भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 649 में से

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पृष्ठ 471

नवाँ अध्याय । ३३१ श्वेत वस्त्र पहने मन, वाणी, शरीर से शुद्ध उस कन्या के साथ उसका देवर * गमन करे और सन्तान होने तक ऋतुकाल में उक्तरीति से एक एक बार गमन करे । चतुर पुरुष एक बार कन्या देकर फिर दूसरे को न दें, क्योंकि एक बार वाग्दान करके दूसरे को देने से चोरी का पाप लगता है । जो कन्या रोगी, दुष्ट और छल से दी गई हो, उसको विधिपूर्वक ग्रहण करके भी त्याग देवे । जो दोषवाली कन्या का बिना दोष कहे विवाह कर दे उस दुरात्मा पुरुष के दानको त्याग दे । कार्यवश विदेश जाने वाला मनुष्य स्त्री के भरण पोषण का प्रबन्ध करके जाय । क्योंकि सदाचारी स्त्री भी अन्न-वस्त्र के लिए दुखी होकर बिगड़ जाती हैं। प्रबन्ध करके पति के विदेश जाने पर स्त्री नियम से रहे, शृङ्गार आदि न करे । और प्रबन्ध बिना किए चला गया हो तो सीना कातना आदि उद्यम से निर्वाह करे । पति, धर्मकार्य के लिए विदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या, यश के लिए गया हो तो छः वर्ष और सुख के लिए गया हो तो तीन वर्ष बाट देखकर पति के पास चली जाय । दुःखदायी स्त्री की पति एक वर्ष प्रतीक्षा करे । उसके बाद आभूषणादि छीनकर उसके साथ न रहे ॥ ७०-७७ ॥ अतिक्रामेत्प्रमत्तं या मत्तं रोगार्तमेव वा । सा त्रीन् मासान् परित्याज्या विसूपणापरिच्छदा॥७८॥ उन्मत्तं पतितं क्लीबमबीजं पापरोगिणम्। न त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्च न च दायापवर्तनम्॥७९॥ * ‘कुहस्विद्दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोपतुः । कोवांशयुत्रा विधिवेवदेवरंमर्यन योषा कृणुते सधस्थआ ।’ ऋ० मं० १०; सू० ४० । मं० २ । इसी श्रुति के अभिप्राय से, वाग्दान के बाद मर जाने पर देवर के साथ विवाह मनु ने लिखा है । इसका अर्थ नियोग नहीं है । यह मत सर्वदेशी है ।

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