मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 17
- अध्याय १ * | १५ --- | ---:
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कदाचिदाश्रमे तस्य कुर्वतः पितृतर्पणम्।<br>पपात पाण्योरुपरि शफरी जलसंयुता ॥ १८<br>दृष्ट्वा तच्छफरीरूपं स दयालुर्महीपतिः।<br>रक्षणायाकरोद् यत्नं स तस्मिन् करकोदरे ॥ १९ | एक समयकी बात है, आश्रममें पितृ-तर्पण करते हुए महाराज मनुकी हथेलीपर जलके साथ ही एक मछली आ गिरी। उस मछलीके रूपको देखकर वे नरेश दयार्द्र हो गये तथा उसे उस कमण्डलुमें डालकर उसकी रक्षाका प्रयत्न करने लगे। |
| अहोरात्रेण चैकेन षोडशाङ्गुलविस्तृतः।<br>सोऽभवन्मत्स्यरूपेण पाहि पाहीति चाब्रवीत् ॥ २० | एक ही दिन-रातमें वह (वहाँ) मत्स्यरूपसे सोलह अङ्गुल बड़ा हो गया और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों कहने लगा। |
| स तमादाय मणिके प्राक्षिपज्जलचारिणम्।<br>तत्रापि चैकरात्रेण हस्तत्रयमवर्धत ॥ २१ | तब राजाने उस जलचारी जीवको मिट्टीके एक बड़े घड़ेमें डाल दिया। वहाँ भी वह एक (ही) रातमें तीन हाथ बढ़ गया। |
| पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम्।<br>स मत्स्यः पाहि पाहीति त्वामहं शरणं गतः ॥ २२ | पुनः उस मत्स्यने सूर्यपुत्र मनुसे आर्तवाणीमें कहा—'राजन्! मैं आपकी शरणमें हूँ; मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' |
| ततः स कूपे तं मत्स्यं प्राहिणोद् रविनन्दनः।<br>यदा न माति तत्रापि कूपे मत्स्यः सरोवरे ॥ २३<br>क्षिप्तोऽसौ पृथुतामागात् पुनर्योजनसम्मिताम्।<br>तत्राप्याह पुनर्दीनः पाहि पाहि नृपोत्तम ॥ २४ | तदनन्तर उन सूर्य-नन्दन (वैवस्वत मनु)-ने उस मत्स्यको कुएँमें रख दिया, परंतु जब वह मत्स्य उस कुएँमें भी न अँट सका, तब राजाने उसे सरोवरमें डाल दिया। वहाँ वह पुनः एक योजन बड़े आकारका हो गया और दीन होकर कहने लगा—'नृपश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' |
| ततः स मनुना क्षिप्तो गङ्गायामप्यवर्धत।<br>यदा तदा समुद्रे तं प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥ २५ | तत्पश्चात् मनुने उसे गङ्गामें छोड़ दिया। जब उसने वहाँ और भी विशाल रूप धारण कर लिया, तब भूपालने उसे समुद्रमें डाल दिया। |
| यदा समुद्रमखिलं व्याप्यासौ समुपस्थितः।<br>तदा प्राह मनुर्भीतः कोऽपि त्वमसुरेश्वरः ॥ २६<br>अथवा वासुदेवस्त्वमन्य ईदृक् कथं भवेत्।<br>योजनायुतविंशत्या कस्य तुल्यं भवेद् वपुः ॥ २७ | जब उस मत्स्यने सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लिया, तब मनुने भयभीत होकर उससे पूछा—'आप कोई असुरराज तो नहीं हैं? अथवा वासुदेव भगवान् हैं, अन्यथा दूसरा कोई ऐसा कैसे हो सकता है? भला, इस प्रकार कई करोड़ योजनोंके समान विस्तारवाला शरीर किसका हो सकता है? |
| ज्ञातस्त्वं मत्स्यरूपेण मां खेदयसि केशव।<br>हृषीकेश जगन्नाथ जगद्धाम नमोऽस्तु ते ॥ २८ | केशव! मुझे ज्ञात हो गया कि 'आप मत्स्यका रूप धारण करके मुझे खिन्न कर रहे हैं। हृषीकेश! आप जगदीश्वर एवं जगत्के निवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है।' |
| एवमुक्तः स भगवान् मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>साधु साध्विति चोवाच सम्यग्ज्ञातस्त्वयानघ ॥ २९ | तब मत्स्यरूपधारी वे भगवान् जनार्दन यों कहे जानेपर बोले—'निष्पाप! ठीक है, ठीक है, तुमने मुझे भलीभाँति पहचान लिया है। |
| अचिरेणैव कालेन मेदिनी मेदिनीपते।<br>भविष्यति जले मग्ना सशैलवनकानना ॥ ३० | भूपाल! थोड़े ही समयमें पर्वत, वन और काननोंके सहित यह पृथ्वी जलमें निमग्न हो जायगी। |
| नौरियं सर्वदेवानां निकायेन विनिर्मिता।<br>महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थं महीपते ॥ ३१ | इस कारण पृथ्वीपते! सम्पूर्ण जीव-समूहोंकी रक्षा करनेके लिये समस्त देवगणोंद्वारा इस नौकाका निर्माण किया गया है। |
| स्वेदण्डजोद्भिदो ये वै ये च जीवा जरायुजाः।<br>अस्यां निधाय सर्वांस्ताननाथान् पाहि सुव्रत ॥ ३२ | सुव्रत! जितने स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज जीव हैं तथा जितने जरायुज जीव हैं, उन सभी अनाथोंको इस नौकामें चढ़ाकर तुम उन सबकी रक्षा करना। |
| युगान्तवाताभिहता यदा भवति नौर्नृप।<br>शृङ्गेऽस्मिन् मम राजेन्द्र तदेमां संयमिष्यसि ॥ ३३ | राजन्! जब युगान्तकी वायुसे आहत होकर यह नौका डगमगाने लगेगी, उस समय राजेन्द्र! तुम उसे मेरे इस सींगमें बाँध देना। |