मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
६६ मनुस्मृति। मेदोऽसृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ १८२॥ वेदज्ञ भी जो शूद्र याजक का दान लोभ से लेता है, वह पानी में कच्चे वरतन की भांति शीघ्र ही नष्ट होजाता है । सोमलता बेंचने वाले को जो हव्य, कव्य देवे वह विष्ठा होती है । वैद्य को देने से पीव-रक्त, देवलक-पुजारी को देने से नाश, व्याजखोर को देने से निष्फल होजाता है । श्राद्ध में जो वाणिज्य करनेवाले को दिया जाता है वह दोनों लोक में निष्फल होता है । पुनर्विवाह के लड़के को देने से राख में होम की भांति व्यर्थ होता है और जो दूषित मनुष्य हैं उनको देने से दाता के जन्मान्तर में भोजन के लिए- मेद, रुधिर, मांस, मज्जा और हड्डी होजाता है ॥ १७६-१८२ ॥ अपांक्त्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः । तान्निबोधत कात्स्न्र्येनद्विजाग्र्यान्पंक्तिपावनान्॥ १८३॥ अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १८४॥ त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् । ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च ॥ १८५ ॥ दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है वे इस प्रकार के होने चाहिएं-जो चारों वेदों के जाननेवाले और उसके अङ्गों के जाननेवाले, श्रोत्रिय और परम्परा से वेदाध्यायी हैं वेही पंक्ति पावन होते हैं । त्रिणाचिकेतनामक यजुर्वेद के भाग को पढ़ने वाला ब्राह्मण, पञ्चाग्निहोत्री, त्रिसुपर्ण नामक ऋग्वेद के भाग को पढ़नेवाला, शिक्षा आदि छः अङ्गों का ज्ञाता, ब्राह्मविवाह से पैदा पुत्र और साम गान करनेवाला ये छः पंक्तिपावन जानना चाहिए ॥ १८३-१८५ ॥ वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः । शतायुश्चैव विज्ञेया ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः ॥ १८६ ॥
तीसरा अध्याय। ५७
तीसरा अध्याय। ५७ पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते। निमन्त्रयेतऽयवरान्सम्यग्विप्रान्यथोदितान्॥१८७॥ निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा। न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत्॥१८८॥ निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्। वायुवच्चानुगच्छन्ति तथा सीनानुपासते ॥ १८६ ॥ वेदार्थ का ज्ञाता, उसका अध्यापक, ब्रह्मचारी, हज़ार गोदान करनेवाला और सौ वर्षका ये पंक्तिपावन होते हैं । श्राद्ध के पहले दिन वा उसी दिन उक्त गुणवाले ब्राह्मणों को आदर से तीन वा कम को निमन्त्रण देवे । श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण उस दिन नियम से रहे और वेदाध्ययन न करे । और यही नियम श्राद्ध करानेवाले को भी पालन करना चाहिए । पितर उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के पास आते हैं और वायु के समान पीछे चलते और बैठते हैं ॥ १८६-१८६ ॥ केतितस्तु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः । कथंचिदप्यतिक्रामन् पापः शूकरतां व्रजेत् ॥ १६० ॥ आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदते । दातुर्यद्दुष्कृतं किंचित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ १६१ ॥ अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः । न्यस्तशस्त्रा महाभागाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ १६२ ॥ हव्य और कव्य में नेवता पाकर किसी कारण भोजन न करने से उस ब्राह्मण को दूसरे जन्म में शूकर होना पड़ता है । निम- न्त्रण पाकर कामुक स्त्री से जो भोग करता है, वह दाता के पाप का भागी होता है । क्रोधरहित, पवित्र-रागद्वेषरहित, सदा ब्रह्मचारी, युद्धत्यागी, महाभाग-दया, शील आदि युक्त, देवता रूप पितर हैं। इसलिए भोजन करनेवालों को आचार, विचार से
६८ मनुस्मृति । यस्मादुत्पत्तिरेतेषां सर्वेषामप्यशेषतः । ये च यैरुपचर्याः स्युर्नियमैस्तान्निबोधत ॥ १९३ ॥ मनोर्हैरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः । तेषामृषीणां सर्वेषां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ॥१९४॥ विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः । अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः॥ १९५॥ दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । सुपर्णकिन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोऽद्विजाः ॥ १९६ ॥ इन सब पितरों की जिससे उत्पत्ति हुई है और जो पितर जिन नियमों से जिसके पूज्य हैं वह सुनो । हिरण्यगर्भ के पुत्र मनु के जो मरीचि आदि पुत्र हैं, उनके पुत्र सोमपा आदि पितृगण हैं। विराट् के पुत्र सोमसद्नामक साध्यों के पितर हैं और मरीचि के पुत्र अग्निष्वात्त देवताओं के पितर कहे जाते हैं । दैत्य, दानव, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, पक्षी और किन्नरों के बर्हिषद्नामक पितर हैं ॥ १९३–१९६ ॥ सोमपानाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः । वैश्यानामाज्यपानाम शूद्राणां तु सुकालिनः ॥१९७॥ सोमपास्तु कवेः पुत्रा हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः । पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः ॥ १९८॥ अग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्र्वाहिषदस्तथा । अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत्॥१९६॥ य एते तु गणा मुख्याः पितॄणां परिकीर्त्तिताः । तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ २०० ॥ सोमपा ब्राह्मणों के, हविर्भुज क्षत्रियों के, आज्यपा वैश्यों के और सुकालिननामक शूद्रों के पितर हैं । सोमपा भृगु के पुत्र,
तीसरा अध्याय । ६६
तीसरा अध्याय । ६६ हविष्मन्त अङ्गिरा के पुत्र, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुका- लिन् वशिष्ठ के पुत्र हैं। अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद्, अग्निष्वात्त और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं। ये पितरों के मुख्य गण कहे गये हैं, इनके अनन्त जो पुत्र-पौत्र हैं उनको भी पितर जानना चाहिए ॥ १६७-२०० ॥ ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः । देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ २०१ ॥ राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितैः । वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्प्यते ॥ २०२ ॥ देवकार्याद्द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते । दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ २०३ ॥ तेषामारक्षभूतं तु पूर्वं दैवं नियोजयेत् । रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ॥२०४॥ मरीचि आदि ऋषियों से पितर हुए हैं, पितरों से देवता और मनुष्य हुए हैं। देवताओं से क्रम से स्थावर, जङ्गम रूप जगत् उत्पन्न हुआ है। इन सब पितरों को चांदी के पात्र से वा चांदी लगे पात्र से जलदान करने से अक्षय तृप्ति होती है। देवकार्य से पितृकार्य द्विजों के लिए विशेष गिना जाता है। पितृश्राद्ध प्र- धान कर्म है और देवकर्म उसका अङ्ग गिना जाता है। देवकर्म पूर्व करने से पितृकर्म की पुष्टि होती है। पितृकर्म का रक्षक देव- कर्म पूर्व करे, क्योंकि रक्षारहित श्राद्ध का राक्षस नाश कर देते हैं ॥ २०१-२०४ ॥ दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्र्याद्यन्तं न तद्भवेत् । पित्र्याद्यन्तं त्वीहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ॥२०५॥ शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् । दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ॥ २०६ ॥
१०० मनुस्मृति। अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि । विविक्तेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ २०७ ॥ आसनेषूपक्लृप्तेषु बर्हिष्मत्सु पृथक् पृथक् । उपस्पृष्टोदकान् सम्यग्विप्रान्स्तानुपवेशयेत् ॥ २०८ ॥ इस कारण श्राद्ध में आरम्भ और समाप्ति देवतापूर्वक करे, पित्रादिपूर्वक न करे । उसको करनेवाला वंशसहित नष्ट होजाता है । एकान्त और पवित्र देश में गोबर से भूमि लीपकर उसमें दक्षिण को झुकी वेदी बनावे । खुला स्थान, पवित्र देश, नदीतीर या निर्जन देश में श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। उस स्थान में अलग अलग बिछे हुए कुशासनों पर निमन्त्रित ब्राह्मणों को बैठाना चाहिए ॥ २०५-२०८ ॥ उपवेश्य तु तान् विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान् । गन्धमाल्यैः सुरभिभिरर्चयेद्देवपूर्वकम् ॥ २०६ ॥ येषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपि । अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ॥ २१० ॥ अग्नेः सोमयमाभ्यां च कृत्वाप्यायनमादितः । हविर्दानेन विधिवत्पश्चात्संतर्पयेत् पितॄन् ॥ २११ ॥ अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् । यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥२१२॥ उन सदाचारी ब्राह्मणों को आसनों पर बैठाकर सुगन्ध, चन्दन, पुष्प, धूप आदि से पहिले विश्वेदेव फिर पितरों का पूजन करे। उसके बाद कुश और तिल मिला अर्घ्यजल दान करे और सब की आज्ञा लेकर श्राद्ध करनेवाला ब्राह्मणों के साथ अग्नि में हवन करे । पहले हवन से अग्नि, सोम और यम को तृप्त करे फिर अन्न आदि हवि से पितरों को तृप्त करना चाहिए । यदि अग्नि न हो तो
तीसरा अध्याय।
तीसरा अध्याय। ब्राह्मण के हाथ में ही तीन आहुति देवे, ब्राह्मण अग्निरूप है ऋषियों का मत है ॥ २०६-२१२ ॥ अक्रोधनान् सुप्रसादान् वदन्त्येतान् पुरातनान् । लोकस्याप्यायने युक्ताञ्छाद्धेदेवान् द्विजोत्तमान्॥२१३॥ अपसव्यमग्नौ कृत्वा सर्वमावृतपरिक्रमम् । अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदुदकं भुवि ॥ २१४ ॥ त्रींस्तु तस्माद्धविःशेषात्पिण्डान्कृत्वा समाहितः । औदकेनैव विधिना निर्वपेद्दक्षिणामुखः ॥ २१५ ॥ क्रोधरहित, प्रसन्नचित्त, वृद्ध और लोक की वृद्धि में तत्पर, श्रेष्ठ ब्राह्मण श्राद्ध के पात्र होते हैं । अपसव्य होकर पितरों के निमित्त अग्नि में दो आहुति देकर अपसव्य ही पूर्व दिशा से दक्षिण को पिण्ड छोड़ने की भूमि पर जल छोड़े । हवन की बाक़ी सामग्री का तीन पिण्ड बनाकर दक्षिणमुख दाहने हाथ से कुशों के ऊपर पिण्ड छोड़ना चाहिए ॥ २१३-२१५ ॥ न्युप्य पिण्डांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम् । तेषु दर्भेषु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम् ॥ २१६ ॥ आचम्योदक्परावृत्य त्रिरायम्य शनैरसून् । षडृतूंश्च नमस्कुर्यात् पितॄनेव च मन्त्रवित् ॥ २१७॥ उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः । अवजिघ्रेच्च तान्पिण्डान्यथान्युप्तान्समाहितः॥२१८॥ पिण्डेभ्यस्त्वल्पिकां मात्रां समादायानुपूर्वशः । तानेव विप्रानासीनान् विधिवत्पूर्वमाशयेत् ॥ २१९ ॥ पिण्डों के रखने के बाद वृद्ध प्रपितामह से लेकर ऊपर के तीन लेपभागी पुरुषों की तृप्ति के लिए उन कुशों के पास ही हाथ धोवे । फिर उत्तराभिमुख आचमन और तीन प्राणायाम धीरे से
१०२ मनुस्मृति ।
करके छ ऋतुओं को और पितरों को नमस्कार करे। फिर पिण्ड- दान के पात्र में शेष जल बचा हो उसको पिण्डों के पास धीरे धीरे छोड़े और जिस क्रम से पिण्डों को रक्खा था उसी क्रम से उठाकर सूंघे । पिण्डों में से थोड़ा थोड़ा भाग लेकर प्रथम ब्राह्मणों को विधि से खिलावे अर्थात् जिस पिता के नि- मित्त जो पिण्ड छोड़ा हो उस पिण्ड का भाग उसी पितर के स्थान में बैठे हुए ब्राह्मण को खिलाना चाहिए ॥ २१६-२१९ ॥ ध्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् । विप्रवद्वापि तं श्राद्धे स्वकं पितरमाशयेत् ॥ २२० ॥ पिता यस्य निवृत्तः स्याज्जीवेच्चापि पितामहः । पितुः स नाम संकीर्त्य कीर्तयेत्प्रपितामहम् ॥ २२१ ॥ पितामहो वा तच्छ्राद्धं भुञ्जीतेत्यब्रवीन्मनुः । कामं वा समनुज्ञातः स्वयमेव समाचरेत् ॥ २२२ ॥ यदि पिता जीता हो तो श्राद्ध करनेवाला मरे हुए पितामह आदि तीन पुरुषों का श्राद्ध करे या पितृ ब्राह्मण के स्थान में अपने पिता को ही भोजन करादे। जिसका पिता मरगया हो और पितामह जीता हो, वह पिता का नाम बोलकर प्रपितामह का नाम बोले अर्थात् पिता और प्रपितामह दोनों का श्राद्ध करे। या जीवित पितामह उस श्राद्ध का भोजन करे, यह मनुजी की आज्ञा है । अथवा श्राद्धकर्ता पितामह की आज्ञा से आपही प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह का श्राद्ध करे ॥ २२०-२२२ ॥ तेषां दत्त्वा तु हस्तेषु सपवित्रं तिलोदकम् । तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन् ॥ २२३ ॥ पाणिभ्यां तूपसंगृह्य स्वयमन्नस्य वर्द्धितम् । विप्रान्तिके पितॄन्ध्यायञ्छनकैरुपनिक्षिपेत् ॥ २२४ ॥ उभयोर्हस्तयोर्मुक्तं यदन्नमुपनीयते ।
तीसरा अध्याय। १०३
तीसरा अध्याय। १०३ तद्धिप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः ॥ २२५ ॥ गुणांश्च सूपशाकाद्यान् पयो दधि घृतं मधु । विन्यसेत् प्रयतः पूर्वं भूमावेव समाहितः ॥ २२६ ॥ भक्ष्यं भोज्यं च विविधं मूलानि च फलानि च । हृद्यानि चैव मांसानि पानानि सुरभीणि च ॥ २२७ ॥ उपनीय तु तत्सर्वं शनकैः सुसमाहितः । परिवेषयेत प्रयतो गुणान्सर्वान् प्रचोदयन् ॥ २२८ ॥ उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के हाथ में कुश और तिलोदक देकर पिण्ड का अग्रभाग पिता आदि तीन ब्राह्मणों को 'पित्रे स्वधास्तु' कहकर देवे । फिर अन्न का पात्र दोनों हाथ से उठाकर ब्राह्मणों के पास लाकर धीरे से रख देवे । यदि दोनों हाथों से अन्न न लाया जाय तो दुष्ट राक्षस उसको हर लेते हैं—रस चूस लेते हैं । श्राद्धकर्ता सावधानी से शाक, दाल आदि सब व्यञ्जन और दूध, दही, घी और मधु वगैरह पदार्थों को लाकर भूमि पर रक्खे । भक्ष्य, भोज्य, भांति भांति के कंद, फल, मांस * और सुगन्धित जल लाकर सब पदार्थों के गुणों की प्रशंसा करके ब्राह्मणों को परोसे ॥ २२३-२२८ ॥ नास्रमापातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत् । न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ २२६ ॥ श्राद्ध के दिन कभी आँसू न गिराना चाहिए । कोप न करे, झूठ न बोले, पैर से अन्न को न छुवे और अन्न को उछालकर भी न परोसना चाहिए ॥ २२६ ॥
- मांसपिण्ड की विधि वा निषेध एकदेशीमत है । शास्त्र की व्यवस्था सर्वदेशी है । प्रवृत्ति के अधीन होकर संसार में सब बातों को करनेवाले मौजूद हैं । इसलिए ऋषियों ने सब लिख दिया है । शास्त्र का रहस्य गहन है ।
पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ॥ २३० ॥
१०४ मनुस्मृति । अस्रं गमयति प्रेतान् कोपोऽरीननृतं शुनः । पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ॥ २३० ॥ यद्यद्रोचेत विप्रेभ्यस्तत्तद्दद्यादमत्सरः । ब्रह्मोद्याश्च कथाः कुर्यात् पितॄणामेतदीप्सितम् ॥ २३१ ॥ स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि । आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलानि च ॥ २३२॥ हर्षयेद्ब्राह्मणांस्तुष्टो भोजयेच्च शनैः शनैः । अन्नाद्येनासकृच्चैतान् गुणैश्च परिचोदयेत् ॥ २३३ ॥ आँसू गिराने से श्राद्धफल प्रेतों को होता है। कोप करने से शत्रुओं को, झूठ बोलने से कुत्तों को, पैर से ठोकर देने से राक्षसों को और उछालने से पापियों को फल पहुँचता है। जो जो पदार्थ ब्राह्मणों को प्रिय लगे उसको अच्छीतरह परोसे और ईश्वर सम्बन्धी कथाएं कहे, क्योंकि वह पितरों को प्रिय होती हैं। ब्रा- ह्मणों को वेद, धर्मशास्त्र, आख्यान, इतिहास, पुराण आदि सुनावे। खूब प्रसन्न करे, धीरे धीरे भोजन करावे और वारंवार पदार्थों के गुण वर्णन करके भोजन में उन लोगों को प्रवृत्त करे ॥ २३०-२३३ ॥ व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत् । कुपतं चासने दद्यात्तिलैश्च विकिरेन्महीम् ॥ २३४ ॥ त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ २३५ ॥ अत्युष्णं सर्वमन्नं स्याद्भुञ्जीरंस्ते च वाग्यताः । न च द्विजातयो ब्रूयुर्दात्रा पृष्टा हविर्गुणान् ॥ २३६ ॥ दौहित्र—कन्या का पुत्र, ब्रह्मचर्य व्रत में भी हो, तोभी उसको यत्न करके श्राद्ध में खिलावे। उसको बैठने के लिए कुपत—हिमा- लय के समीप का बना कम्बल देवे और श्राद्धभूमि में तिलछीट
तीसरा अध्याय । १०५
तीसरा अध्याय । १०५ देवे । श्राद्ध में दौहित्र, कुतप और तिल ये तीन पवित्र होते हैं। पवित्रता, क्रोध न करना और धीरज इन तीन बातों की प्रशंसा है। सब अन्न को खूब गरम रक्खे और उसको ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें। यदि देनेवाला भोजन के गुण पूछे तो भी ब्राह्मणों को न कहना चाहिए। अर्थात् भोजन के समय व्यर्थ बकवाद न करना चाहिए ॥ २३४-२३६ ॥ यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः । पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ २३७ ॥ यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणामुखः । सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ २३८॥ चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च। रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षरन्नश्नतो द्विजान् ॥ २३६ ॥ होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते । दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम् ॥ २४० ॥ घ्राणेन शूकरो हन्ति पक्षवातेन कुक्कुटः । श्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः ॥ २४१ ॥ जबतक अन्न गरम रहता है और जबतक मौन होकर ब्राह्मण भोजन करते हैं और भोजन के गुण नहीं बयान किए जाते तबतक ही पितर अन्नका ग्रहण करते हैं। जो शिर में वस्त्र बांधकर द- क्षिणमुख होकर और जूता पहनकर खाता है, ऐसे भोजन का फल राक्षसों को पहुँचता है। चाण्डाल, शूकर, मुरगा, कुत्ता, रजस्वला स्त्री, और नपुंसक ये लोग भोजन करते हुए ब्राह्मणों को न देखने पावें। हवन में, दान में, ब्राह्मणभोजन में, देवकर्म में वा पितृकर्म में यदि चाण्डाल आदि की नज़र पड़े तो वह कर्म निष्फल होजाता है। शूकर सूंघने से, मुरगा पंख की हवा से, कुत्ता देखने से और शूद्र स्पर्श से श्राद्ध के अन्न को दूषित करदेता है ॥ २३७-२४१॥ १४
१०६ मनुस्मृति । खञ्जो वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत् । हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेत् पुनः ॥ २४२ ॥ ब्राह्मणं भिक्षुकं वापि भोजनार्थमुपस्थितम् । ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः शक्तितः प्रतिपूजयेत् ॥ २४३ ॥ श्राद्धकर्ता का सेवक भी यदि लूला, काना, या कम ज्यादा अङ्गवाला हो तो उसे भी ब्राह्मणभोजन के समय हटा देना चा- हिए। उस समय यदि कोई ब्राह्मण वा भिक्षुक भोजन के लिए आजाय तो ब्राह्मणों की आज्ञा से उसका भी भरशक आदर करना चाहिए ॥ २४२-२४३ ॥ सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संनीयाप्लाव्य वारिणा । समुत्सृजेद्भुक्तवतामग्रतो विकिरेद्भुवि ॥ २४४ ॥ असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम् । उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरश्च यः ॥ २४५ ॥ उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्याशठस्य च । दासवर्गस्य तत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षते ॥ २४६ ॥ भोजन से बचा हुआ सब प्रकार का अन्न इकट्ठा करके जल से गीला करे और ब्राह्मणों के आगे रक्खे और थोड़ासा कुशों पर छींट देवे । यह कुशों पर बिखेरा और जूॅठा बचा अन्न बिना सं- स्कार मृत बालक, त्यागी और कुलस्त्रियों का माना जाता है। श्राद्ध में भूमि पर पड़ा जूॅठा अन्न सीधे सरल स्वभाव दासों का भाग है ॥ २४४-२४६ ॥ आसपिण्डक्रियाकर्म द्विजातेः संस्थितस्य तु । अद्दैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥ २४७ ॥ स ह पिण्डक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः । अनयैवावृता कार्यं पिण्डनिर्वपणं सुतैः ॥ २४८ ॥
⸱तीसरा अध्याय । १०७
⸱तीसरा अध्याय । १०७ श्राद्धं भुक्त्वा य उच्छिष्टं वृषलाय प्रयच्छति । स मूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक्शिराः ॥ २४६ ॥ श्राद्धभुग्वृषलीतल्पं तदहर्योऽधिगच्छति । तस्याः पुरीषे तन्मासं पितरस्तस्य शेरते ॥ २५० ॥ द्विजातियों का जबतक सपिण्डीकरण न हो, तबतक उसका श्राद्ध वैश्वदेवरहित करे और उसमें एक ब्राह्मण को भोजन और एक पिण्ड देना चाहिए । मृत पुरुष का सपिण्डीकरण होजाने पर अमावास्या की श्राद्धविधि के अनुसार ही पुत्रों को पिण्डदान करना चाहिए । भोजन के बाद बचा जूॅठा अन्न जो शूद्र को देता है, वह मूर्ख नीचे शिर होकर कालसूत्र नरक को जाता है । जो श्राद्ध में भोजन करके उस दिन रात में स्त्रीसंग करता है, उसके पितर एक मासतक उसी स्त्री की विष्ठा में सोते हैं ॥ २४७-२५० ॥ पृष्ट्वा स्वदितमित्येवं तृप्तानाचामयेत्ततः । आचान्तांश्चानुजानीयादभितो रम्यतामिति ॥ २५१ ॥ स्वधास्त्वित्येव तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम् । स्वधाकारः परा ह्याशीः सर्वेषु पितृकर्मसु ॥ २५२ ॥ ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत् । यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्ततो द्विजैः ॥ २५३ ॥ तृप्त हुए ब्राह्मणों से 'स्वदितम्' आपने खूब भोजन किया ? ऐसा पूंछे, फिर आचमन कराकर 'अभितो रम्यताम्' इच्छानु- सार पधारिए, यों कहकर विदा करे । उसके बाद ब्राह्मण 'स्वधास्तु' ऐसा कहें, क्योंकि सब पितृकर्मों में यह कहना परम आशीर्वाद मानाजाता है। भोजन किए ब्राह्मणों से जो अन्न बचा हो उसको निवेदन करे और उन लोगों की आज्ञानुसार उसकी व्यवस्था करे ॥ २५१-२५३ ॥
अपराह्णं तथा दर्भा वास्तुसंपादनं तिलाः ।
१०८ मनुस्मृति । पित्र्ये स्वदितमित्येव वाच्यं गोष्ठे तु सुश्रुतम् । संपन्नमित्यभ्युदये दैवे रुचितमित्यपि ॥ २५४ ॥ अपराह्णं तथा दर्भा वास्तुसंपादनं तिलाः । सृष्टिर्मृष्टिर्द्विजाश्चाग्र्याः श्राद्धकर्मसु संपदः ॥ २५५ ॥ दर्भाः पवित्रं पूर्वाह्णे हविष्याणि च सर्वशः । पवित्रं यच्च पूर्वोक्तं विज्ञेया हव्यसंपदः ॥ २५६ ॥ मुन्यन्नानि पयः सोमो मांसं यच्चानुपस्कृतम् । अक्षारलवणं चैव प्रकृत्या हविरुच्यते ॥ २५७ ॥ माता पिताके एकोद्दिष्ट और पार्वणश्राद्ध में ' 'स्वदितम्' 'गोष्ठीश्राद्ध में 'सुश्रुतम्' वृद्धिश्राद्ध में 'सम्पन्नम्' और देवकर्म में 'रुचितम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणों से उनकी तृप्ति को पूंछ लेवे । अपराह्न काल, कुश, गोबर से लिपी भूमि, तिल, निःसंकोच भोजन देना, भोजन का स्वाद और पंक्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध कर्म में उत्तम गिना जाता है। कुश, वेदमंत्र, पूर्वाह्न काल, हवि का अन्न और पूर्वोक्त भूमि आदि की पवित्रता, ये सब देवकर्म की सम्पत्ति हैं। मुनियों का अन्न-नीवार आदि, दूध, सोमलता का रस, कच्चा मांस, सैंधानमक, ये सब पदार्थ स्वभाव से ही हवि कहलाते हैं ॥ २५४-२५७ ॥ विसृज्य ब्राह्मणांस्तांस्तु नियतो वाग्यतः शुचिः । दक्षिणांदिशमाकाङ्क्षन्याचेतेमान्वरान्पितॄन्॥ २५८॥ दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च । श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं च नोऽस्त्विति॥२५६॥ एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डांस्तांस्तदनन्तरम् । गां विप्रमजमग्निं वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत्॥ २६० ॥
तीसरा अध्याय । १०६
तीसरा अध्याय । १०६ उन निमन्त्रित ब्राह्मणों को विदा करके, सावधानी से स्नान करे और दक्षिण दिशा को खड़ा होकर, पितरों से इन वरों को मांगेः-हमारे कुल में दाता हों, वेदाभ्यास और सन्तान की वृद्धि हो, वैदिक कर्म से श्रद्धा दूर न हो और सुपात्रों को देने के लिए हमें बहुतसा धन मिले-इस प्रकार, श्राद्ध कर्म पूरा होने पर वह पिण्ड गौ, ब्राह्मण या बकरा को खिलादे, अथवा अग्नि या जल में डाल देवे ॥ २५८-२६० ॥ पिण्डनिर्वपणं केचित्पुरस्तादेव कुर्वते । वयोभिः खादयन्त्यन्ये प्रक्षिपन्त्यनलेऽप्सु वा ॥ २६१ ॥ पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा । मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात्सम्यक् सुतार्थिनी ॥ २६२ ॥ आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् । धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ॥ २६३ ॥ प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातिप्रायं प्रकल्पयेत् । ज्ञातिभ्यः सत्कृतं दत्त्वा बान्धवानपि भोजयेत् ॥ २६४ ॥ कोई आचार्य ब्राह्मण भोजन के पहलेही पिण्डनिर्वपण कराते हैं, कोई पिण्ड पक्षियों को खिलाते हैं, कोई जल वा अग्नि में छोड़ देते हैं। पतिव्रता स्त्री पुत्र की इच्छा से उन पिण्डों में से पितामह के मध्यम पिण्ड को खा लेय । वह स्त्री आयुष्मान्, यशस्वी, बुद्धि- मान्, धनवान्, सन्तानवान्, सत्यगुणी और धार्मिक पुत्र को पैदा करती है। फिर दोनों हाथ धोकर, बचा हुआ अन्न अपने जाति वालों को और दूसरे सम्बन्धियों को भी खिलावे ॥ २६१-२६४ ॥ उच्छेषणं तु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्रा विसर्जिताः । ततो गृहबलिं कुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ २६५ ॥ हविर्यच्चिररात्राय यच्चानन्त्याय कल्प्यते । पितृभ्यो विधिवद्दत्तं तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २६६ ॥
११० मनुस्मृति । तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा । दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत् पितरो नृणाम् ॥ २६७॥ द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु । औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै ॥ २६८ ॥ षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै । अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ २६६ ॥ दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः । शशकूर्म्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ २७० ॥ संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च । वार्घ्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ २७१ ॥ ब्राह्मणों को विदा करके उस स्थान से जूठ उठाकर, फिर वैश्वदेव और भूतबलि आदि करे-यह धर्मव्यवस्था है। पितरों को विधि से हवि देने से जो चिरकालतक अक्षय तृप्ति होती है वह इस प्रकार है-तिल, धान्य, यव, उड़द, जल, मूल और फल विधिपूर्वक पितरों को देने से, एक मास तक तृप्ति होती है। मछली और मांस से दो मास, हरिण के मांस से तीन मास, मेंढा के मांस से चार और भक्ष्य पक्षियों के मांस से पांच मास तक तृप्ति होती है। बकरा के मांस से छः मास, चित्रमृग के मांस से सात मास, मृग से आठ मास और रुरु मृग से नव मास तक तृप्ति होती है। शूकर और महिष के मांस से दश मास, खरगोश और कछुआ से ग्यारह मास तक तृप्ति होती है। गौके दूध वा उसकी खीर से साल भर और लम्बे कान और नाकवाले बूढ़े बकरे के मांस से बारह वर्ष तक तृप्ति होती है ॥ २६५-२७१ ॥ कालशाकं महाशल्काः खड्गलोहामिषं मधु । आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥२७२॥
तीसरा अध्याय। १११
तीसरा अध्याय। १११ यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात्तु त्रयोदशीम् । तदप्यक्षयमेव स्याद्वर्षासु च मघासु च॥ २७३ ॥ अपि नः स कुले जायाद्यो नो दद्यात् त्रयोदशीम् । पायसं मधुसर्पिभ्यां प्राक्छाये कुञ्जरस्य च॥ २७४ ॥ यद्यद्ददाति विधिवत् सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । तत्तत्पितॄणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ॥ २७५ ॥ कालाशाक, महाशल्क-मछली का भेद, गेंडा, लाल बकरा, शहद और सब प्रकार के मुनिअन्नों से, अनन्त वर्षों तक पितर तृप्त रहते हैं। वर्षार्ऋतु, मघानक्षत्र और त्रयोदशी तिथिको कोई भी पदार्थ मधु मिलाकर पितरों के निमित्त देने से, उनको अक्षय तृप्ति होती है। पितर आशा करते हैं-हमारे कुल में कोई ऐसा हो जो त्रयोदशी को या हाथी की छाया पूर्व दिशा में पड़े ऐसे समय, घी, मधु से मिले हुए पायस-खीर से, हमको तृप्त करें। भक्ति और श्रद्धा से विधिपूर्वक जो कुछ पितरों को दिया जाता है, उसका अनन्त फल उनको परलोक में पहुँचता है ॥ २७२-२७५ ॥ कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैमा न तथेतराः ॥ २७६ ॥ युक्षु कुर्वन् दिनर्क्षेषु सर्वान् कामान् समश्नुते । अयुक्षु तु पितृन्सर्वान् प्रजां प्राप्नोति पुष्कलाम् ॥२७७॥ यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ २७८ ॥ चतुर्दशी को छोड़कर, कृष्णपक्ष की दशमी से अमावास्या तक की तिथि पितृकार्य के लिए जैसी पवित्र है वैसी दूसरी नहीं है। समतिथि और समनक्षत्रों में (जैसा द्वितीया, चतुर्थी, भरणी,
११२ मनुस्मृति । रोहिणी ) श्राद्ध करने से, सब कामना पूरी होती हैं। और विषम तिथि, नक्षत्रों में (प्रतिपदा, तृतीया, अश्विनी, कृत्तिका आदि) श्राद्ध करने से, बहुत सन्तान होती है। जैसे, शुक्लपक्ष से कृष्णपक्ष श्राद्ध में श्रेष्ठ माना जाता है, वैसेही पूर्वाह्न से अपराह्न-दोपहर बाद, काल उत्तम गिना जाता है ॥ २७६-२७८ ॥ प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा । पित्र्यमानिधनात्कार्यं विधिवद्दर्भपाणिना ॥ २७९ ॥ रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा । सन्ध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते ॥ २८० ॥ अनेन विधिना श्राद्धं त्रिरब्दस्येह निर्वपेत् । हेमन्तग्रीष्मवर्षासु पाञ्चयज्ञिकमन्वहम् ॥ २८१ ॥ हाथ में कुश लेकर, शास्त्रविधि से मृत्यु तक श्राद्ध किया करे। रात्रि में श्राद्ध न करे, क्योंकि वह राक्षसी समय है। और सूर्योदय, सूर्यास्त समय और सूर्योदय के कुछ काल बाद भी श्राद्ध न करना चाहिए। इस विधि के अनुसार, गृहस्थ यदि प्रतिमास श्राद्ध न करसके तो वर्ष में, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षार्ऋतु में श्राद्ध और नित्य पञ्चमहायज्ञ करे ॥ २७९-२८१ ॥ न पैतृयज्ञियो होमो लौकिकेऽग्नौ विधीयते । न दर्शेन विना श्राद्धमाहिताग्नेर्द्विजन्मनः ॥ २८२ ॥ यदेव तर्पयत्यद्भिः पितॄन् स्नात्वा द्विजोत्तमः । तेनैव कृत्स्नमाप्नोति पितृयज्ञक्रियाफलम् ॥ २८३ ॥ वसून् वदन्ति तु पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान् । प्रपितामहांस्तथादित्याञ्छुतिरेषा सनातनी ॥ २८४ ॥ विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं वामृतभोजनः । विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ २८५ ॥
तीसरा अध्याय। ११३
तीसरा अध्याय। ११३ एतद्वोऽभिहितं सर्वं विधानं पाञ्चयज्ञिकम् । द्विजातिमुख्यवृत्तीनां विधानं श्रूयतामिति ॥ २८६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां तृतीयोऽध्यायः ॥ पितृकर्म लौकिक अग्नि में न करना चाहिए। अग्निहोत्री अमा- वास्या के सिवाय दूसरी तिथियों में श्राद्ध न करे तोभी कोई हानि नहीं है। द्विज से न कुछ बन पड़े तो जल से पितृतर्पण करा करे तोभी पितृयज्ञ का फल मिलता है। वेद में पिता को वसु, पितामह को रुद्र और प्रपितामह को आदित्य कहते हैं। समर्थ पुरुष, नित्य विघस या अमृत का भोजन किया करे। श्राद्ध में ब्राह्मणभोजन से बचा अन्न विघस और वैश्वदेव आदि यज्ञशेष अमृत कहलाता है। यह पञ्चमहायज्ञ की सब विधि तुमसे कही है, अब द्विजों में मुख्य ब्राह्मण की वृत्ति का विषय सुनो ॥ २८२-२८६॥ तीसरा अध्याय समाप्त ।
अथ चतुर्थोऽध्यायः । चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाद्यं गुरौ द्विजः । द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ १ ॥ अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः । या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ॥ २ ॥ यात्रामानप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः । अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय । गृहस्थाश्रम-धर्म । द्विज अपने जीवन का चतुर्थांश गुरुकुल में, विद्याभ्यास में बितावे और दूसरे चतुर्थांश में विवाह करके गृहस्थाश्रम में रहे। आपत्तिकाल में किसीको कुछ दुःख देकर भी और समय में किसी को कष्ट न देकर जो निर्वाह के लिए जीविका बनपड़े उसको करना चाहिए। अपने और परिवार के पालन के लिए कोई खराब काम न करना चाहिए। शरीर को दुःख न देकर धन उपार्जन करना चाहिए ॥ १-३ ॥ ऋतानृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा । सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥ ४ ॥ ऋतमुञ्छशिलं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम् । मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ ५ ॥ सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते । सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
चौथा अध्याय । ११५
चौथा अध्याय । ११५ ब्राह्मण को ऋत से, अमृत से, मृत से और प्रमृत से या सत्य और अनृत से जीविका करनी चाहिए। लेकिन श्ववृत्ति-नौकरी-गुलामी से निर्वाह न करना चाहिए। उञ्छ और शिल को ऋत, बिना मांगे मिलाहुआ अमृत, मांगी हुई भिक्षा मृत और खेती को प्रमृत कहते हैं। सत्यानृत-सच-झूठ वाणिज्य-व्यापार को कहते हैं, उससे भी जीविका चलाना श्रेष्ठ है। श्ववृत्ति-अर्थात् कुत्ता की वृत्ति-सेवा को कहते हैं, इसलिए उसको छोड़ देना चाहिए ॥ ४-६ ॥ कुशूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा । त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥ ७ ॥ चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् । ज्यायान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥ ८ ॥ षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते । द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ॥ ६ ॥ ब्राह्मण इतना अन्न संग्रह करे जिसमें कोठी भरजाय, या छोटी कोठरी भरजाने भरका अन्न संग्रह करे, या तीन दिन के गुज़र लायक अथवा एकही दिन के प्रयोजन भरको इकट्ठा रक्खे। इन चारों प्रकार के संग्रह को करनेवालों में अगला अगला ब्राह्मण श्रेष्ठ माना जाता है और वह धर्म से स्वर्गफल को जीतनेवाला होता है। इन चार प्रकार के गृहस्थों में ऋत आदि छ प्रकार की वृत्ति से निर्वाह करना बड़े गृहस्थ के लिए है। जो साधारण कुटुम्ब रखते हैं, वे यज्ञ कराना, वेदपढ़ाना और दान लेना इन तीन प्रकार की जीविकाओं से निर्वाह करें। प्रतिग्रह-दान लेना जो नहीं चाहते, उनको याजन और अध्यापन इन दो वृत्तियों से और चौथा केवल वेद पढ़ाकर एकही वृत्ति से निर्वाह करना चाहिए ॥ ७-६ ॥ वर्तयंश्च शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः । इष्टीः पार्व्वायनान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा ॥ १० ॥