भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः
श्रीमद्वेदव्यासप्रणीत

मत्स्यमहापुराण

पहला अध्याय

मङ्गलाचरण, शौनक आदि मुनियोंका सूतजीसे पुराणविषयक प्रश्न, सूतद्वारा मत्स्यपुराणका वर्णणारम्भ, भगवान् विष्णुका मत्स्यरूपसे सूर्यनन्दन मनुको मोहित करना, तत्पश्चात् उन्हें आगामी प्रलयकालकी सूचना देना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रचण्डताण्डवाटोपे प्रक्षिप्ता येन दिग्गजाः।<br>भवन्तु विघ्नभङ्गाय भवस्य चरणाम्बुजाः ॥ १<br><br>पातालादुत्पतिष्णोर्मकरवसतयो यस्य पुच्छाभिघाता-<br>दूर्ध्वं ब्रह्माण्डखण्डव्यतिकरविहितव्यत्ययेनापतन्ति।<br>विष्णोर्मत्स्यावतारे सकलवसुमतीमण्डलं व्यश्नुवाना-<br>स्तस्यास्योदीरितानां ध्वनिरपहरतादश्रियं वः श्रुतीनाम् ॥ २¹प्रचण्ड वेगसे प्रवृत्त हुए ताण्डव नृत्यके आवेशमें जिनके द्वारा दिग्गजगण दूर फेंक दिये जाते हैं, उन भगवान् शंकरके चरणकमल (हम सभीके) विघ्नोंका विनाश करें। मत्स्यावतारके समय पाताललोकसे ऊपरको उछलते हुए जिन भगवान् विष्णुकी पूँछके आघातसे समुद्र ऊपरको उछल पड़ते हैं तथा ब्रह्माण्ड-खण्डोंके सम्पर्कसे उत्पन्न हुई अस्त-व्यस्तताके कारण सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलको व्याप्त करके पुनः नीचे गिरते हैं, उन भगवान्‌के मुखसे उच्चरित हुई श्रुतियोंकी ध्वनि आपलोगोंके अमङ्गलका विनाश करे।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ ३<br><br>अजोऽपि यः क्रियायोगान्नारायण इति स्मृतः।<br>त्रिगुणाय त्रिवेदाय नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ॥ ४नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा सरस्वतीदेवीको नमस्कार कर तत्पश्चात् जय² (महाभारत, पुराण आदि)-का पाठ करना चाहिये। जो अजन्मा होनेपर भी क्रियाके सम्पर्कसे 'नारायण' नामसे स्मरण किये जाते हैं, त्रिगुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) रूप हैं एवं त्रिवेद (ऋक्, यजुः, साम) जिनका स्वरूप है, उन स्वयम्भू भगवान्‌को नमस्कार है ॥ १–४ ॥
सूतमेकाग्रमासीनं नैमिषारण्यवासिनः।<br>मुनयो दीर्घसत्रान्ते पप्रच्छुर्दीर्घसंहिताम् ॥ ५एक बार दीर्घकालिक यज्ञकी समाप्तिके अवसरपर नैमिषारण्यनिवासी शौनक आदि मुनियोंने एकाग्रचित्तसे बैठे हुए सूतजीका बारंबार अभिनन्दन करके उनसे

१. ग्रन्थकारके दो मङ्गल-श्लोकोंमें शिव-विष्णुकी वन्दनासे ग्रन्थकी गम्भीरता एवं शिव-विष्णु-उभयपरकता सिद्ध होती है। ४। २८ आदिमें भी शिवसे ही सृष्टि निर्दिष्ट है।
२. महाभारतकी नीलकण्ठी व्याख्या एवं भविष्यपुराण १। ४। ८६–८८ के 'अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा। विष्णुधर्मादयो धर्माः शिवधर्माश्च भारत ॥ कार्ष्णं वेदं पञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः। ॰॰॰'जयेति नाम चैतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥'—इस वचनके अनुसार रामायण, महाभारत तथा सभी पुराण, विष्णुधर्म, शिवधर्म आदि 'जय' कहे जाते हैं।