भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४* मत्स्यपुराण *

| प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्म्यासु ललितासु च।<br>कथासु शौनकाद्यास्तु अभिनन्द्य मुहुर्मुहुः॥ ६<br><br>कथितानि पुराणानि यान्यस्माकं त्वयानघ।<br>तान्येवामृतकल्पानि श्रोतुमिच्छामहे पुनः॥ ७<br><br>कथं ससर्ज भगवाँल्लोकनाथश्चराचरम्।<br>कस्माच्च भगवान् विष्णुर्मत्स्यरूपत्वमाश्रितः॥ ८<br><br>भैरवत्वं भवस्यापि पुरारित्वं च केन हि।<br>कस्य हेतोः कपालित्वं जगाम वृषभध्वजः॥ ९<br><br>सर्वमेतत् समाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्।<br>त्वद्वाक्येनामृतस्येव न तृप्तिरिह जायते॥ १०<br><br>सूत उवाच<br><br>पुण्यं पवित्रमायुष्यमिदानीं शृणुत द्विजाः।<br>मात्स्यं पुराणमखिलं यज्जगाद गदाधरः॥ ११<br><br>पुरा राजा मनुर्नाम चीर्णवान् विपुलं तपः।<br>पुत्रे राज्यं समारोप्य क्षमावान् रविनन्दनः॥ १२<br><br>मलयस्यैकदेशे तु सर्वात्मगुणसंयुतः।<br>समदुःखसुखो वीरः प्राप्तवान् योगमुत्तमम्॥ १३<br><br>बभूव वरदश्चास्य वर्षायुतशते गते।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच प्रीतः स कमलासनः॥ १४<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् राजा प्रणम्य स पितामहम्।<br>एकमेवाहमिच्छामि त्वत्तो वरमनुत्तमम्॥ १५<br><br>भूतग्रामस्य सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च।<br>भवेयं रक्षणायालं प्रलये समुपस्थिते॥ १६<br><br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तत्रैवान्तरधीयत।<br>पुष्पवृष्टिः सुमहती खात् पपात सुरार्पिता॥ १७ | पुराणसम्बन्धिनी धार्मिक एवं सुन्दर कथाओंके प्रसङ्गमें इस दीर्घसंहिता (अर्थात् मत्स्यपुराण)-के विषयमें इस प्रकारकी जिज्ञासा प्रकट की—'निष्पाप सूतजी! आपने हमलोगोंके प्रति जिन पुराणोंका वर्णन किया है, उन्हीं अमृततुल्य पुराणोंको पुनः श्रवण करनेकी हमलोगोंकी अभिलाषा है। मुने! ऐश्वर्यशाली जगदीश्वरने कैसे इस चराचर विश्वकी सृष्टि की तथा उन भगवान् विष्णुको किस कारण मत्स्यरूप धारण करना पड़ा? साथ ही शंकरजीको भी भैरवत्व एवं पुरारित्वकी पदवी किस निमित्तसे प्राप्त हुई? तथा वे वृषभध्वज कपालमालाधारी कैसे हो गये? सूतजी! इन सबका क्रमशः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि इस विषयमें आपके अमृत-सदृश वचनोंको सुननेसे तृप्ति नहीं हो रही है॥ ५-१०॥<br><br>सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! पूर्वकालमें भगवान् गदाधरने जिस मत्स्यपुराणका वर्णन किया था, इस समय उसीका विवरण (आपलोग) सुनें। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र और आयुवर्धक है। प्राचीनकालमें सूर्यपुत्र महाराज (वैवस्वत) मनुने*, जो क्षमाशील, सम्पूर्ण आत्मगुणोंसे सम्पन्न, सुख-दुःखको समान समझनेवाले एवं उत्कृष्ट वीर थे, पुत्रको राज्य-भार सौंपकर मलयाचलके एक भागमें जाकर घोर तपका अनुष्ठान किया था। वहाँ उन्हें उत्तम योगकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार उनके तप करते हुए करोड़ों वर्ष व्यतीत होनेपर कमलासन ब्रह्मा प्रसन्न होकर वरदातारूपमें प्रकट हुए और राजासे बोले—'वर माँगो!' इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर वे महाराज मनु पितामह ब्रह्माको प्रणाम करके बोले—'भगवन्! मैं आपसे केवल एक सर्वश्रेष्ठ वर माँगना चाहता हूँ। (वह यह है कि) प्रलयके उपस्थित होनेपर मैं सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमरूप जीवसमूहकी रक्षा करनेमें समर्थ हो सकूँ।' तब विश्वात्मा ब्रह्मा 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय आकाशसे देवताओंद्वारा की गयी महती पुष्पवृष्टि होने लगी॥ ११-१७॥ |


* भागवतादिके अनुसार ये सत्यव्रत राजा हैं, जो आगे वैवस्वत मनु हुए हैं।