मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवां अध्याय । २६६ अधर्मों को तीन उपायों से सदा वश में रक्खे-नज़रबंद, क़ैद और बैंत आदि से मारकर ॥ ३०६-३१० ॥ निग्रहेण हि पापानां साधूनां संग्रहेण च । द्विजातय इवेज्याभिः पूयन्ते सततं नृपाः ॥ ३११ ॥ क्षन्तव्यं प्रभुणा नित्यं क्षिपतां कार्थिणां नृणाम् । बालवृद्धातुराणां च कुर्वता हितमात्मनः ॥ ३१२ ॥ यः क्षिप्तो मर्षयत्यार्त्तैस्तेन स्वर्गे महीयते । यस्त्वैश्वर्यान्न क्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ ३१३ ॥ राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता । आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवं कर्मास्मि शाधि माम् ॥ ३१४॥ स्कन्धेनादाय मुसलं लगुडं वापि खादिरम् । शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा ॥ ३१५ ॥ शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते । अशासित्वात्तु तं राजा स्तेनस्याप्नोतिकिल्बिषम् ॥ ३१६॥ पापियों को दण्ड देने से और साधु पुरुषों का संग्रह करने से राजा पवित्र होता है, जैसे यज्ञ करने से ब्राह्मण पवित्र होता है। कोई वादी-प्रतिवादी और बालक, वृद्ध और पीड़ित मनुष्य अपने दुःख से दुखी होकर कोई कुवचन कह दें तो राजा उनको क्षमा करे। जो आक्षेप वचनों को सहन कर लेता है वह राजा स्वर्ग- गामी होता है और जो ऐश्वर्य के मद से नहीं सहता, वह नरक- गामी होता है। चोर शिर के बाल खोले दौड़कर राजा के पास अपने अपराध को निवेदन करे, खैर की लकड़ी का मूसल या लट्ठ अथवा जिसमें दोनों तरफ़ धार हो ऐसी बरछी या लोह का दण्डा कंधे पर रखकर दण्ड के लिए प्रार्थना करे। उस हालत में राजा के दण्ड देने वा छोड़ देने से चोर को चोरी का पाप नहीं