मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि अंशतः यह ठीक है, तथापि यह स्वाभाविक स्थिति है। ऐसे विचारोंका 'दर्शन' नाम नहीं दिया जा सकता; क्योंकि इनमें भावनाओंका ही प्राधान्य है। पर भावनाएँ 'दर्शन' नहीं होतीं। भावनाके प्राबल्यसे तो कभी विधुर-परिभावित कान्ताका भी साक्षात्कार हो जाता है। परिस्थितिका प्रभाव विचारोंपर होनेसे उनकी यथार्थतामें संदेह होना स्वाभाविक ही है। स्पष्ट है कि पित्तरोगयुक्त रसनासे गुड़की मधुरताका ठीक अनुभव नहीं हो सकता। पित्तयुक्त नेत्रसे श्वेत शङ्ख भी पीत प्रतीत होता है। सर्पदष्ट व्यक्ति कटु निम्बको भी मिष्ट समझता है। नीले-पीले उपनेत्रों (चश्मों) से वस्तु नीले-पीले रूपमें प्रतीत होती है। कामी संसारको कामिनीमय और ज्ञानी ब्रह्ममय देखता है। निम्बके कीटको मिश्रीकी मिष्टताके अनुभवमें पर्याप्त कठिनाई होती है। नमकके पर्वतपर रहनेवाली चींटी मिश्रीके पर्वतपर जाकर मिश्रीकी मिठासका तबतक अनुभव नहीं कर सकती, जबतक कि अपने मुँहसे नमकके कणोंको निकाल न दे। ठीक इसी तरह जबतक तपस्या, सदाचार, निःस्पृहता एवं योगाभ्यास आदिके सहारे राग-द्वेष, सम्पत्ति-विपत्ति, व्यक्तिगत परिस्थिति तथा वातावरणके प्रभावसे ऊँचा नहीं उठा जाता, तबतक सूक्ष्म विषयोंका यथार्थ ज्ञान कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। भारतीय दृष्टिसे पवित्र विचार अर्थात् धर्म-ब्रह्मादि पवित्र वस्तुसम्बन्धी कल्याणकारी पवित्र विवेचन मीमांसा है—'माने जिज्ञासायाम्'। और वस्तुतत्त्व परम सत्यका निर्दोष प्रमात्मक अनुभव करानेवाला विचार 'दर्शन' कहा जाता है— 'दृश्यते वस्तु याथात्म्यं अनेन इति दर्शनम्'। दूसरे शब्दोंमें प्रमाणद्वारा आत्मा- नात्माका ज्ञान जिसमे होता है उसका नाम 'दर्शनशास्त्र' है। प्रमाण अज्ञातज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं। ज्ञान कर्मके समान पुरुषके अधीन नहीं होता। कर्म करने, न करने, उलटा करनेमें पुरुष स्वतन्त्र है, किन्तु ज्ञानके सम्बन्धमें यह बात नहीं कही जा सकती। प्रमाण-प्रमेयके परस्पर सम्बन्ध हो जानेपर इच्छा न रहनेपर भी दुर्गन्धादिका ज्ञान होता ही है। दर्शन प्रमाण-परतन्त्र होता है। प्रमाण अनुरोधक-विरोधक सभी प्रकारके होते हैं। उनमें प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम मुख्य हैं; प्रत्यक्षानुमानका भी आगमानुसरण आवश्यक है। इसके बिना कितने ही अनुमानाभास भी अनुभवके रूपमें सामने आते हैं। उदाहरणार्थ कोई नरशिरके कपालकी हड्डीको प्राण्यङ्ग समझकर शङ्खतुल्य पवित्र मान सकता है। पर यह अनुमानाभास है। अतएव पवित्र बुद्धिके मनुष्य 'नरशिरःकपालं शुचिः प्राण्यङ्गत्वात् शङ्खवत्' इस अनुमानका तिरस्कारकर 'नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्' इस आगमानुसार जुगुप्सित नरशिरकी अस्थिका स्पर्श हो जानेपर सचैलस्नान कर अपनेको पुनः शुद्ध करते हैं। कुछ लोगोंका ऐसा भी मत है कि 'मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, यह