मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवाँ अध्याय । ३३१
नवाँ अध्याय । ३३१ श्वेत वस्त्र पहने मन, वाणी, शरीर से शुद्ध उस कन्या के साथ उसका देवर * गमन करे और सन्तान होने तक ऋतुकाल में उक्तरीति से एक एक बार गमन करे । चतुर पुरुष एक बार कन्या देकर फिर दूसरे को न दें, क्योंकि एक बार वाग्दान करके दूसरे को देने से चोरी का पाप लगता है । जो कन्या रोगी, दुष्ट और छल से दी गई हो, उसको विधिपूर्वक ग्रहण करके भी त्याग देवे । जो दोषवाली कन्या का बिना दोष कहे विवाह कर दे उस दुरात्मा पुरुष के दानको त्याग दे । कार्यवश विदेश जाने वाला मनुष्य स्त्री के भरण पोषण का प्रबन्ध करके जाय । क्योंकि सदाचारी स्त्री भी अन्न-वस्त्र के लिए दुखी होकर बिगड़ जाती हैं। प्रबन्ध करके पति के विदेश जाने पर स्त्री नियम से रहे, शृङ्गार आदि न करे । और प्रबन्ध बिना किए चला गया हो तो सीना कातना आदि उद्यम से निर्वाह करे । पति, धर्मकार्य के लिए विदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या, यश के लिए गया हो तो छः वर्ष और सुख के लिए गया हो तो तीन वर्ष बाट देखकर पति के पास चली जाय । दुःखदायी स्त्री की पति एक वर्ष प्रतीक्षा करे । उसके बाद आभूषणादि छीनकर उसके साथ न रहे ॥ ७०-७७ ॥ अतिक्रामेत्प्रमत्तं या मत्तं रोगार्तमेव वा । सा त्रीन् मासान् परित्याज्या विसूपणापरिच्छदा॥७८॥ उन्मत्तं पतितं क्लीबमबीजं पापरोगिणम्। न त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्च न च दायापवर्तनम्॥७९॥ * ‘कुहस्विद्दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोपतुः । कोवांशयुत्रा विधिवेवदेवरंमर्यन योषा कृणुते सधस्थआ ।’ ऋ० मं० १०; सू० ४० । मं० २ । इसी श्रुति के अभिप्राय से, वाग्दान के बाद मर जाने पर देवर के साथ विवाह मनु ने लिखा है । इसका अर्थ नियोग नहीं है । यह मत सर्वदेशी है ।
३३२ मनुस्मृति । मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत् । व्याधिता वाधिवेत्तव्या हिंस्रार्थघ्नी च सर्वदा ॥ ८० ॥ वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याऽब्दे दशमे तु मृतप्रजा । एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ ८१ ॥ या रोगिणी स्यात्तु हिता संपन्ना चैव शीलतः । सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥८२॥ अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् । सा सद्यः संनिरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ॥८३॥ प्रतिषिद्धापि चेद्यातु मद्यमभ्युदयेष्वपि । प्रेक्षासमाजं गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ॥८४॥ यदि स्वाश्चापराश्चैव विन्देरन् योषितो द्विजाः । तासां वर्णक्रमेण स्याज्ज्यैष्ठ्यं पूजा च वेश्म च ॥८५॥ जो स्त्री अपने जुआरी, मद्यप और रोगातुर पति की सेवा न करे उसके भूषण आदि लेकर तीन महीने के लिए त्याग दे । परन्तु जो पागल, पतित, नपुंसक, वीजहीन, पापरोगी भी अपने पति की सेवा करे उसको न त्यागे, न कोई चीज़ छीने । जो स्त्री मद्यप, दुराचारिणी, उलटा बर्ताव करनेवाली, रोगिणी मार पीट करनेवाली, फ़िज़ूल खर्च करनेवाली हो उसके जीतेही दूसरा विवाह करलेवे । ऋतुकाल से आठ वर्ष तक वंध्या रहे, दशवर्ष तक बालक होकर मरते जायँ, कन्या उत्पन्न होते ग्यारह वर्ष होजायँ और स्त्री कटुभाषी हो तो दूसरा विवाह करलेवे । परन्तु जो रोगी होकर भी पति का हित करे, सुशीला हो तो उसकी संमति से दूसरा विवाह करे और उसका अपमान कभी न करे । दूसरी स्त्री के आने पर पूर्व स्त्री रूठकर घरसे निकल जाती हो तो उस को रोके या सब के समक्ष त्याग दे । उत्सवों के
नवां अध्याय । ३३३
नवां अध्याय । ३३३ समय मना करने पर भी जो स्त्री मद्यपान करे, गान आदि में शरीक हो, उस पर छः कृष्णल दण्ड राजा करे । कोई द्विज अपनी या दूसरी जाति की स्त्री से विवाह करे तो उस की जाति मर्यादा के अनुसार आदर, आभूषण, घर का प्रबन्ध करे ॥ ७८-८५ ॥ भर्तुः शरीरशुश्रूषां धर्मकार्यं च नैत्यकम् । स्वा चैव कुर्यात्सर्वेषां नास्वजातिः कथञ्चन ॥ ८६ ॥ यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितयान्यया । यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ८७ ॥ उन स्त्रियों में जो अपनी जाति की हों वे पतिसेवा और धर्मकर्म करें; दूसरे जाति की कभी न करें । पर जो मूर्खता से अपनी जाति की स्त्री रहते दूसरी से कर्म कराता है उसको चाण्डाल समान जाने--यह ऋषियों ने कहा है ॥ ८६-८७ ॥ उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च । अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधि ॥ ८८ ॥ काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि । न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ ८९ ॥ त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती । ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ ९० ॥ अदीयमानां भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम् । नैनः किञ्चिदवाप्नोति न च यं साधिगच्छति ॥ ९१ ॥ अलङ्कारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा । मातृकं भ्रातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेत् ॥ ९२ ॥
३३४ मनुस्मृति । पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन् । स हि स्वाम्यादतिक्रामेदृतूनां प्रतिरोधनात् ॥ ९३ ॥ कन्या-विवाह । कुलीन, सुंदर और समान जाति का वर मिले तो पिता विवाह- योग्य अवस्था न होने पर भी शास्त्ररीति से कन्यादान कर दे। कन्या को ऋतुमती होने पर भी मरणपर्यन्त बैठी रक्खे पर गुणहीन वर को कभी दान न करे । यदि पिता गुणी वर मिलने पर विवाह न करे और कन्या ऋतुमती होती हो तो वह तीनवर्ष तक प्रतीक्षा करके अपनी इच्छानुसार पति से विवाह कर ले । जिस कन्या का विवाह पिता न करता हो वह यदि स्वयं विवाह कर ले तो कन्या पुरुष को कोई दोष नहीं लगता । स्वयं वर को स्वीकार करनेवाली कन्या पिता-माता या भाई का दिया आभूषण न ले; अगर ले तो चोर है । ऋतुमती कन्या का विवाह करनेवाला उसके पिता को धन न दे । क्योंकि ऋतुकाल में सन्तान का रोक पिता के कारण होनेसे उसका हक्क जाता रहा ॥ ८८-९३ ॥ त्रिंशद्वर्षो वहेत्कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् । त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ ९४ ॥ देवदत्तां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छयात्मनः । तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन् ॥ ९५ ॥ प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः संतानार्थं च मानवाः । तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः ॥ ९६ ॥ कन्यायां दत्तशुल्कायां म्रियेत यदि शुल्कदः । देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ ९७ ॥ तीस वर्ष का पुरुष बारह वर्ष की सुन्दरी कन्या से विवाह करे। या चौबीस वर्ष का आठवर्ष की कन्या से करे। और अग्निहोत्रादि
नवां अध्याय। ३३५
नवां अध्याय। ३३५ धर्म का नाश होता हो तो शीघ्रही करले । पति देवताओं की दी हुई स्त्री को पाता है अपनी इच्छा से नहीं * इसलिए देवताओं के प्रीत्यर्थ उस सती का पालन पोषण नित्य करे। ईश्वर ने गर्भ- धारणार्थ स्त्रियों को रचा और सन्तान पैदा करने को पुरुष रचा इसलिए स्त्री-पुरुष साथ में धर्माचरण करें—यह वेद में कहा है। आसुरविवाह के लिए कन्या का मूल्य दिया हो और उसका पति मर जाय तो कन्या की इच्छा से देवर का विवाह कर दे ॥ ९४-९७ ॥ आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददत् । शुल्कं हि गृह्णन् कुरुते छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ ९८ ॥ एतत्तु न परे चक्रुर्नापरे जातु साधवः । यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ ९९ ॥ नानुशुश्रुम जात्वेतत् पूर्वेष्वपि हि जन्मसु । शुल्कसंज्ञेन मूल्येन छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ १०० ॥ अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः । एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ॥ १०१ ॥ कन्यादान में शूद्र भी धन न ले । जो लेता है वह छिपा हुआ कन्या बेंचता है। यह कर्म पहले सत्पुरुषों ने नहीं किया और न इस समय करते हैं जोकि एक को कन्यादान करके दूसरे को दीजावे । पूर्व कल्पों में भी कन्या-विक्रय नहीं सुना गया। स्त्री- पुरुष मरण पर्यन्त आपस में प्रेमपूर्वक रहकर धर्म आदि चतुर्वर्ग फल को प्राप्त करें। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का परम-धर्म संक्षेप से कहा गया है ॥ ९८-१०१ ॥ तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ । यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ १०२ ॥
- मन्त्र है:-' भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः । ' इत्यादि ।
३३६ मनुस्मृति । एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो वो रतिसंहितः । आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायभागं निबोधत ॥ १०३ ॥ स्त्री-पुरुष विवाह करके ऐसा व्यवहार करें, जिसमें धर्माचरण में अलग न हों। यह स्त्री-पुरुषों का धर्म और आपत्काल में सन्तान- विधि कही गई है। अब दायभाग की व्यवस्था सुनो ॥१०२-१०३ ॥ ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् । भजेरन् पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ॥१०४॥ ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः । शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०५ ॥ ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः । पितॄणामनृणश्चैव स तस्मात् सर्वमर्हति ॥ १०६ ॥ यस्मिन्नृणं संनयति येन चानन्त्यमश्नुते । स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान् विदुः ॥ १०७ ॥ पितेव पालयेत्पुत्रान्ज्येष्ठो भ्रातॄन् यवीयसः । पुत्रवच्चापि वर्तेरञ्ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ १०८ ॥ ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः । ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ॥ १०६ ॥ दायभाग-व्यवस्था । पिता और माता की मृत्यु के बाद, भाई आपस में पिता की सम्पत्ति बाँट ले, पर उनके जीते नहीं बाँट सकते। बड़ा भाई पिता का सब धन ग्रहण करे और शेष भाई जैसे पिता की आशा में जी- विका करते थे, वैसेही भाई के वश में रहकर करें । बड़े पुत्र का जन्म होने से मनुष्य पुत्रवान् होता है और पितृऋण से छूटता है,
इसलिए वह सब धन का स्वामी हो सकता है। जिस के उत्पन्न होने से, पितृऋण दूर होता है। और मोक्ष प्राप्त होता है वही धर्म- पुत्र है। दूसरों को काम से उत्पन्न जाने। बड़ा भाई, छोटे भाइयों का पालन पिता के समान करे। और छोटे भाई, बड़े भाई के साथ पिता के समान धर्मानुसार बर्ताव करें। ज्येष्ठ कुलं को बढ़ाता है और ज्येष्ठ ही नाश करता है, ज्येष्ठ गुणवान् जगत् में पूज्य है और सत्पुरुषों में निंदा नहीं पाता ॥१०४-१०६॥ यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः। अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यात्स संपूज्यस्तु बन्धुवत् ॥११०॥ एवं सह वसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया। पृथग् विवर्द्धते धर्मस्तस्माद्धर्म्या पृथक् क्रिया ॥१११॥ ज्येष्ठस्य विंश उद्धारः सर्वद्रव्याच्च यद्वरम्। ततोऽर्धं मध्यमस्य स्यात्तुरीयं तु यवीयसः ॥ ११२ ॥ ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च संहरेतां यथोदितम्। येऽन्ये ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम् ॥११३॥ जो बड़ा भाई बड़प्पन का बर्ताव करे वह माता-पिता के स- मान है। और वैसा बर्ताव न करे तो बन्धुवत् पूज्य है। भाइयों ने यदि बांट न किया हो तो साथ रहें और बांट कर लिया हो तो अ- लग अलग रहें। अलग रहने से धर्म-कर्म अधिक होता है ❋ इस लिए अलग रहना धर्मानुकूल है। बड़े भाई को बीसवां भाग अ- धिक भाग है और सब पदार्थों में जो उत्तम हो वह भी देना चा- हिए। मध्यम भाई को इसका आधा—चालीसवां भाग अधिक दें और बाक़ी धन को सब भाई समान बांट लें। बड़ा और सब से
❋ बृहस्पति का भी वचन है— 'एकपाकेन वसतां पितृदेवद्विजार्चनम्। एकम्भवद्विभक्तानां तदेवं स्याद् गृहे गृहे ॥' अर्थात् अलग रहने से पञ्चमहायज्ञादि भी अलग होते हैं। यों धर्मवृद्धि होती है। ४३
३३८ मनुस्मृति । छोटा भाई इस प्रकार अपना भाग लें और दूसरे भाइयों का मध्यम भाग होना चाहिए ॥ ११०-११३ ॥ सर्वेषां धनजातानामाददीताग्रयमग्रजः । यच्च सातिशयं किंचिदशतश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ ११४ ॥ उद्धारो न दशस्त्वस्ति संपन्नानां स्वकर्मसु । यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ॥ ११५ ॥ एवं समुद्धृतोद्धारे समानांशान् प्रकल्पयेत् । उद्धारेऽनुद्धृते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ ११६ ॥ एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः पुत्रोऽप्यर्धं ततोऽनुजः । अंशमंशं यवीयांस इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ ११७ ॥ बड़ाभाई गुणवान् हो और दूसरे गुणहीन हों तो सब सम्पत्ति में जो श्रेष्ठ वस्तु हैं उनको बड़ाभाई पावे और गौ वगैरह दश—प- शुओं में जो श्रेष्ठ हो उसको भी पावे। यदि सब भाई गुणी हों तो बड़े भाई को दशमें से श्रेष्ठ वस्तु न देकर, उसके सम्मानार्थ कुछ वस्तु अधिक देवे। इस प्रकार बीसवां भाग निकालकर बाक़ी का बराबर भाग करे । और बीसवां अलग न किया हो तो इसभांति करे—बड़ाभाई दो भाग उससे छोटा ड्योढ़ा और उससे छोटे भाई सब एक एक भाग लें—यह मर्यादा है ॥ ११४-११७ ॥ स्वेभ्योऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भातरः पृथक् । स्वात्स्वाद्दंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥११८॥ अजाविकं सैकशफं न जातु विषमं भजेत् । अजाविकं तु विषमं ज्येष्ठस्यैव विधीयते ॥ ११९ ॥ यवीयाञ्ज्येष्ठभार्यायां पुत्रमुत्पादयेदिति । समस्तत्र विभागः स्यादिति धर्मो व्यवस्थितः॥१२०।
नवां अध्याय । ३३६
नवां अध्याय । ३३६ उपसर्जनं प्रधानस्य धर्मतो नोपपद्यते । पिताप्रधानं प्रजने तस्माद्धर्मेण तं भजेत् ॥ १२१ ॥ पुत्रः कनिष्ठो ज्येष्ठायां कनिष्ठायां च पूर्वजः । कथं तत्र विभागः स्यादिति चेत्संशयो भवेत्॥१२२॥ एकं वृषभमुद्धारं संहरेत स पूर्वजः । ततोऽपरे ज्येष्ठवृषास्तदूनानां स्वमातृतः ॥ १२३ ॥ ज्येष्ठस्तु जातो ज्येष्ठायां हरेद्वृषभ षोडशाः । ततः स्वमातृतः शेषा भजेरन्निति धारणा ॥ १२४ ॥ सदृशस्त्रीषु जातानां पुत्राणामविशेषतः । न मातृतो ज्यैष्ठ्यमस्ति जन्मतौ ज्यैष्ठ्यमुच्यते ॥ १२५॥ प्रत्येक भाई अपने भाग में से चौथा भाग अपनी कुमारी बहिन को दे। जो न देवें पतित होते हैं। वकरी, भेंड़, घोड़ा आदि एक खुरवाले पशुओं का समान भाग करे और कम हों तो न बांटे, क्योंकि वे बड़े भाई के ही होते हैं। छोटा भाई बड़े की स्त्री में नियोग विधि से पुत्र पैदा करे तो उस पुत्र और चचा का समान भाग करे—यह धर्म है। क्षेत्रज पुत्र गौण होता है, इसलिए वह पिता का सब भाग धर्मानुसार नहीं ले सकता। पुत्र पैदा करने में पिता मुख्य है, इस कारण क्षेत्रज पुत्र का भाग पूर्वरीति से करे। प्रथम स्त्री में पुत्र पीछे और द्वितीय स्त्री में प्रथम हो तो, उनका भाग कैसे होना चाहिए? प्रथम स्त्री का पुत्र एक बैल अधिक ले और उसी माता से पैदा हुए छोटे भाई मामूली बैल लेवें। यदि ज्येष्ठ पुत्र दूसरी स्त्री का हो तो एक बैल और पन्द्रह गौ ले और दूसरे भाई अपनी माता के अधिकारानुसार बाँट लें परन्तु एक जाति की स्त्रियों में पुत्र पैदा हों तो उनको समान गिने, माता के बड़ी होने से पुत्र बड़े नहीं होते, किन्तु जन्म से बड़ाई होती है ॥ ११८-१२५ ॥
३४० मनुस्मृति । जन्मज्येष्ठेन चाह्वानं सुब्रह्मण्यास्वपि स्मृतम् । यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतॊ ज्येष्ठता स्मृता ॥ १२६॥ अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् । यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥ १२७॥ अनेन तु विधानेन पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः । विवृद्ध्यर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ॥ १२८ ॥ ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश । सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम्॥१२६॥ जिसका जन्म पहले हुआ हो उस पुत्र का नाम लेकर, 'अमुक का पिता यजन करता है'—ऐसा ज्योतिष्टोम में 'सुब्रह्मण्य' मन्त्र बोलकर इन्द्र का आवाहन होता है। और दो साथ ही पैदा हुए हों, तो भी पहला ज्येष्ठ कहलाता है। जिसके पुत्र न हो, वह कन्या- दान के समय जामाता से नियम करे—इस कन्या से जो पुत्र होगा वह मेरा श्राद्ध आदि करेगा। पहले दक्षप्रजापति ने अपने वंश की वृद्धि के लिए इसी विधि से कन्या को पुत्रिका की थी। दक्ष ने प्रसन्न होकर धर्म को दश, कश्यप को तेरह और राजा सोम को सत्ताईस पुत्री दी थीं ॥ १२६-१२९॥ यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा । तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥१३०॥ मातुस्तु यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः । दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्याखिलं धनम् ॥ १३१ ॥ दौहित्रो ह्यखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् । स एव दद्याद्द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ॥१३२॥
नवाँ अध्याय । ३४१
नवाँ अध्याय । ३४१ पौत्रदौहित्रयोर्लोके न विशेषोऽस्ति धर्मतः । तयोर्हि माता पितरौ संभूतौ तस्य देहतः ॥ १३३ ॥ जैसी आत्मा है वैसा ही पुत्र है । पुत्र और पुत्री समान हैं । इस लिए पिता की आत्मारूप-पुत्री बैठी हो तो दूसरा धन कैसे ले- जाय ? जो धन माता को दहेज में मिला हो वह कन्या का ही भाग है। और पुत्रहीन का सब धन दौहित्र का ही है । जिसको पुत्रिका किया हो उसका पुत्र, अपुत्र-पिता का धन ले और वह पिता और नाना को पिण्डदान करे । लोक में धर्मानुसार पौत्र और दौहित्र में कुछ भेद नहीं है । क्योंकि दोनों के माता-पिता एकही देह से उत्पन्न हुए हैं ॥ १३०-१३३ ॥ पुत्रिकायां कृतायां तु यदि पुत्रोऽनुजायते । समस्तत्र विभागःस्याज्ज्येष्ठतानास्ति हि स्त्रियाः॥१३४॥ अपुत्रायां मृतायां तु पुत्रिकायां कथंचन । धनं तत्पुत्रिकाभर्ता हरेतैवाविचारयन् ॥ १३५ ॥ अकृता वा कृता वापि यं विन्देत्सदृशात्सुतम् । पौत्रीमातामहस्तेन दद्यात्पिण्डं हरेद्धनम् ॥ १३६ ॥ पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥१३७॥ पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात् त्रायते पितरं सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ १३८ ॥ यदि पुत्रिका करने के बाद अपने पुत्र होजाय तो पुत्र और दौहित्र का समान भाग करे । उसमें कन्या की श्रेष्ठता नहीं मानी जाती । पुत्रिका होनेवाली कन्या मरजाय तो उसका पति सब धन ले- जाय । पुत्रिका विधान किया हो वा न किया हो, समान जाति वाले जामाता से जिस पुत्र को पावे-उसीसे नाना पौत्रवान्
३४२ मनुस्मृति । होता है, वही पिण्डदान करे और धन ले । पुरुष पुत्र से स्वर्गलोक को जीतता है, पौत्र से अनन्त—सुख पाता है और पुत्र के पौत्र से सूर्यलोक को पाता है। पुत्र 'पुम्' नामक नरक से पिता को बचाता है इसलिए ब्रह्मा ने स्वयं पुत्र संज्ञा की है ॥ १३४-१३८ ॥ पौत्रदौहित्रयोर्लोके विशेषो नोपपद्यते । दौहित्रोऽपि ह्यमुत्रैनं संतारयति पौत्रवत् ॥ १३६ ॥ मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिका सुतः । द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तत्पितुः पितुः ॥ १४० ॥ उपपन्नो गुणैः सर्वैः पुत्रो यस्य तु दत्रिमः । स हरेतैव तदृक्थं संप्राप्तोऽप्यन्यगोत्रतः ॥ १४१ ॥ लोक में पौत्र और दौहित्र में कुछ अन्तर नहीं है । दौहित्र भी नाना को पौत्र की भांति स्वर्ग पहुँचाता है । पुत्रिका—पुत्र पहला पिण्ड माता को देवे, दूसरा—माता के पिता को, तीसरा—नाना के पिता को देवे । जिसका दत्तक (गोद लिया) पुत्र, सर्वगुणस- म्पन्न हो, वह दूसरे गोत्र से आकर भी उसकी सम्पत्ति का अधि- कारी होता है ॥ १३६-१४१ ॥ गोत्ररिक्थे जनयतुर्न हरेद्दत्रिमः क्वचित् । गोत्ररिक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा ॥ १४२ ॥ अनियुक्तासुतश्चैव पुत्रिण्याप्तश्च देवरात् । उभौ तौ नार्हतो भागं जारजातककामजौ ॥ १४३ ॥ नियुक्तायामपि पुमांन्नार्यां जातोऽविधानतः । नैवार्हः पैतृकं रिक्थं पतितोत्पादितो हि सः ॥ १४४ ॥ हरेत्तत्र नियुक्तायां जातः पुत्रो यथौरसः । क्षेत्रिकस्य तु तद्बीजं धर्मतः प्रसवश्च सः ॥ १४५ ॥
नवां अध्याय। ३४३
नवां अध्याय। ३४३ धनं यो बिभृयाद् भ्रातुर्मृतस्य स्त्रियमेव च ॥ सोऽपत्यं भ्रातुरुत्पाद्य दद्यात्तस्यैव तद्धनम् ॥ १४६ ॥ दत्तकपुत्र अपने उत्पादक पिता के गोत्र और धन को नहीं पा सकता। जिसका गोत्र और धन पाता है, उसी को पिण्डदान दे सकता है। बिना नियोगविधि से पैदा पुत्र और पुत्रवाली के दे- वर से उत्पन्न पुत्र ये दोनों पिता के धन के अधिकारी नहीं होते। क्योंकि ये जारज और कामज हैं। नियुक्त स्त्री में भी विधान के बिना पैदा हुआ पुत्र, पिता का धन नहीं पासकता वह पतित से पैदा है परन्तु विधि से नियुक्त स्त्रीमें उत्पन्न पुत्र औरस पुत्र के समान है। वह क्षेत्रवाले का बीज है-धर्म से उत्पन्न हुआ है। जो पुरुष मृत भाई की स्त्री और उस के धन का ग्रहण करे, वह नियोग- विधि से पुत्र पैदा करके उसको भाई का धन दे देय ॥ १४२-१४६ ॥ या नियुक्तान्यतः पुत्रं देवराद्वाप्यवाप्नुयात् । तं कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ॥ १४७ ॥ एतद्विधानं विज्ञेयं विभागस्यैकयोनिषु । बह्वीषु चैकजातानां नानास्त्रीषु निबोधत ॥ १४८ ॥ ब्राह्मणस्यानुपूर्वेण चतस्रस्तु यदि स्त्रियः । तासां पुत्रेषु जातेषु विभागोऽयं विधिः स्मृतः॥ १४६॥ जो नियुक्त-स्त्री दूसरे पुरुष से पुत्र पैदा करे वह पुत्र कामज है। पिता की सम्पत्ति के अयोग्य है। एक जाति की स्त्रियों में पैदा हुए पुत्रों के विभाग की यह रीति है। अब एक पुरुष से अनेक जाति की स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रों का हिस्सा-बांट सुनो। ब्राह्मण के यदि क्रम से चारों वर्ण की स्त्रियां हों तो उनमें पुत्र पैदा होने पर इस प्रकार विभाग करे ॥ १४७-१४६ ॥ कीनाशो गो वृषो यानमलंकारश्च वेश्म च । विप्रस्योद्धारिकं देयमेकांशश्च प्रधानतः ॥ १५० ॥
३४४ मनुस्मृति । त्र्यंशं दायाद्धरेद्विप्रो द्वावंशौ क्षत्रियासुतः । वैश्याजः सार्धमेवांशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ १५१ ॥ सर्वं वा रिक्थजातं तद्दशधा परिकल्प्य च । धर्म्यं विभागं कुर्वीत विधिनानेन धर्मवित् ॥ १५२ ॥ चतुरोंशान् हरेद्विप्रस्त्रीनंशान् क्षत्रियासुतः । वैश्यापुत्रो हरेद् द्वयंशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ १५३ ॥ यद्यपि स्यात्तु सत्पुत्रोऽप्यसत्पुत्रोऽपि वा भवेत् । नाधिकं दशमाद्दद्याच्छूद्रापुत्राय धर्मतः ॥ १५४ ॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रापुत्रो न रिक्थभाक् । यदेवास्य पिता दद्यात्तदेवास्य धनं भवेत् ॥ १५५ ॥ खेती का बैल, सांड़, सवारी का घोड़ा, गहना, रहने का स्थान और जो क़ीमती चीज़ हो उनको ब्राह्मणी के पुत्र को देवे। ब्राह्मणी का पुत्र धन में तिहाई ले, क्षत्रिया का दो भाग, वैश्या का डेढ़ भाग और शूद्रा का एक भाग ले । अथवा सब सम्पत्ति का दश भाग करके धर्मज्ञ पुरुष धर्मानुसार यों भाग करे—ब्राह्मणीपुत्र को चार भाग, क्षत्रियापुत्र को तीन भाग, वैश्यापुत्र को दो भाग और शूद्रापुत्र को एक भाग दे । यद्यपि सत्पुत्र हो वा असत्पुत्र हो पर धर्म से शूद्रापुत्र को दशभाग से अधिक न दे । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के शूद्रा से पुत्र हो तो वह धन का भागी नहीं होता। जो कुछ पिता उसको दे वही उसका धन होगा ॥ १५०-१५५ ॥ समवर्णासु ये जाताः सर्वे पुत्रा द्विजन्मनाम् । उद्धारं ज्यायसे दत्त्वा भजेरन्नितरे समम् ॥ १५६ ॥ शूद्रस्य तु सवर्णैव नान्या भार्या विधीयते । तस्यां जाताः समांशाः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ॥ १५७ ॥
नवाँ अध्याय। ३४५
नवाँ अध्याय। ३४५ समान् वर्ण की स्त्रियों में जो पुत्र उत्पन्न हों वे बड़े भाई को कुछ अधिक देकर, बाक़ी सम्पत्ति को समान बाँट लें। शूद्र की समान जाति ही की भार्या होती है, दूसरे वर्ण की विधि नहीं है। उसमें यदि सौ पुत्र भी हों तो भी वे, समान-भाग के अधिकारी होंगे ॥ १५६-१५७ ॥ पुत्रान् द्वादश यानाह नृणां स्वायम्भुवो मनुः । तेषां षड्वन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः ॥ १५८ ॥ औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च । गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवाश्च षट् ॥ १५९ ॥ कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा । स्वयं दत्तश्च शौद्रश्च षडदायादबान्धवाः ॥ १६० ॥ यादृशं फलमाप्नोति कुप्लवैः संतरन् जलम् । तादृशं फलमाप्नोति कुपुत्रैः संतरंस्तमः ॥ १६१ ॥ यद्येकरिक्थिनौ स्यातामौरसक्षेत्रजौ सुतौ । यस्य यत्पैतृकं रिक्थं स तद्गृह्णीत नेतरः ॥ १६२ ॥ एक एवौरसः पुत्रः पित्र्यस्य वसुनः प्रभुः । शेषाणामानृशंस्यार्थं प्रदद्यात्तु प्रजीवनम् ॥ १६३ ॥ षष्ठं तु क्षेत्रजस्यांशं प्रदद्यात्पैतृकाद्धनात् । औरसो विभजन् दायं पित्र्यं पञ्चममेव वा ॥ १६४ ॥ औरसक्षेत्रजौ पुत्रौ पितृरिक्थस्य भागिनौ । दशापरे तु क्रमशो गोत्ररिक्थांशभागिनः ॥ १६५ ॥ स्वायम्भुव मनुने मनुष्यों के जो बारह पुत्र कहे हैं, उनमें छः बान्धव और दायाद कहलाते हैं और छः अदायाद-अबान्धव हैं। ४४
३४६ मनुस्मृति । औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध ये छः दा- याद (सम्पत्ति के भागी) बान्धव हैं। कानीन, सहोढज, क्रीतक, पौनर्भव, स्वयंयत्त और शौद्र ये छः अदायाद—अवान्धव हैं। टूटी- फूटी नांव से जल तैरता हुआ जैसा फल पाता है, वैसाही फल कु- पुत्रों से नरकपार होने में पिता आदि को मिलता है। यदि अपुत्र के क्षेत्र में नियोगविधि से एक पुत्र हो, और किसी प्रकार दूसरा औरस पुत्र भी हो जाय तो दोनों क्षेत्रज—औरस अपने अपने पिताकी सम्पत्ति के भागी हैं। एक औरस पुत्रही पिता के धन का भागी होता है। शेष को दयावश, अन्न-वस्त्र देना चाहिए। औरस पुत्र पिताकी सम्पत्ति का विभाग करे तो क्षेत्रज को छठवां या पां- चवां भाग देवे। औरस और क्षेत्रज उक्त रीति से पितृधन के अधिकारी हैं। बाक़ी दश पुत्र, क्रम से गोत्रधन के भागी हैं ॥ १५८-१६५ ॥ स्वक्षेत्रे संस्कृतायां तु स्वयमुत्पादयेद्धि यम् । तमौरसं विजानीयात् पुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥ १६६ ॥ यस्तल्पजः प्रमीतस्य क्लीबस्य व्याधितस्य वा । स्वधर्मेण नियुक्तायां स पुत्रः क्षेत्रजः स्मृतः ॥ १६७ ॥ माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि । सदृशं प्रीतिसंयुक्तं स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः ॥ १६८ ॥ सदृशं तु प्रकुर्याद्यं गुणदोषविचक्षणम् । पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्तं स विज्ञेयश्च कृत्रिमः ॥ १६६ ॥ उत्पद्यते गृहे यस्य न च ज्ञायेत कस्य सः । स गृहे गूढ उत्पन्नस्तस्य स्याद्यस्य तल्पजः ॥ १७० ॥ मातापितृभ्यामुत्सृष्टं तयोरन्यतरेण वा । यं पुत्रं परिगृह्णीयादपविद्धः स उच्यते ॥ १७१ ॥
नवां अध्याय । ३४७
नवां अध्याय । ३४७ पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः । तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवम् ॥ १७२ ॥ या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताज्ञातापि वा सती । वोढुः स गर्भो भवति सहोढ इति चोच्यते ॥ १७३ ॥ पुत्रों की संज्ञा । विवाह-संस्कार से सवर्णा स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसको औरस कहते हैं—वह मुख्य है । मृत, नपुंसक और रोगी की स्त्री में नियोग से जो पुत्र होता है वह 'क्षेत्रज' है माता- पिता प्रसन्नतासे जल लेकर आपत्ति में जिसको देदें । वह दत्तक पुत्र है । जो सजातीय, गुण-दोषज्ञ और पुत्र गुणों से युक्त हो, वह पुत्र करलिया जाय तो 'कृत्रिम' कहलाता है। जिसके घर पुत्र पैदा हो, पर यह न मालूम हो किसका है ? वह घर में गुप्तरीति से पैदा 'गूढोत्पन्न' जिसकी स्त्री में हो, उसका है। माता-पिता या एकही ने जिसको त्याग दिया हो उसका जो पालन करे वह उसका 'अपविद्ध' पुत्र कहलाता है। अपने पिता के घर, सजा- तीय पुरुष से, एकान्त में कन्या जो पुत्र पैदा करे उसको 'कानीन' कहते हैं। वह उस कन्या से विवाह करनेवाले का होता है। जो ज्ञात अथवा, अज्ञात गर्भिणीके साथ विवाह किया जाय वह उसी पति का गर्भ है और उसको 'सहोढ' कहते हैं ॥ १६६-१७३ ॥ क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात् । स क्रीतकः सुतस्तस्य सदृशोऽसदृशोऽपि वा ॥१७४॥ या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वयेच्छया । उत्पादयेत्पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ॥ १७५ ॥ सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागतापि वा । पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ॥ १७६ ॥
यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम् ।
३४८ मनुस्मृति । मातापितृविहीनो यस्त्यक्तो वा स्यादकारणात् । आत्मानं स्पर्शयेद्यस्मै स्वयं दत्तस्तु स स्मृतः ॥ १७७॥ यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम् । सं पारयन्नेव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ॥ १७८ ॥ दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत् । सोऽनुज्ञातो हरेदंशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ १७६ ॥ जो अपनी उत्तर क्रिया के लिए माता-पिता से जिस पुत्र को खरीदता है वह उसका 'क्रीतक पुत्र' होता है, खरीददार के स- मान हो अथवा न हो । पति की त्यागी या विधवा स्त्री दूसरे की स्त्री होकर पुत्र जने उसको 'पौनर्भव' कहते हैं। वह पति की त्यागी या विधवा स्त्री अक्षतयोनि हो तो, प्रायश्चित्त करके दू- सरे—पुनर्भू पति के पास रह सकती है । जो माता-पिता से हीन हो, बिना कारण ही जिस पुत्र को माता-पिता ने त्याग दिया हो, वह अपने को जिसे देदे वह 'स्वयं दत्त' पुत्र कहाता है। ब्राह्मण का- मना से शूद्रा में जिस पुत्र को पैदा करे, वह जीता ही मुर्दा के मु- वाफ़िक़ है इसलिये उसे 'पारशव' कहते हैं। शूद्र का दासी में या दास की दासी में जो पुत्र हो, वह पिता की आज्ञा से अपना भाग लेये-यह धर्ममर्यादा है ॥ १७४-१७६ ॥ क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् । पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान् मनीषिणः ॥ १८०॥ य एतेऽभिहिताः पुत्राः प्रसङ्गादन्यवीजजाः । यस्य ते बीजतो जातास्तस्य ते नेतरस्य तु ॥ १८१ ॥ ये क्षेत्रज आदि जो ग्यारह पुत्र कहे हैं, उनको पितर क्रिया का लोप न हो—इसकारण पुत्र-प्रतिनिधि आचार्यों ने कहा है। ये
नवाँ अध्याय । ३४६
नवाँ अध्याय । ३४६ औरस पुत्र के प्रसङ्ग से जो दूसरे के वीर्य्य से पुत्र गिनाये, वे जिन के वीर्य्य से पैदा हैं उन्हींके हैं—दूसरे के नहीं हैं ॥ १८०-१८१ ॥ भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत्पुत्रवान् भवेत् । सर्वांस्तांस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ १८२ ॥ सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत् । सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः ॥ १८३ ॥ श्रेयसः श्रेयसोऽलाभे पापीयान् रिक्थमर्हति । बहवश्चेत्तु सदृशाः सर्वे रिक्थस्य भागिनः ॥ १८४ ॥ न भ्रातरो न पितरः पुत्रा रिक्थहराः पितुः । पिता हरेदपुत्रस्य रिक्थं भ्रातर एव च ॥ १८५ ॥ सहोदर भाइयों में यदि एक भी पुत्रवान् हो तो उस पुत्र से सब भाई पुत्रवान् हैं—ऐसा मनुजी कहते हैं । एक पुरुष की कई स्त्रियों में जो एक भी पुत्रवाली हो तो उससे सब पुत्रवाली हैं । औरस आदि पहले पहले पुत्र न हों तो अगले अगले पुत्र, पिताके धन के अधिकारी हैं और यदि बहुतसे पुत्र समानही हों तो, सब धन के भागी हैं । पिता के धनको लेने वाले पुत्रही हैं, न भाई हैं न चचा आदि हैं । परन्तु पुत्रहीन का धन उसका पिता वा भाई ले सकता है ॥ १८२-१८५ ॥ त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्त्तते । चतुर्थः संप्रदातैषां पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १८६ ॥ अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धनं भवेत् । अत ऊर्ध्वंस कुल्यः स्यादाचार्यः शिष्य एव वा ॥ १८७ ॥ सर्वेषामप्यभावे तु ब्राह्मणा रिक्थभागिनः । त्रैविद्याः शुचयो दान्तास्तथा धर्मोन हीयते ॥ १८८ ॥
३५० मनुस्मृति । अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमिति स्थितिः । इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेन्नृपः ॥ १८६ ॥ बाप, दादा और परदादा इन तीन को जल और पिण्डदान होता है। देनेवाला चौथा होता है-पाँचवें का सम्बन्ध नहीं है। जो सपिण्डों में अधिक समीप हो, उसका धन होता है । वह न हो तो कुलपुरुष वह भी न हो तो आचार्य, वह भी न हो तो शिष्य अधिकारी होता है । ये सब भी न हों तो धन ब्राह्मण पाते हैं। पर वे तीनों वेद के ज्ञाता, भीतर-बाहर से पवित्र जिते- न्द्रिय हों, जिससे श्राद्धादि कर्मों में हानि न पहुँचे । कोई भी लेने वाला न हो, तो भी ब्राह्मण का धन राजा को न लेना चाहिए- धर्ममर्यादा है। परन्तु दूसरे वर्णों का धन, कोई लेनेवाला न हो तो राजा ले सकता है ॥ १८६-१८६ ॥ संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् । तत्र तद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ॥ १६०॥ द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रिया धने । तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्स गृहीत नेतरः ॥ १६१ ॥ जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः । भजेरन् मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ॥ १६२॥ यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः । मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ॥ १६३ ॥ कोई पुत्रहीन मरजाय तो उसके सगोत्र में से पुत्र ले और उस पुरुष का जो धन हो, उसे सौंप दे। एक स्त्री में दो पुरुषों से पैदा दो पुत्र, औरस-पौनर्भव धन के लिए विवाद करें तो, जिसके पिता का जो धन हो वही उसको ले, दूसरा न लेय । माताके म- रने पर सब सहोदर भाई और कुमारी बहनें माता के धन को