मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३२ मनुस्मृति । मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत् । व्याधिता वाधिवेत्तव्या हिंस्रार्थघ्नी च सर्वदा ॥ ८० ॥ वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याऽब्दे दशमे तु मृतप्रजा । एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ ८१ ॥ या रोगिणी स्यात्तु हिता संपन्ना चैव शीलतः । सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥८२॥ अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् । सा सद्यः संनिरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ॥८३॥ प्रतिषिद्धापि चेद्यातु मद्यमभ्युदयेष्वपि । प्रेक्षासमाजं गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ॥८४॥ यदि स्वाश्चापराश्चैव विन्देरन् योषितो द्विजाः । तासां वर्णक्रमेण स्याज्ज्यैष्ठ्यं पूजा च वेश्म च ॥८५॥ जो स्त्री अपने जुआरी, मद्यप और रोगातुर पति की सेवा न करे उसके भूषण आदि लेकर तीन महीने के लिए त्याग दे । परन्तु जो पागल, पतित, नपुंसक, वीजहीन, पापरोगी भी अपने पति की सेवा करे उसको न त्यागे, न कोई चीज़ छीने । जो स्त्री मद्यप, दुराचारिणी, उलटा बर्ताव करनेवाली, रोगिणी मार पीट करनेवाली, फ़िज़ूल खर्च करनेवाली हो उसके जीतेही दूसरा विवाह करलेवे । ऋतुकाल से आठ वर्ष तक वंध्या रहे, दशवर्ष तक बालक होकर मरते जायँ, कन्या उत्पन्न होते ग्यारह वर्ष होजायँ और स्त्री कटुभाषी हो तो दूसरा विवाह करलेवे । परन्तु जो रोगी होकर भी पति का हित करे, सुशीला हो तो उसकी संमति से दूसरा विवाह करे और उसका अपमान कभी न करे । दूसरी स्त्री के आने पर पूर्व स्त्री रूठकर घरसे निकल जाती हो तो उस को रोके या सब के समक्ष त्याग दे । उत्सवों के