना करने से धर्म में प्रमाण का लाभ और दो नियम सिद्ध होते हैं । पहला नियम—‘यो धर्मः तत्र चोदनैव प्रमाणम् ’ अर्थात् जो धर्म है। उसमें विधिवाक्यही प्रमाण है । इससे ‘अग्नि, धूम आदि पदार्थों के समान धर्म के साधन में प्रत्यक्ष आदि प्रमाण समर्थ नहीं हैं’ यह बात सिद्ध हुई। पहले नियम के फल को दिख- लानेवाला प्रत्यक्ष सूत्र है-‘सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धिजन्म तत्प्रत्यक्षमनिमित्तं विद्यमानोपलम्भनत्वात् ’ ( मी० द० १ । १ । ४ ) अर्थ-परीक्षक की चक्षु आदि इन्द्रियों का वर्तमान विषयों के साथ संयोगरूप संवन्ध होने पर जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह प्रत्यक्ष कहाजाता है । प्रत्यक्ष (प्रमाण) धर्म (प्रमेय) के ज्ञान करने में कारण नहीं है, क्योंकि वर्तमान वस्तुओं ही की इन्द्रियों से उपलब्धि होती है। अर्थात् ज्ञानकाल में वर्तमान न रहने के कारण धर्म इन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष होने के योग्य नहीं है। इसी अभिप्राय को लेकर चातुर्वर्ण्यशिक्षा में कहा है- ‘प्रत्यक्षयोगं सहते न धर्म- स्ततोऽनुमापि प्रतिरुद्धवीर्या ।
१ यह ग्रन्थत्न भी पूज्यपाद श्री ६ द्विवेदीजी कृत है !