मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय १ * | १५ --- | ---:
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कदाचिदाश्रमे तस्य कुर्वतः पितृतर्पणम्।<br>पपात पाण्योरुपरि शफरी जलसंयुता ॥ १८<br>दृष्ट्वा तच्छफरीरूपं स दयालुर्महीपतिः।<br>रक्षणायाकरोद् यत्नं स तस्मिन् करकोदरे ॥ १९ | एक समयकी बात है, आश्रममें पितृ-तर्पण करते हुए महाराज मनुकी हथेलीपर जलके साथ ही एक मछली आ गिरी। उस मछलीके रूपको देखकर वे नरेश दयार्द्र हो गये तथा उसे उस कमण्डलुमें डालकर उसकी रक्षाका प्रयत्न करने लगे। |
| अहोरात्रेण चैकेन षोडशाङ्गुलविस्तृतः।<br>सोऽभवन्मत्स्यरूपेण पाहि पाहीति चाब्रवीत् ॥ २० | एक ही दिन-रातमें वह (वहाँ) मत्स्यरूपसे सोलह अङ्गुल बड़ा हो गया और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों कहने लगा। |
| स तमादाय मणिके प्राक्षिपज्जलचारिणम्।<br>तत्रापि चैकरात्रेण हस्तत्रयमवर्धत ॥ २१ | तब राजाने उस जलचारी जीवको मिट्टीके एक बड़े घड़ेमें डाल दिया। वहाँ भी वह एक (ही) रातमें तीन हाथ बढ़ गया। |
| पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम्।<br>स मत्स्यः पाहि पाहीति त्वामहं शरणं गतः ॥ २२ | पुनः उस मत्स्यने सूर्यपुत्र मनुसे आर्तवाणीमें कहा—'राजन्! मैं आपकी शरणमें हूँ; मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' |
| ततः स कूपे तं मत्स्यं प्राहिणोद् रविनन्दनः।<br>यदा न माति तत्रापि कूपे मत्स्यः सरोवरे ॥ २३<br>क्षिप्तोऽसौ पृथुतामागात् पुनर्योजनसम्मिताम्।<br>तत्राप्याह पुनर्दीनः पाहि पाहि नृपोत्तम ॥ २४ | तदनन्तर उन सूर्य-नन्दन (वैवस्वत मनु)-ने उस मत्स्यको कुएँमें रख दिया, परंतु जब वह मत्स्य उस कुएँमें भी न अँट सका, तब राजाने उसे सरोवरमें डाल दिया। वहाँ वह पुनः एक योजन बड़े आकारका हो गया और दीन होकर कहने लगा—'नृपश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' |
| ततः स मनुना क्षिप्तो गङ्गायामप्यवर्धत।<br>यदा तदा समुद्रे तं प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥ २५ | तत्पश्चात् मनुने उसे गङ्गामें छोड़ दिया। जब उसने वहाँ और भी विशाल रूप धारण कर लिया, तब भूपालने उसे समुद्रमें डाल दिया। |
| यदा समुद्रमखिलं व्याप्यासौ समुपस्थितः।<br>तदा प्राह मनुर्भीतः कोऽपि त्वमसुरेश्वरः ॥ २६<br>अथवा वासुदेवस्त्वमन्य ईदृक् कथं भवेत्।<br>योजनायुतविंशत्या कस्य तुल्यं भवेद् वपुः ॥ २७ | जब उस मत्स्यने सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लिया, तब मनुने भयभीत होकर उससे पूछा—'आप कोई असुरराज तो नहीं हैं? अथवा वासुदेव भगवान् हैं, अन्यथा दूसरा कोई ऐसा कैसे हो सकता है? भला, इस प्रकार कई करोड़ योजनोंके समान विस्तारवाला शरीर किसका हो सकता है? |
| ज्ञातस्त्वं मत्स्यरूपेण मां खेदयसि केशव।<br>हृषीकेश जगन्नाथ जगद्धाम नमोऽस्तु ते ॥ २८ | केशव! मुझे ज्ञात हो गया कि 'आप मत्स्यका रूप धारण करके मुझे खिन्न कर रहे हैं। हृषीकेश! आप जगदीश्वर एवं जगत्के निवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है।' |
| एवमुक्तः स भगवान् मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>साधु साध्विति चोवाच सम्यग्ज्ञातस्त्वयानघ ॥ २९ | तब मत्स्यरूपधारी वे भगवान् जनार्दन यों कहे जानेपर बोले—'निष्पाप! ठीक है, ठीक है, तुमने मुझे भलीभाँति पहचान लिया है। |
| अचिरेणैव कालेन मेदिनी मेदिनीपते।<br>भविष्यति जले मग्ना सशैलवनकानना ॥ ३० | भूपाल! थोड़े ही समयमें पर्वत, वन और काननोंके सहित यह पृथ्वी जलमें निमग्न हो जायगी। |
| नौरियं सर्वदेवानां निकायेन विनिर्मिता।<br>महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थं महीपते ॥ ३१ | इस कारण पृथ्वीपते! सम्पूर्ण जीव-समूहोंकी रक्षा करनेके लिये समस्त देवगणोंद्वारा इस नौकाका निर्माण किया गया है। |
| स्वेदण्डजोद्भिदो ये वै ये च जीवा जरायुजाः।<br>अस्यां निधाय सर्वांस्ताननाथान् पाहि सुव्रत ॥ ३२ | सुव्रत! जितने स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज जीव हैं तथा जितने जरायुज जीव हैं, उन सभी अनाथोंको इस नौकामें चढ़ाकर तुम उन सबकी रक्षा करना। |
| युगान्तवाताभिहता यदा भवति नौर्नृप।<br>शृङ्गेऽस्मिन् मम राजेन्द्र तदेमां संयमिष्यसि ॥ ३३ | राजन्! जब युगान्तकी वायुसे आहत होकर यह नौका डगमगाने लगेगी, उस समय राजेन्द्र! तुम उसे मेरे इस सींगमें बाँध देना। |
२- मनुका मत्स्यभगवान्से युगान्तविषयक प्रश्न, मत्स्यका प्रलयके स्वरूपका वर्णन करके अन्तर्धान हो जाना, प्रलयकाल उपस्थित होनेपर मनुका जीवोंको नौकापर चढ़ाकर उसे महामत्स्यके सींगमें शेषनागकी रस्सीसे बाँधना एवं उनसे सृष्टि आदिके विषयमें विविध प्रश्न करना और मत्स्यभगवान्का उत्तर देना
१६ * मत्स्यपुराण *
| ततो लयान्ते सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च।<br>प्रजापतित्वं भविता जगतः पृथिवीपते॥ ३४<br><br>एवं कृतयुगस्यादौ सर्वज्ञो धृतिमान् नृपः।<br>मन्वन्तराधिपश्चापि देवपूज्यो भविष्यसि॥ ३५ | तदनन्तर पृथिवीपते! प्रलयकी समाप्तिमें तुम जगत्के समस्त स्थावर-जङ्गम प्राणियोंके प्रजापति होओगे। इस प्रकार कृतयुगके प्रारम्भमें सर्वज्ञ एवं धैर्यशाली नरेशके रूपमें तुम मन्वन्तरके भी अधिपति होओगे, उस समय देवगण तुम्हारी पूजा करेंगे॥ १८–३५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मनुमत्स्यसंवादे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें मनु-विष्णु-संवादमें प्रथम अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १॥
दूसरा अध्याय
मनुका मत्स्यभगवान्से युगान्तविषयक प्रश्न, मत्स्यका प्रलयके स्वरूपका वर्णन करके अन्तर्धान हो जाना, प्रलयकाल उपस्थित होनेपर मनुका जीवोंको नौकापर चढ़ाकर उसे महामत्स्यके सींगमें शेषनागकी रस्सीसे बाँधना एवं उनसे सृष्टि आदिके विषयमें विविध प्रश्न करना और मत्स्यभगवान्का उत्तर देना
| सूत उवाच<br>एवमुक्तो मनुस्तेन पप्रच्छ मधुसूदनम्।<br>भगवन् कियद्भिर्वर्षैर्भविष्यत्यन्तरक्षयः॥ १<br>सत्त्वानि च कथं नाथ रक्षिष्ये मधुसूदन।<br>त्वया सह पुनर्योगः कथं वा भविता मम॥ २<br><br>मत्स्य उवाच<br>अद्यप्रभृत्यनावृष्टिर्भविष्यति महीतले।<br>यावद् वर्षशतं साग्रं दुर्भिक्षमशुभावहम्॥ ३<br>ततोऽल्पसत्त्वक्षयदा रश्मयः सप्त दारुणाः।<br>सप्तसप्तेर्भविष्यन्ति प्रतप्ताङ्गारवर्षिणः॥ ४<br>और्वानलोऽपि विकृतिं गमिष्यति युगक्षये।<br>विषाग्निश्चापि पातालात् संकर्षणमुखाच्च्युतः।<br>भवस्यापि ललाटोत्थतृतीयनयनानलः॥ ५<br>त्रिजगन्निर्दहन् क्षोभं समेष्यति महामुने।<br>एवं दग्धा मही सर्वा यदा स्याद् भस्मसंनिभा॥ ६<br>आकाशमूष्मणा तप्तं भविष्यति परंतप।<br>ततः सदेवनक्षत्रं जगद् यास्यति संक्षयम्॥ ७<br>संवर्तो भीमनादश्च द्रोणश्चण्डो बलाहकः।<br>विद्युत्पताकः शोणस्तु सप्तैते लयवारिदाः॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् मत्स्यद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मनुने उन मधुसूदनसे प्रश्न किया—'भगवन्! यह युगान्त-प्रलय कितने वर्षों बाद आयेगा? नाथ! मैं सम्पूर्ण जीवोंकी रक्षा किस प्रकार कर सकूँगा? तथा मधुसूदन! आपके साथ मेरा पुनः सम्मिलन कैसे हो सकेगा?'॥ १-२॥<br><br>मत्स्यभगवान् कहने लगे—'महामुने! आजसे लेकर सौ वर्षतक इस भूतलपर वृष्टि नहीं होगी, जिसके फलस्वरूप परम अमाङ्गलिक एवं अत्यन्त भयंकर दुर्भिक्ष आ पड़ेगा। तदनन्तर युगान्त प्रलयके उपस्थित होनेपर तपे हुए अंगारकी वर्षा करनेवाली सूर्यकी सात भयंकर किरणें छोटे-मोटे जीवोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हो जायँगी। बडवानल भी अत्यन्त भयानक रूप धारण कर लेगा। पाताललोकसे ऊपर उठकर संकर्षणके मुखसे निकली हुई विषाग्नि तथा भगवान् रुद्रके ललाटसे उत्पन्न तीसरे नेत्रकी अग्नि भी तीनों लोकोंको भस्म करती हुई भभक उठेगी। परंतप! इस प्रकार जब सारी पृथ्वी जलकर राखकी ढेर बन जायगी और गगन-मण्डल ऊष्मासे संतप्त हो उठेगा, तब देवताओं और नक्षत्रोंसहित सारा जगत् नष्ट हो जायगा। उस समय संवर्त, भीमनाद, द्रोण, चण्ड, बलाहक, विद्युत्पताक और शोण नामक जो ये सात प्रलयकारक मेघ हैं, ये सभी |
* अध्याय २ * १७
| अग्निप्रस्वेदसम्भूतां प्लावयिष्यन्ति मेदिनीम्।<br>समुद्राः क्षोभमागत्य चैकत्वेन व्यवस्थिताः॥ ९<br>एतदेकार्णवं सर्वं करिष्यन्ति जगत्त्रयम्।<br>वेदनावमिमां गृह्य सत्त्वबीजानि सर्वशः॥ १०<br>आरोप्य रज्जुयोगेन मत्प्रदत्तेन सुव्रत।<br>संयम्य नावं मच्छृङ्गे मत्प्रभावाभिरक्षितः॥ ११<br>एकः स्थास्यसि देवेषु दग्धेष्वपि परंतप।<br>सोमसूर्यावहं ब्रह्मा चतुर्लोकसमन्वितः॥ १२<br>नर्मदा च नदी पुण्या मार्कण्डेयो महानृषिः।<br>भवो वेदाः पुराणानि विद्याभिः सर्वतोवृतम्॥ १३<br>त्वया सार्धमिदं विश्वं स्थास्यत्यन्तरसंक्षये।<br>एवमेकार्णवे जाते चाक्षुषान्तरसंक्षये॥ १४<br>वेदान् प्रवर्तयिष्यामि त्वत्सर्गादौ महीपते।<br>एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १५<br>मनुरप्यास्थितो योगं वासुदेवप्रसादजम्।<br>अभ्यसन् यावदाभूतसम्प्लवं पूर्वसूचितम्॥ १६ | अग्निके प्रस्वेदसे उत्पन्न हुए जलकी घोर वृष्टि करके सारी पृथ्वीको आप्लावित कर देंगे। तब सातों समुद्र क्षुब्ध होकर एकमेक हो जायँगे और इन तीनों लोकोंको पूर्णरूपसे एकार्णवके आकारमें परिणत कर देंगे। सुव्रत! उस समय तुम इस वेदरूपी नौकाको ग्रहण करके इसपर समस्त जीवों और बीजोंको लाद देना तथा मेरे द्वारा प्रदान की गयी रस्सीके बन्धनसे इस नावको मेरे सींगमें बाँध देना। परंतप! (ऐसे भीषण कालमें जब कि) सारा देव-समूह जलकर भस्म हो जायगा तो भी मेरे प्रभावसे सुरक्षित होनेके कारण एकमात्र तुम्हीं अवशेष रह जाओगे। इस आन्तर-प्रलयमें सोम, सूर्य, मैं, चारों लोकोंसहित ब्रह्मा, पुण्यतोया नर्मदा नदी, महर्षि मार्कण्डेय, शंकर, चारों वेद, विद्याओंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए पुराण और तुम्हारे साथ यह (नौका-स्थित) विश्व—ये ही बचेंगे। महीपते! चाक्षुष-मन्वन्तरके प्रलयकालमें जब इसी प्रकार सारी पृथ्वी एकार्णवमें निमग्न हो जायगी और तुम्हारे द्वारा सृष्टिका प्रारम्भ होगा, तब मैं वेदोंका (पुनः) प्रवर्तन करूँगा।' ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य वहीं अन्तर्धान हो गये तथा मनु भी वहीं स्थित रहकर भगवान् वासुदेवकी कृपासे प्राप्त हुए योगका तबतक अभ्यास करते रहे, जबतक पूर्वसूचित प्रलयका समय उपस्थित न हुआ॥ ३—१६॥ |
| काले यथोक्ते सञ्जाते वासुदेवमुखोद्गते।<br>शृङ्गी प्रादुर्बभूवाथ मत्स्यरूपी जनार्दनः॥ १७<br>भुजङ्गो रज्जुरूपेण मनोः पार्श्वमुपागमत्।<br>भूतान् सर्वान् समाकृष्य योगेनारोप्य धर्मवित्॥ १८<br>भुजङ्गरज्ज्वा मत्स्यस्य शृङ्गे नावमयोजयत्।<br>उपर्युपस्थितस्तस्याः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १९<br>आभूतसम्प्लवे तस्मिन्नतीते योगशायिना।<br>पृष्टेन मनुना प्रोक्तं पुराणं मत्स्यरूपिणा।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः॥ २०<br>यद् भवद्भिः पुरा पृष्टः सृष्ट्यादिकमहं द्विजाः।<br>तदेवैकार्णवे तस्मिन् मनुः पप्रच्छ केशवम्॥ २१ | तदनन्तर भगवान् वासुदेवके मुखसे कहे गये पूर्वोक्त प्रलयकालके उपस्थित होनेपर भगवान् जनार्दन एक सींगवाले मत्स्यके रूपमें प्रादुर्भूत हुए। उसी समय एक सर्प भी रज्जु-रूपसे बहता हुआ मनुके पार्श्वभागमें आ पहुँचा। तब धर्मज्ञ मनुने अपने योगबलसे समस्त जीवोंको खींचकर नौकापर लाद लिया और उसे सर्परूपी रस्सीसे मत्स्यके सींगमें बाँध दिया। तत्पश्चात् भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके वे स्वयं भी उस नौकापर बैठ गये। श्रेष्ठ ऋषियो! इस प्रकार उस अतीत प्रलयके अवसरपर योगाभ्यासी मनुद्वारा पूछे जानेपर मत्स्यरूपी भगवान्ने जिस पुराणका वर्णन किया था, उसीका मैं इस समय आपलोगोंके समक्ष प्रवचन करूँगा, सावधान होकर श्रवण कीजिये। द्विजवरो! पहले आपलोगोंने मुझसे जिस सृष्टि आदिके विषयमें प्रश्न किया है, उन्हीं विषयोंको उस एकार्णवके समय मनुने भी भगवान् केशवसे पूछा था॥ १७—२१॥ |
| १८ | * मत्स्यपुराण * |
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| मनुरुवाच | मनुने पूछा— भगवन्! सृष्टिकी उत्पत्ति और उसका संहार, मानव-वंश, मन्वन्तर, मानव-वंशमें उत्पन्न हुए लोगोंके चरित्र, भुवनका विस्तार, दान और धर्मकी विधि, सनातन श्राद्धकल्प, वर्ण और आश्रमका विभाग, इष्टापूर्त (वापी, कूप, तड़ाग आदि)-के निर्माणकी विधि और देवताओंकी प्रतिष्ठा आदि तथा और भी जो कोई धार्मिक विषय भूतलपर विद्यमान हैं, उन सभीका आप मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥२२—२४॥ | | उत्पत्तिं प्रलयं चैव वंशान् मन्वन्तराणि च।<br>वंश्यानुचरितं चैव भुवनस्य च विस्तरम्॥ २२<br>दानधर्मविधिं चैव श्राद्धकल्पं च शाश्वतम्।<br>वर्णाश्रमविभागं च तथेष्टापूर्तसंज्ञितम्॥ २३<br>देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद् विद्यते भुवि।<br>तत्सर्वं विस्तरेण त्वं धर्मं व्याख्यातुमर्हसि॥ २४ | | | मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे— महाप्रलयके समयका अवसान होनेपर यह सारा स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् सोये हुएकी भाँति अन्धकारसे आच्छन्न था। न तो इसके विषयमें कोई कल्पना ही की जा सकती थी, न कोई वस्तु जानी ही जा सकती थी, न किसी वस्तुका कोई चिह्न ही अवशेष था। सभी वस्तुएँ विस्मृत हो चुकी थीं। कोई ज्ञातव्य वस्तु रह ही नहीं गयी थी। तदनन्तर जो पुण्यकर्मोंके उत्पत्ति-स्थान तथा निराकार हैं, वे स्वयम्भूभगवान् इस समस्त जगत्को प्रकट करनेके अभिप्रायसे अन्धकारका भेदन करके प्रादुर्भूत हुए। उस समय जो इन्द्रियोंसे परे, परात्पर, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्से भी महान्, अविनाशी और नारायण नामसे विख्यात हैं, वे स्वयं अकेले ही आविर्भूत हुए। उन्होंने अपने शरीरसे अनेक प्रकारके जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे (पूर्वसृष्टिका) भलीभाँति ध्यान करके प्रथमतः जलकी ही रचना की और उसमें (अपने वीर्यस्वरूप) बीजका निक्षेप किया। वही बीज एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सुवर्ण एवं रजतमय अण्डेके रूपमें परिणत हो गया, उसकी कान्ति दस सहस्र सूर्योंके सदृश थी। तत्पश्चात् महातेजस्वी स्वयम्भू स्वयं ही उस अण्डेके भीतर प्रविष्ट हो गये तथा अपने प्रभावसे एवं उस अण्डेमें सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण वे पुनः विष्णुभावको प्राप्त हो गये। तदनन्तर उस अण्डेके भीतर सर्वप्रथम ये भगवान् सूर्य उत्पन्न हुए, जो आदिसे प्रकट होनेके कारण 'आदित्य' और वेदोंका पाठ करनेसे 'ब्रह्मा' नामसे विख्यात हुए। उन्होंने ही उस अण्डेको दो भागोंमें विभक्त कर स्वर्गलोक और भूतलकी रचना की तथा उन दोनोंके मध्यमें सम्पूर्ण दिशाओं और अविनाशी आकाशका निर्माण किया। उस समय उस अण्डेके जरायु-भागसे मेरु आदि सातों पर्वत प्रकट हुए और जो उल्ब (गर्भाशय) था, वह विद्युतसमूहसहित मेघमण्डलके रूपमें परिणत हुआ तथा उसी अण्डेसे नदियाँ, पितृगण और मनुसमुदाय उत्पन्न हुए। नाना रत्नोंसे परिपूर्ण जो ये लवण, इक्षु, सुरा आदि सातों समुद्र हैं, वे भी उस अण्डेके अन्तःस्थित जलसे प्रकट हुए। | | महाप्रलयकालान्त एतदासीत् तमोमयम्।<br>प्रसुप्तमिव चातर्क्यमप्रज्ञातमलक्षणम्॥ २५<br>अविज्ञेयमविज्ञातं जगत् स्थास्नु चरिष्णु च।<br>ततः स्वयम्भूव्यक्तः प्रभवः पुण्यकर्मणाम्॥ २६<br>व्यञ्जयन्नेतदखिलं प्रादुरासीत् तमोनुदः।<br>योऽतीन्द्रियः परो व्यक्तादणुर्ज्यायान् सनातनः।<br>नारायण इति ख्यातः स एकः स्वयमुद्बभौ॥ २७<br>यः शरीरादभिध्याय सिसृक्षुर्विविधं जगत्।<br>अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ २८<br>तदेवाण्डं समभवद्धेमरूप्यमयं महत्।<br>संवत्सरसहस्रेण सूर्य्यायुतसमप्रभम्॥ २९<br>प्रविश्यान्तर्महातेजाः स्वयमेवात्मसम्भवः।<br>प्रभावादपि तद्व्याप्त्या विष्णुत्वमगमत् पुनः॥ ३०<br>तदन्तर्भगवानेश सूर्यः समभवत् पुरा।<br>आदित्यश्चादिभूतत्वाद् ब्रह्मा ब्रह्म पठन्नभूत्॥ ३१<br>दिवं भूमिं समकरोत् तदण्डशकलद्वयम्।<br>स चाकरोद्दिशः सर्वा मध्ये व्योम च शाश्वतम्॥ ३२<br>जरायुर्मेरुमुख्याश्च शैलास्तस्याभवंस्तदा।<br>यदल्बं तदभून्मेघस्तडित्सङ्घातमण्डलम्॥ ३३<br>नद्योऽण्डनाभ्रः सम्भूताः पितरो मनवस्तथा।<br>सप्त येऽमी समुद्राश्च तेऽपि चान्तर्जलोद्भवाः।<br>लवणेक्षुसुराद्याश्च नानारत्नसमन्विताः॥ ३४ | |
३- मनुका मत्स्यभगवान्से ब्रह्माके चतुर्मुख होने तथा लोकोंकी सृष्टि करनेके विषयमें प्रश्न एवं मत्स्यभगवान्द्वारा उत्तररूपमें ब्रह्मासे वेद, सरस्वती, पाँचवें मुख और मनु आदिकी उत्पत्तिका कथन
| * अध्याय ३ * | १९ |
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| स सिसृक्षुरभूद् देवः प्रजापतिररिंदम।<br>तत्तेजसश्च तत्रैष मार्तण्डः समजायत॥ ३५<br>मृतेऽण्डे जायते यस्मान्मार्तण्डस्तेन संस्मृतः।<br>रजोगुणमयं यत्तद्रूपं तस्य महात्मनः।<br>चतुर्मुखः स भगवानभूल्लोकपितामहः॥ ३६<br>येन सृष्टं जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>तमवेहि रजोरूपं महत्सत्त्वमुदाहृतम्॥ ३७ | शत्रुदमन! जब उन प्रजापति देवको सृष्टि रचनेकी इच्छा हुई, तब वहीं उनके तेजसे ये मार्तण्ड (सूर्य) प्रादुर्भूत हुए। चूँकि ये अण्डेके मृत हो जानेके पश्चात् उत्पन्न हुए थे, इसलिये 'मार्तण्ड' नामसे प्रसिद्ध हुए। उन महात्माका जो रजोगुणमय रूप था, वह लोकपितामह चतुर्मुख भगवान् ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुआ। जिन्होंने देवता, असुर और मानवसहित समस्त जगत्की रचना की, उन्हें तुम रजोगुणरूप सुप्रसिद्ध महान् सत्त्व समझो॥ २५—३७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मनुमत्स्यसंवादवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गेमें मनुमत्स्यसंवादवर्णन नामक दूसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २॥
तीसरा अध्याय
मनुका मत्स्यभगवान्से ब्रह्माके चतुर्मुख होने तथा लोकोंकी सृष्टि करनेके विषयमें प्रश्न एवं मत्स्यभगवान्द्वारा उत्तररूपमें ब्रह्मासे वेद, सरस्वती, पाँचवें मुख और मनु आदिकी उत्पत्तिका कथन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा— |
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| चतुर्मुखत्वमगमत् कस्माल्लोकपितामहः।<br>कथं तु लोकानसृजद् ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः॥ १ | भगवान्! ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ लोक-पितामह ब्रह्मा चतुर्मुख कैसे हुए तथा उन्होंने (सभी) लोकोंकी रचना किस प्रकार की?॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे— |
| तपश्चचार प्रथमममराणां पितामहः।<br>आविर्भूतास्ततो वेदाः साङ्गोपाङ्गपदक्रमाः॥ २ | राजर्षे! देवताओंके पितामह ब्रह्माने पहले बड़ा ही कठोर तप किया था, जिसके प्रभावसे अङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द), उपाङ्ग (पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र), पद (वैदिक मन्त्रोंका पद-पाठ निर्धारित करना) और क्रम (वेद-पाठकी एक विशेष प्रणाली)-सहित वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ। |
| पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।<br>नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ३ | सम्पूर्ण शास्त्रोंकी उत्पत्तिके पूर्व ब्रह्माने उस पुराणका स्मरण किया, जो अविनाशी, शब्दमय, पुण्यशाली एवं सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तृत है। |
| अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिःसृताः।<br>मीमांसान्यायविद्याश्च प्रमाणाष्टकसंयुताः॥ ४ | तदनन्तर ब्रह्माके मुखोंसे वेद, आठ प्रमाणोंसहित* मीमांसा और न्यायशास्त्रका आविर्भाव हुआ। |
| वेदाभ्यासरतस्यास्य प्रजाकामस्य मानसाः।<br>मनसः पूर्वसृष्टा वै जाता यत् तेन मानसाः॥ ५ | तत्पश्चात् वेदाभ्यासमें निरत रहनेवाले ब्रह्माने पुत्र उत्पन्न करनेकी कामनासे युक्त होकर पूर्वनिर्धारित दस मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया। मानसिक संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण वे सभी मानस पुत्रके नामसे प्रख्यात हुए। |
| मरीचिरभवत् पूर्वं ततोऽत्रिर्भगवानृषिः।<br>अङ्गिराश्चाभवत् पश्चात् पुलस्त्यस्तदनन्तरम्॥ ६ | उन पुत्रोंमें सर्वप्रथम मरीचि, तदनन्तर ऐश्वर्यशाली महर्षि अत्रि हुए। पुनः अङ्गिरा और उनके बाद पुलस्त्य हुए। |
* पौराणिकोंके आठ प्रमाण ये हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द (आप्तवचन), अनुपलब्धि, अर्थापत्ति, ऐतिह्य और स्वभाव। (सर्वदर्शनसंग्रह)
| २० | * मत्स्यपुराण * |
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| ततः पुलहनामा वै ततः क्रतुरजायत ।<br>प्रचेताश्च ततः पुत्रो वसिष्ठश्चाभवत् पुनः ॥ ७<br>पुत्रो भृगुरभूत् तद्वन्नारदोऽप्यचिरादभूत् ।<br>दशेमान् मानसान् ब्रह्मा मुनीन् पुत्रानजीजनत् ॥ ८<br>शारीरानथ वक्ष्यामि मातृहीनान् प्रजापतेः ।<br>अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्षः प्रजापतिरजायत ॥ ९<br>धर्मः स्तनान्तादभवद्धृदयात् कुसुमायुधः ।<br>भ्रूमध्यादभवत् क्रोधो लोभश्चाधरसम्भवः ॥ १०<br>बुद्धेर्मोहः समभवदहंकारादभून्मदः ।<br>प्रमोदश्चाभवत् कण्ठान्मृत्युर्लोचनतो नृप ॥ ११<br>भरतः करमध्यात्तु ब्रह्मसूनुरभूत्ततः ।<br>एते नव सुता राजन् कन्या च दशमी पुनः ।<br>अङ्गजा इति विख्याता दशमी ब्रह्मणः सुता ॥ १२ | तदनन्तर पुलह और तत्पश्चात् क्रतु उत्पन्न हुए। उसके बाद प्रचेता नामक पुत्र हुए। पुनः वसिष्ठजीका जन्म हुआ। तत्पश्चात् भृगु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए तथा शीघ्र ही नारदका भी आविर्भाव हुआ। इन्हीं दस पुत्रोंको ब्रह्माने अपने मनसे उत्पन्न किया, जो सभी मुनि-रूपसे विख्यात हुए। राजन्! अब मैं ब्रह्माके शरीरसे उत्पन्न हुए मातृ-विहीन पुत्रोंका वर्णन करता हूँ। प्रजापति ब्रह्माके दाहिने अँगूठेसे दक्ष प्रजापति प्रकट हुए। उनके स्तनान्तभागसे धर्म और हृदयसे कुसुमायुध (कामदेव)-का जन्म हुआ। भ्रूमध्यसे क्रोध और होंठसे लोभकी उत्पत्ति हुई। बुद्धिसे मोहका तथा अहंकारसे मदका जन्म हुआ। कण्ठसे प्रमोद और नेत्रोंसे मृत्युकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् हथेलीसे ब्रह्मपुत्र भरत* प्रकट हुए। राजन्! ये नौ पुत्र ब्रह्माके शरीरसे प्रकट हुए हैं। ब्रह्माकी दसवीं संतान (एक) कन्या है, जो अङ्गजा नामसे विख्यात हुई॥ २—१२॥ | | <div align="center">मनुरुवाच</div>बुद्धेर्मोहः समभवदिति यत् परिकीर्तितम् ।<br>अहंकारः स्मृतः क्रोधो बुद्धिर्नाम किमुच्यते ॥ १३ | **मनुने पूछा—**भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि बुद्धिसे मोहकी उत्पत्ति हुई और (इसी प्रसङ्गमें) अहंकार, क्रोध एवं बुद्धिका भी नाम लिया, सो ये सब क्या हैं? (इनपर प्रकाश डालिये)॥ १३॥ | | <div align="center">मत्स्य उवाच</div>सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम् ।<br>साम्यावस्थितिरेतेषां प्रकृतिः परिकीर्तिता ॥ १४<br>केचित् प्रधानमित्याहुरव्यक्तमपरे जगुः ।<br>एतदेव प्रजासृष्टिं करोति विकरोति च ॥ १५<br>गुणेभ्यः क्षोभमाणेभ्यस्त्रयो देवा विजज्ञिरे ।<br>एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ १६<br>सविकारात् प्रधानात्तु महत्तत्त्वं प्रजायते ।<br>महानिति यतः ख्यातिर्लोकानां जायते सदा ॥ १७<br>अहंकारश्च महतो जायते मानवर्धनः ।<br>इन्द्रियाणि ततः पञ्च वक्ष्ये बुद्धिवशानि तु ।<br>प्रादुर्भवन्ति चान्यानि तथा कर्मवशानि तु ॥ १८ | **मत्स्यभगवान् कहने लगे—**राजर्षे! सत्त्व, रजस् और तमस्—जो ये तीनों गुण बतलाये गये हैं, इनकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहा जाता है। कुछ लोग इसे प्रधान कहते हैं। दूसरे लोग इसे अव्यक्त नामसे भी निर्देश करते हैं। यही प्रकृति प्रजाकी सृष्टि करती है और (यही सृष्टिको) बिगाड़ती भी है। इन्हीं तीनों गुणोंके क्षुब्ध होनेपर इनसे तीन देवता उत्पन्न होते हैं। इन (तीनों देवों)-की मूर्ति तो एक ही है, परंतु वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—इन तीन देवताओंके रूपमें विभक्त हो जाती है। तदनन्तर प्रधानके विकृत होनेपर उससे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है, जिससे लोकोंके मध्यमें उसकी सदा 'महान्' रूपसे ख्याति होती है। उस महत्तत्त्वसे मानको बढ़ानेवाला अहंकार प्रकट होता है। उस अहंकारसे दस इन्द्रियाँ आविर्भूत होती हैं, जिनमें पाँच बुद्धि (ज्ञान)-के वशीभूत रहती हैं और दूसरी पाँच कर्मके अधीन रहती हैं। |
* भारतमें भरत नामके कई प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। ये भरतमुनि हैं, जो 'नाट्यवेद' या 'भरतनाट्यम्' के प्रवर्तक माने जाते हैं।
| * अध्याय ३ * | २१ |
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| श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका च यथाक्रमम्।<br>पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चेतीन्द्रियसंग्रहः ॥ १९<br><br>शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः।<br>उत्सर्गानन्दनादानगत्यालापाश्च तत्क्रियाः ॥ २०<br><br>मन एकादशं तेषां कर्मबुद्धिगुणान्वितम्।<br>इन्द्रियावयवाः सूक्ष्मास्तस्य मूर्तिं मनीषिणः ॥ २१<br><br>श्रयन्ति यस्मात् तन्मात्राः शरीरं तेन संस्मृतम्।<br>शरीरयोगाज्जीवोऽपि शरीरी गद्यते बुधैः ॥ २२<br><br>मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया।<br>आकाशं शब्दतन्मात्राद्भूच्छब्दगुणात्मकम् ॥ २३<br><br>आकाशविकृतेर्वायुः शब्दस्पर्शगुणोऽभवत्।<br>वायोश्च स्पर्शतन्मात्रात्तेजश्चाविरभूत्ततः ॥ २४<br><br>त्रिगुणं तद्विकारेण तच्छब्दस्पर्शरूपवत्।<br>तेजोविकारादभवद् वारि राजंश्चतुर्गुणम् ॥ २५<br><br>रसतन्मात्रसम्भूतं प्रायो रसगुणात्मकम्।<br>भूमिस्तु गन्धतन्मात्रादभूत् पञ्चगुणान्विता ॥ २६<br><br>प्रायो गन्धगुणा सा तु बुद्धिरेषा गरीयसी।<br>एभिः सम्पादितं भुङ्क्ते पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ २७<br><br>ईश्वरेच्छावशः सोऽपि जीवात्मा कथ्यते बुधैः।<br>एवं षड्विंशकं प्रोक्तं शरीरमिह मानवैः ॥ २८<br><br>सांख्यं संख्यात्मकत्वाच्च कपिलादिभिरुच्यते।<br>एतत्तत्त्वात्मकं कृत्वा जगद् वेधा अजीजनत् ॥ २९<br><br>सावित्रीं लोकसृष्ट्यर्थं हृदि कृत्वा समास्थितः।<br>ततः संजपतस्तस्य भित्त्वा देहमकल्मषम् ॥ ३०<br><br>स्त्रीरूपमर्धमकरोदर्धं पुरुषरूपवत्।<br>शतरूपा च सा ख्याता सावित्री च निगद्यते ॥ ३१ | इस इन्द्रिय-समुदायमें क्रमशः श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा पायु (गुदा), उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), हस्त, पाद और वाणी—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इन दसों इन्द्रियोंके क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, उत्सर्ग (मल एवं अपानवायु आदिका त्याग), आनन्दन (आनन्दप्रदान), आदान (ग्रहण करना), गमन और आलाप—ये दस कार्य हैं। इन दसों इन्द्रियोंके अतिरिक्त मननामक ग्यारहवीं इन्द्रिय है, जिसमें कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंके समस्त गुण वर्तमान हैं। इन इन्द्रियोंके जो सूक्ष्म अवयव उस मनीषीके शरीरका आश्रय लेते हैं, वे तन्मात्र कहलाते हैं और जिसके सम्पर्कसे तन्मात्रकी उत्पत्ति होती है, उसे शरीर कहा जाता है। उस शरीरका सम्बन्ध होनेके कारण विद्वान्लोग जीवको भी 'शरीरी' कहते हैं। जब सृष्टि करनेकी इच्छासे मनको प्रेरित किया जाता है, तब वही सृष्टिकी रचना करता है। उस समय शब्दतन्मात्रसे शब्दरूप गुणवाला आकाश प्रकट होता है। इसी आकाशके विकृत होनेपर वायुकी उत्पत्ति होती है, जो शब्द और स्पर्श—दो गुणोंवाली है। तत्पश्चात् वायु और स्पर्शतन्मात्रसे तेजका आविर्भाव होता है, जो शब्द, स्पर्श और रूपनामक तीन विकारोंसे युक्त होनेके कारण त्रिगुणात्मक हुआ। राजन्! इस त्रिगुणात्मक तेजमें विकार उत्पन्न होनेसे चार गुणोंवाले जलका प्राकट्य होता है, जो रस-तन्मात्रसे उद्भूत होनेके कारण प्रायः रसगुणप्रधान ही होता है। तत्पश्चात् पाँच गुणोंसे सम्पन्न पृथ्वीका प्रादुर्भाव होता है। वह प्रायः गन्ध-गुणसे ही युक्त रहती है। यही (इन सबका यथार्थ ज्ञान रखना ही) श्रेष्ठ बुद्धि है। इन्हीं चौबीस (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्र, एक मन, एक बुद्धि, एक अव्यक्त, अहंकार) तत्त्वोंद्वारा सम्पादित सुख-दुःखात्मक कर्मका पचीसवाँ पुरुषनामक तत्त्व भोग करता है। वह भी ईश्वरकी इच्छाके वशीभूत रहता है, इसीलिये विद्वान्लोग उसे जीवात्मा कहते हैं। इस प्रकार इस मानव-योनिमें यह शरीर छब्बीस तत्त्वोंसे संयुक्त बतलाया जाता है। कपिल आदि महर्षियोंने संख्यात्मक होनेके कारण इसे 'सांख्य' (ज्ञान) नामसे अभिहित किया है तथा इन्हीं तत्त्वोंका आश्रय लेकर ब्रह्माने जगत्की रचना की है॥ १४—२९॥<br><br>जब ब्रह्माने जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे हृदयमें सावित्रीका ध्यान करके तपश्चरण प्रारम्भ किया। उस समय जप करते हुए उनका निष्पाप शरीर दो भागोंमें विभक्त हो गया। उनमें आधा भाग स्त्रीरूप और आधा पुरुषरूप हो गया। |
| २२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| सरस्वत्यथ गायत्री ब्रह्माणी च परंतप।<br>ततः स्वदेहसम्भूतामात्मजामित्यकल्पयत्॥ ३२<br>दृष्ट्वा तां व्यथितस्तावत् कामबाणार्दितो विभुः।<br>अहो रूपमहो रूपमिति चाह प्रजापतिः॥ ३३<br>ततो वसिष्ठप्रमुखा भगिनीमिति चुक्रुशुः।<br>ब्रह्मा न किंचिद् ददृशे तन्मुखालोकनादृते॥ ३४<br>अहो रूपमहो रूपमिति प्राह पुनः पुनः।<br>ततः प्रणामनम्रां तां पुनरेवाभ्यलोकयत्॥ ३५<br>अथ प्रदक्षिणं चक्रे सा पितुर्वरवर्णिनी।<br>पुत्रेभ्यो लज्जितस्यास्य तद्रूपालोकनेच्छया॥ ३६<br>आविर्भूतं ततो वक्त्रं दक्षिणं पाण्डुगण्डवत्।<br>विस्मयस्फुरदोष्ठं च पाश्चात्यमुदगात्ततः॥ ३७<br>चतुर्थमभवत् पश्चाद् वामं कामशरातुरम्।<br>ततोऽन्यदभवत्तस्य कामातुरतया तथा॥ ३८<br>उत्पतन्त्यास्तदाकारा अवलोकनकुतूहलात्।<br>सृष्ट्यर्थं यत् कृतं तेन तपः परमदारुणम्॥ ३९<br>तत् सर्वं नाशमगमत् स्वसुतोपगमेच्छया।<br>तेनोर्ध्वं वक्त्रमभवत् पञ्चमं तस्य धीमतः।<br>आविर्भवज्जटाभिश्च तद् वक्त्रं चावृणोत् प्रभुः॥ ४० | परंतप! वह स्त्री सरस्वती, 'शतरूपा' नामसे विख्यात हुई। वही सावित्री, गायत्री और ब्रह्माणी भी कही जाती है। इस प्रकार ब्रह्माने अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाली सावित्रीको अपनी पुत्रीके रूपमें स्वीकार किया; परंतु तत्काल ही उस सावित्रीको देखकर वे सर्वश्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा मुग्ध हो उठे और यों कहने लगे—'कैसा मनोहर रूप है! कैसा सौन्दर्यशाली रूप है।' ब्रह्माको सावित्रीके मुखकी ओर अवलोकन करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं दीखता था। वे बारंबार यही कह रहे थे—'कैसा अद्भुत रूप है! कैसी अनोखी सुन्दरता है!' तत्पश्चात् जब सावित्री झुककर उन्हें प्रणाम करने लगी, तब ब्रह्मा पुनः उसे देखने लगे। तदनन्तर सुन्दरी सावित्रीने अपने पिता ब्रह्माकी प्रदक्षिणा की। इसी समय सावित्रीके रूपका अवलोकन करनेकी इच्छा होनेके कारण ब्रह्माके मुखके दाहिने पार्श्वमें पीले गण्डस्थलोंवाला (एक दूसरा) नूतन मुख प्रकट हो गया! पुनः विस्मययुक्त एवं फड़कते हुए होंठोंवाला दूसरा (तीसरा) मुख पीछेकी ओर उद्भूत हुआ तथा उनकी बायीं ओर कामदेवके बाणोंसे व्यथित-से देखनेवाले एक अन्य (चौथे) मुखका आविर्भाव हुआ। सावित्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेके कारण ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचनाके लिये जो अत्यन्त उग्र तप किया गया था, उसका सारा फल नष्ट हो गया तथा उसी पापके परिणामस्वरूप बुद्धिमान् ब्रह्माके मुखके ऊपर एक पाँचवाँ मुख आविर्भूत हुआ, जो जटाओंसे व्याप्त था। ऐश्वर्यशाली ब्रह्माने उस मुखको भी वरण (स्वीकार) कर लिया॥ ३०—४०॥ |
| ततस्तानब्रवीद् ब्रह्मा पुत्रानात्मसमुद्भवान्।<br>प्रजाः सृजध्वमभितः सदेवासुरमानुषीः॥ ४१<br>एवमुक्तास्ततः सर्वे ससृजुर्विविधाः प्रजाः।<br>गतेषु तेषु सृष्ट्यर्थं प्रणामावनतामिमाम्॥ ४२<br>उपयेमे स विश्वात्मा शतरूपामनिन्दिताम्।<br>सम्बभूव तया सार्धमतिकामातुरो विभुः।<br>सलज्जां चकमे देवः कमलोदरमन्दिरे॥ ४३<br>यावदब्दशतं दिव्यं यथान्यः प्राकृतो जनः।<br>ततः कालेन महता तस्याः पुत्रोऽभवन्मनुः॥ ४४<br>स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम्।<br>तद्रूपगुणसामान्यादधिपूरुष उच्यते॥ ४५ | तदनन्तर ब्रह्माने अपने उन मरीचि आदि मानस पुत्रोंको आज्ञा दी कि तुमलोग भूतलपर चारों ओर देवता, असुर और मानवरूप प्रजाओंकी सृष्टि करो। पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन पुत्रोंने अनेकों प्रकारकी प्रजाओंकी रचना की। सृष्टि-कार्यके लिये अपने उन पुत्रोंके चले जानेपर विश्वात्मा ब्रह्माने प्रणाम करनेके लिये चरणोंमें पड़ी हुई उस अनिन्दिता शतरूपा* का पाणिग्रहण किया। तदनन्तर अधिक समय व्यतीत होनेके उपरान्त शतरूपाके गर्भसे मनु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जो स्वायम्भुव नामसे विख्यात हुआ। उसे विराट् भी कहा जाता है तथा अपने पिता ब्रह्माके रूप और गुणकी समानताके कारण उसे |
* इसमें तथा अगले अध्यायमें शतरूपाका वर्णन है। शतरूपाका यहाँ अर्थ शतेन्द्रिया माया (मत्स्यपुराण ४। २४) या मूल प्रकृति है। क्योंकि इसे तथा हरिवंश १। २। १ को छोड़ अन्यत्र सर्वत्र शतरूपा स्वायम्भुव मनुकी पत्नी कही गयी है। यहाँ ४। ३३ में उनकी पत्नी 'अनन्ती' कही गयी है।
४- पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेसे ब्रह्मा दोषी क्यों नहीं हुए— एतद्विषयक मनुका प्रश्न, मत्स्यभगवान्का उत्तर तथा इसी प्रसङ्गमें आदिसृष्टिका वर्णन
| * अध्याय ४ * | २३ |
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| वैराजा यत्र ते जाता बहवः शंसितव्रताः।<br>स्वायम्भुवा महाभागाः सप्त सप्त तथापरे॥ ४६<br><br>स्वारोचिषाद्याः सर्वे ते ब्रह्मतुल्यस्वरूपिणः।<br>औत्तमिप्रमुखास्तद्वद् येषां त्वं सप्तमोऽधुना॥ ४७ | लोग अधिपुरुष भी कहते हैं—ऐसा हमने सुना है। उस ब्रह्म-वंशमें सात-सातके विभागसे जो बहुत-से महाभाग्यशाली एवं नियमोंका पालन करनेवाले स्वारोचिष आदि तथा उसी प्रकार औत्तमि आदि स्वायम्भुव मनु हुए हैं, वे सभी ब्रह्माके समान ही स्वरूपवाले थे। उन्हींमें इस समय तुम सातवें मनु हो॥ ४१–४७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मुखोत्पत्तिर्नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गेमें मुखोत्पत्तिनामक तीसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेसे ब्रह्मा दोषी क्यों नहीं हुए—एतद्विषयक मनुका प्रश्न, मत्स्यभगवान्का उत्तर तथा इसी प्रसङ्गमें आदिसृष्टिका वर्णन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा |
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| अहो कष्टतरं चैतदङ्गजागमनं विभो।<br>कथं न दोषमगमत् कर्मणानेन पद्मभूः॥ १<br>परस्परं च सम्बन्धः सगोत्राणामभूत् कथम्।<br>वैवाहिकस्तत्सुतानां छिन्धि मे संशयं विभो॥ २ | —सर्वव्यापी भगवन्! अहो! पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन तो अत्यन्त कष्टका विषय है, परंतु ऐसा कर्म करनेपर भी कमलयोनि ब्रह्मा दोषभागी क्यों नहीं हुए? तथा उनके सगोत्र पुत्रोंका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कैसे हुआ? विभो! मेरे इस संशयको दूर कीजिये॥ १-२॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे |
| दिव्येयमादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा।<br>अतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदतीन्द्रियशरीरिका॥ ३<br>दिव्यतेजोमयी भूप दिव्यज्ञानसमुद्भवा।<br>न मर्त्यैरभितः शक्या वक्तुं वै मांसचक्षुभिः॥ ४<br>यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम्।<br>विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः॥ ५<br>कार्याकार्ये न देवानां शुभाशुभफलप्रदे।<br>यस्मात्तस्मान्न राजेन्द्र तद्विचारो नृणां शुभः॥ ६<br>अन्यच्च सर्ववेदानामधिष्ठाता चतुर्मुखः।<br>गायत्री ब्रह्मणस्तद्वदङ्गभूता निगद्यते॥ ७<br>अमूर्त्तं मूर्तिमद् वापि मिथुनं तत् प्रचक्षते।<br>विरिञ्चिर्यत्र भगवांस्तत्र देवी सरस्वती।<br>भारती यत्र यत्रैव तत्र तत्र प्रजापतिः॥ ८ | —राजन्! रजोगुणसे उत्पन्न हुई यह शतरूपारूपी* आदिसृष्टि दिव्य है। जिस प्रकार इस (मूल प्रकृति)की इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे अतीत हैं, उसी प्रकार इस (शतरूपा, सहस्ररूपा नारी)-का शरीर भी इन्द्रियातीत है। यह दिव्य तेजसे सम्पन्न एवं दिव्य ज्ञानसे समुद्भूत है, अतः मांस-पिण्डरूप नेत्रधारी मानवोंद्वारा इसका भलीभाँति वर्णन नहीं किया जा सकता। जैसे सर्पोंके मार्गको सर्प तथा सम्पूर्ण पक्षियोंके मार्गको आकाशचारी पक्षी ही जान सकते हैं, वैसे ही (शतरूपा आदि) दिव्य जीवोंके (अचिन्त्य) मार्गको दिव्य जीव ही समझ सकते हैं, मानव कदापि नहीं जान सकते। राजेन्द्र! चूँकि देवताओंके कार्य (करनेयोग्य अर्थात् उचित) तथा अकार्य (न करनेयोग्य अर्थात् अनुचित) शुभ एवं अशुभ फल देनेवाले नहीं होते, इसलिये उनके विषयमें विचार करना मानवोंके लिये श्रेयस्कर नहीं है।* दूसरा कारण यह है कि जिस प्रकार ब्रह्मा सारे वेदोंके अधिष्ठाता हैं, उसी प्रकार (शतरूपारूपी) गायत्री ब्रह्माके अङ्गसे उत्पन्न हुई बतलायी जाती हैं। इसलिये यह मिथुनरूप (जोड़ा) अमूर्त (अव्यक्त) या मूर्तिमान् (व्यक्त) दोनों ही रूपोंमें कहा जाता है। यहाँतक कि जहाँ-जहाँ भगवान् ब्रह्मा हैं, वहाँ-वहाँ (गायत्रीरूपी) सरस्वती देवी भी हैं और जहाँ-जहाँ सरस्वती देवी हैं, वहीं-वहीं ब्रह्मा |
* इसलिये 'न देवचरितं चरेत्', 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्' की चेतावनी—उपदेश प्रसिद्ध है।
| २४ | * मत्स्यपुराण * |
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| यथाऽऽतपो न रहितश्छायया दृश्यते क्वचित्।<br>गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वं तथैव न विमुञ्चति॥ ९<br><br>वेदराशिः स्मृतो ब्रह्मा सावित्री तदधिष्ठिता।<br>तस्मान्न कश्चिद्दोषः स्यात् सावित्रीगमने विभोः॥ १०<br><br>तथापि लज्जावनतः प्रजापतिरभूत् पुरा।<br>स्वसुतोपगमाद् ब्रह्मा शशाप कुसुमायुधम्॥ ११<br><br>यस्मान्ममापि भवता मनः संक्षोभितं शरैः।<br>तस्मात्त्वद्देहमचिराद् रुद्रो भस्मीकरिष्यति॥ १२<br><br>ततः प्रसादयामास कामदेवश्चतुर्मुखम्।<br>न मामकारणे शप्तुं त्वमिहार्हसि मानद॥ १३<br><br>अहमेवंविधः सृष्टस्त्वयैव चतुरानन।<br>इन्द्रियक्षोभजनकः सर्वेषामेव देहिनाम्॥ १४<br><br>स्त्रीपुंसोरविचारेण मया सर्वत्र सर्वदा।<br>क्षोभ्यं मनः प्रयत्नेन त्वयैवोक्तं पुरा विभो॥ १५<br><br>तस्मादनपराधोऽहं त्वया शप्तस्तथा विभो।<br>कुरु प्रसादं भगवन् स्वशरीराप्तये पुनः॥ १६ | भी हैं। जिस प्रकार धूप (सूर्य) छायासे विलग होकर कहीं भी दिखायी नहीं पड़ते, उसी प्रकार गायत्री भी ब्रह्माके सामीप्यको नहीं छोड़ती हैं। यद्यपि ब्रह्मा वेदसमूहरूप हैं और सावित्री (या सरस्वती) उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिये ब्रह्माको सावित्रीपर कुदृष्टि डालनेसे कोई दोष नहीं लगा, तथापि उस समय अपने उस कुकर्मसे प्रजापति ब्रह्मा लज्जासे अभिभूत हो गये और कामदेवको शाप देते हुए यों बोले—'चूँकि तुमने अपने बाणोंद्वारा मेरे भी मनको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया है, इसलिये भगवान् रुद्र शीघ्र ही तुम्हारे शरीरको भस्म कर डालेंगे।' तदनन्तर कामदेवने बड़ी अनुनय-विनयसे ब्रह्माको प्रसन्न किया। वह बोला—'मानद! इस विषयमें आपका मुझे निष्कारण ही शाप देना उचित नहीं है। चतुरानन! आपने ही तो मुझे इस प्रकार सम्पूर्ण देहधारियोंकी इन्द्रियोंको क्षुब्ध करनेके लिये पैदा किया है। विभो! आपने ही पहले मुझे ऐसी आज्ञा दी है कि स्त्री-पुरुषका कोई विचार न करके तुम प्रयत्नपूर्वक सर्वत्र सर्वदा उनके मनको क्षुब्ध किया करो। इसलिये विभो! मैं निरपराध हूँ, तथापि आपने मुझे वैसा शाप दे डाला है; अतः भगवन्! मुझपर कृपा कीजिये, जिससे मैं पुनः अपने पूर्वशरीरको प्राप्त कर सकूँ।' ॥ ३—१६ ॥ | | ब्रह्मोवाच<br><br>वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते यादवान्वयसम्भवः।<br>रामो नाम यदा मर्त्यो मत्सत्त्वबलमाश्रितः॥ १७<br><br>अवतीर्या सुरध्वंसी द्वारकामधिवत्स्यति।<br>तद्भ्रातुस्तत्समस्य त्वं तदा पुत्रत्वमेष्यसि॥ १८<br><br>एवं शरीरमासाद्य भुक्त्वा भोगानशेषतः।<br>ततो भरतवंशान्ते भूत्वा वत्सनृपात्मजः॥ १९<br><br>विद्याधराधिपत्यं च यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>सुखानि धर्मतः प्राप्य मत्समपं गमिष्यसि॥ २०<br><br>एवं शापप्रसादाभ्यामुपेतः कुसुमायुधः।<br>शोकप्रमोदाभियुतो जगाम स यथागतम्॥ २१ | ब्रह्माने कहा—कामदेव! वैवस्वत-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर असुरोंके विनाशक श्रीराम जब मेरे बल-पराक्रमसे सम्पन्न होकर मानव-रूपमें यदुवंशमें (बलरामरूपसे) अवतीर्ण होंगे और द्वारकाको अपना निवासस्थान बनायेंगे, उस समय तुम उन्हींके समान बल-पराक्रमशाली उनके भ्राता (श्रीकृष्ण)-के पुत्ररूपमें उत्पन्न होगे। इस प्रकार शरीरको प्राप्तकर (द्वारकामें) सम्पूर्ण भोगोंका भोग करनेके उपरान्त तुम भरत-वंशमें महाराज वत्सके पुत्र होगे। तत्पश्चात् विद्याधरोंके अधिपति होकर महाप्रलयपर्यन्त धर्मपूर्वक सुखोंका उपभोग करके मेरे समीप वापस आ जाओगे। इस प्रकार शाप और कृपासे संयुक्त कामदेव शोक और आनन्दसे अभिभूत होकर जैसे आया था, वैसे ही चला गया॥ १७—२१ ॥ |
| * अध्याय ४ * | २५ |
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| मनुरुवाच<br>कोऽसौ यदुरिति प्रोक्तो यद्वंशे कामसम्भवः।<br>कथं च दग्धो रुद्रेण किमर्थं कुसुमायुधः॥ २२<br>भरतस्यान्वये कस्य का च सृष्टिः पुराभवत्।<br>एतत् सर्वं समाचक्ष्व मूलतः संशयो हि मे॥ २३ | मनुने पूछा—भगवन्! आपने जिनके वंशमें कामदेवकी उत्पत्ति बतलायी है, वे यदु कौन हैं? भगवान् रुद्रने कामदेवको किसलिये और कैसे जलाया तथा भरतवंशमें पहले किसकी और कौन-सी सृष्टि हुई थी? (इन बातोंको सुनकर) मेरे मनमें महान् संदेह उत्पन्न हो गया है; अतः आप प्रारम्भसे ही इन सबका वर्णन कीजिये॥ २२-२३ ॥ | | मत्स्य उवाच<br>या सा देहार्थसम्भूता गायत्री ब्रह्मवादिनी।<br>जननी या मनोर्देवी शतरूपा शतेन्द्रिया॥ २४<br>रतिर्मनस्तपोबुद्धिर्महान्दिक्सम्भ्रमस्तथा ।<br>ततः स शतरूपायां सप्तापत्यान्यजीजनत्॥ २५<br>ये मरीच्यादयः पुत्रा मानसस्तस्य धीमतः।<br>तेषामयमभूल्लोकः सर्वज्ञानात्मकः पुरा॥ २६<br>ततोऽसृजद् वामदेवं त्रिशूलवरधारिणम्।<br>सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम्॥ २७<br>वामदेवस्तु भगवानसृजन्मुखतो द्विजान्।<br>राजन्यानसृजद् बाह्वोर्विट् शूद्रानूरुपादयोः॥ २८<br>विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>छन्दांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं च ततः परम्॥ २९<br>ततः साध्यगणानीशस्त्रिनेत्रानसृजत् पुनः।<br>कोटींश्च चतुराशीतिर्जरामरणवर्जिताः॥ ३०<br>वामोऽसृजन्मर्त्यांस्तान् ब्रह्मणा विनिवारितः।<br>नैवंविधा भवेत् सृष्टिर्जरामरणवर्जिता॥ ३१<br>शुभाशुभात्मिका या तु सैव सृष्टिः प्रशस्यते।<br>एवं स्थितः स तेनादौ सृष्टेः स्थाणुरतोऽभवत्॥ ३२ | मत्स्यभगवान् कहने लगे—राजन्! ब्रह्माके शरीरके आधे भागसे जो ब्रह्मवादिनी गायत्री उत्पन्न हुई थी और जो मनुकी माता थी तथा जिसे शतरूपा और शतेन्द्रिया नामसे भी जाना जाता था, उसी शतरूपाके गर्भसे ब्रह्माजीने रति, मन, तप, बुद्धि, महान्, दिक् तथा सम्भ्रम—इन सात संतानोंको जन्म दिया। तथा उन बुद्धिमान् ब्रह्माके पहले जो मरीचि आदि दस मानस-पुत्र हुए थे, उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण ज्ञानात्मक संसारकी रचना हुई। तदनन्तर ब्रह्माने श्रेष्ठ त्रिशूलधारी वामदेवकी और पुनः पूर्वजोंके भी पूर्वज शक्तिशाली सनत्कुमारकी रचना की। भगवान् वामदेव (शिव)-ने अपने मुखसे ब्राह्मणोंकी, बाहुओंसे क्षत्रियोंकी, ऊरुओंसे वैश्योंकी और पैरोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति की। तदुपरान्त उन्होंने क्रमशः बिजली, वज्र, मेघ, रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष और छन्दकी रचना की। उसके बाद मेघकी सृष्टि की। तत्पश्चात् उन शक्तिशाली वामदेवने जरा-मरणरहित एवं त्रिनेत्रधारी चौरासी करोड़ साध्यगणोंको उत्पन्न किया। चूँकि वामदेवने उन्हें जरा-मरणरहित रचा था, इसलिये ब्रह्माने उन्हें सृष्टि रचनेसे मना कर दिया (और कहा कि) इस प्रकार जरा-मरणसे विवर्जित सृष्टि नहीं होती, अपितु जो सृष्टि शुभ और अशुभसे युक्त होती है, वही प्रशंसनीय है। ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वामदेव सृष्टिकार्यसे निवृत्त होकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो गये॥ २४—३२॥ | | स्वायम्भुवो मनुर्धीमांस्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।<br>पत्नीमवाप रूपाढ्यामनन्तीं नाम नामतः॥ ३३<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुस्तस्यामजीजनत्।<br>धर्मस्य कन्या चतुरा सूनृता नाम भामिनी॥ ३४<br>उत्तानपादात्तनयान् प्राप मन्थरगामिनी।<br>अपस्यतिमपस्यन्तं कीर्तिमन्तं ध्रुवं तथा॥ ३५ | (अब मैथुनी सृष्टिका वर्णन करते हैं—) परम बुद्धिमान् स्वायम्भुव मनुने कठोर तपस्या करके अनन्ती नामवाली एक सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। मनुने उसके गर्भसे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामके दो पुत्र उत्पन्न किये। पुनः धर्मकी कन्या सूनृताने, जो परम सुन्दरी, मन्थरगतिसे चलनेवाली और चतुर थी, उत्तानपादके सम्पर्कसे पुत्रोंको प्राप्त किया। उस समय प्रजापति उत्तानपादने सूनृताके गर्भसे अपस्यति, अपस्यन्त, कीर्तिमान् तथा ध्रुव (इन चार पुत्रों)*—को उत्पन्न किया। |
* यही कल्पभेद-व्यवस्था है। अन्यत्र उत्तानपादके ध्रुव और उत्तम ये दो ही पुत्र कहे गये हैं और सूनृताका नाम भी सुनीति आया है।
२६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उत्तानपादोऽजनयत् सूनृतायां प्रजापतिः।<br>ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि कृत्वा तपः पुरा॥ ३६<br><br>दिव्यमाप ततः स्थानमचलं ब्रह्मणो वरात्।<br>तमेव पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ३७<br><br>धन्या नाम मनोः कन्या ध्रुवाच्छिष्टमजीजनत्।<br>अग्निकन्या तु सुच्छाया शिष्टात्मा सुषुवे सुतान्॥ ३८<br><br>कृपं रिपुञ्जयं वृत्तं वृकं च वृकतेजसम्।<br>चक्षुषं ब्रह्मदौहित्र्यां वीरिण्यां स रिपुञ्जयः॥ ३९<br><br>वीरणस्यात्मजायां तु चक्षुर्मनुमजीजनत्।<br>मनुर्वै राजकन्यायां नड्वलायां स चाक्षुषः॥ ४०<br><br>जनयामास तनयान् दश शूरानकल्मषान्।<br>ऊरुः पूरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवागधविः॥ ४१<br><br>अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चापराजितः।<br>अभिमन्युस्तु दशमो नड्वलायामजायत॥ ४२<br><br>ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी तु सुप्रभान्।<br>अग्निं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम्॥ ४३<br><br>पितृकन्या सुनीथा तु वेनमङ्गादजीजनत्।<br>वेनमन्द्यायिनं विप्रा ममन्थुस्तत्करादभूत्।<br>पृथुर्नाम महातेजाः स पुत्रौ द्वावजीजनत्॥ ४४<br><br>अन्तर्द्धानस्तु मारीचं शिखण्डिन्यामजीजनत्। | उनमें ध्रुवने पूर्वकालमें तीन सहस्र वर्षोंतक तप करके ब्रह्माके वरदानसे दिव्य एवं अटल स्थानको प्राप्त किया। आज भी उन्हीं ध्रुवको आगे करके सप्तर्षिमण्डल स्थित है। उन्हीं ध्रुवके संयोगसे मनुकी कन्या धन्याने शिष्टको जन्म दिया। शिष्टके सम्पर्कसे अग्नि-कन्या सुच्छायाने कृप, रिपुञ्जय, वृत्त, वृक, वृकतेजस् और चक्षुषू नामक पुत्रोंको पैदा किया। उनमें रिपुञ्जयने ब्रह्माकी दौहित्री एवं वीरणकी कन्या वीरिणीके गर्भसे चाक्षुष मनुको उत्पन्न किया। चाक्षुष मनुने राजपुत्री नड्वलाके गर्भसे ऊरु, पूरु, तपस्वी शतद्युम्न, सत्यवाक्, हवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न, अपराजित और दसवाँ अभिमन्यु—इन दस निष्पाप एवं शूरवीर पुत्रोंको पैदा किया। आग्नेयीने ऊरुके संयोगसे अग्नि, सुमनस्, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरस् और गय—इन छः परम कान्तिमान् पुत्रोंको जन्म दिया। पितरोंकी कन्या सुनीथाने अङ्गके सम्पर्कसे वेनको उत्पन्न किया। (वेन अत्यन्त अन्यायी था। जब वह विप्रशापसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब) ब्राह्मणोंने उस अन्यायी वेनके हाथका मन्थन किया। उससे महातेजस्वी पृथु नामका पुत्र प्रकट हुआ। उनके (अन्तर्धान और हविर्धान नामक) दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें अन्तर्धानने शिखण्डिनीके गर्भसे मारीच नामक पुत्र पैदा किया॥ ३३—४४ १/२॥ |
| हविर्धानात् षडाग्नेयी धिषणाजनयत् सुतान्।<br>प्राचीनबर्हिषं साङ्गं यमं शुक्लं बलं शुभम्॥ ४५<br><br>प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत् प्रजापतिः।<br>हविर्धानाः प्रजास्तेन बहवः सम्प्रवर्तिताः॥ ४६<br><br>सवर्णायां तु सामुद्र्यां दशाधत्त सुतान् प्रभुः।<br>सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः॥ ४७<br><br>तत्तपोरक्षिता वृक्षा बभुलोंके समन्ततः।<br>देवादेशाच्च तानग्निरदहद् रविनन्दन॥ ४८<br><br>सोमकन्याभवत् पत्नी मारीषा नाम विश्रुता।<br>तेभ्यस्तु दक्षमेकं सा पुत्रमग्रयमजीजनत्॥ ४९ | अग्नि-कन्या धिषणाने हविर्धानके संयोगसे प्राचीन-बर्हिष्, साङ्ग, यम, शुक्र, बल और शुभ—इन छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनमें महान् ऐश्वर्यशाली प्राचीनबर्हि प्रजापति थे। उन्होंने हविर्धान नामसे विख्यात बहुत-सी प्रजाओंका विस्तार किया तथा समुद्र-कन्या सवर्णाके गर्भसे दस पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी धनुर्वेदके पारगामी विद्वान् थे तथा प्रचेता नामसे विख्यात हुए। रविनन्दन! इन्हीं प्रचेताओँके तपसे सुरक्षित रहकर वृक्षजगत्में चारों ओर शोभा पा रहे थे, परंतु इन्द्रदेवके आदेशसे अग्निने उन्हें जलाकर भस्म कर दिया। तत्पश्चात् चन्द्रमाकी कन्या, जो मारिषा नामसे विख्यात थी, उन प्रचेताओँकी पत्नी हुई। उसने उनके संयोगसे एक दक्ष नामक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया। |
५- दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्वारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव
| * अध्याय ५ * | २७ |
|---|
| दक्षादनन्तरं वृक्षानौषधानि च सर्वशः।<br>अजीजनत् सोमकन्या नदीं चन्द्रवतीं तथा॥ ५०<br>सोमांशस्य च तस्यापि दक्षस्याशीतिकोटयः।<br>तासां तु विस्तरं वक्ष्ये लोके यः सुप्रतिष्ठितः॥ ५१<br>द्विपदश्चाभवन् केचित् केचिद् बहुपदा नराः।<br>वलीमुखाः शङ्कुकर्णाः कर्णप्रावरणास्तथा॥ ५२<br>अश्वऋक्षमुखाः केचित् केचित् सिंहाननास्तथा।<br>श्वसूकरमुखाः केचित् केचिदुष्ट्रमुखास्तथा॥ ५३<br>जनयामास धर्मात्मा म्लेच्छान् सर्वाननेकंशः।<br>स सृष्ट्वा मनसा दक्षः स्त्रियः पश्चादजीजनत्॥ ५४<br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय ददौ नक्षत्रसंज्ञिताः।<br>देवासुरमनुष्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जगत्॥ ५५ | दक्षकी उत्पत्तिके पश्चात् उस सोमकन्याने समस्त वृक्षों और ओषधियोंको तथा चन्द्रवती नामकी नदीको उत्पन्न किया। चन्द्रमाके अंशसे उत्पन्न हुए उस दक्ष प्रजापतिकी अस्सी करोड़ संतानें हुईं, जो इस समय लोकमें सर्वत्र फैली हुई हैं और जिनका विस्तार मैं आगे वर्णन करूँगा। उनमेंसे किन्हींके दो पैर थे तो किन्हींके अनेकों पैर थे। किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे तो किन्हींके कान खूँटे-जैसे थे तथा किन्हींके कान (बालोंसे) आच्छादित थे। किन्हींके मुख घोड़े और रीछके सदृश थे तथा कोई सिंहके समान मुखवाले थे। कुछ लोग कुत्ते और सूअरके सदृश मुखवाले थे तो किन्हींका मुख ऊँटके समान था। इस प्रकार धर्मात्मा दक्षने अपने मनसे अनेकों प्रकारके सभी म्लेच्छोंकी सृष्टि की, तत्पश्चात् स्त्रियोंको उत्पन्न किया। उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको तथा नक्षत्र नामवाली सत्ताईस स्त्रियोंको चन्द्रमाको प्रदान किया। उन्हीं कन्याओंसे देवता, असुर और मानव आदिसे परिपूर्ण यह सारा जगत् प्रादुर्भूत हुआ है॥ ५०—५५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें चौथा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्धारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं विस्तरेणैव सूत ब्रूहि यथातथम्॥ १<br><br>सूत उवाच<br>संकल्पाद दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात् प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>यथा ससर्ज चैवादौ तथैव शृणुत द्विजाः॥ ३<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः।<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पाञ्चजन्यामजीजनत्॥ ४ | **(शौनक आदि) ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इन सबकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसका यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>**सूतजी कहते हैं—**द्विजवरो! प्रचेता-पुत्र दक्षसे पूर्व उत्पन्न हुए लोगोंकी सृष्टि संकल्प, दर्शन और स्पर्शमात्रसे हुई है, ऐसा कहा जाता है; किंतु दक्षके पश्चात् स्त्री-पुरुषके संयोगद्वारा सृष्टि प्रचलित हुई है। पूर्वकालमें जब ब्रह्मा प्रजाकी आज्ञा दी कि तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो, तब दक्षने पहले-पहल जैसी सृष्टि-रचना की, उसे (मैं) उसी प्रकार (वर्णन करता हूँ, आपलोग) श्रवण करें। जब (संकल्प, दर्शन और स्पर्शद्वारा) देव, ऋषि और नागोंकी सृष्टि करनेपर जीव-लोकका विस्तार नहीं हुआ, तब दक्षने पाञ्चजनीके गर्भसे एक हजार |
| २८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तांस्तु दृष्ट्वा महाभागः सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।<br>नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्॥ ५<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च।<br>ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वमृषिसत्तमाः॥ ६<br><br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्।<br>अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः॥ ७<br><br>हर्यश्वेषु प्रणष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः॥ ८<br><br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः।<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् पूर्ववत् स तान्॥ ९<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वा भ्रातृनथो पुनः।<br>आगत्य चाथ सृष्टिं च करिष्यथ विशेषतः॥ १०<br><br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृपथा तदा।<br>ततः प्रभृति न भ्रातुः कनीयान् मार्गमिच्छति।<br>अन्विष्यन् दुःखमाप्नोति तेन तत् परिवर्जयेत्॥ ११ | पुत्रोंको पैदा किया, जो 'हर्यश्व' नामसे विख्यात हुए। उन हर्यश्वनामक दक्ष-पुत्रोंको नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि करनेके लिये उत्सुक देखकर महाभाग नारदने निकट आये हुए उन लोगोंसे कहा—'श्रेष्ठ ऋषियो! पहले आपलोग सर्वत्र घूमकर पृथ्वीके विस्तार तथा उसके ऊपर और नीचेके भागको जान लें, तब विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' नारदजीकी बात सुनकर वे लोग विभिन्न दिशाओंकी ओर चले गये और आजतक भी वे उसी प्रकार नहीं लौटे, जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलकर पुनः वापस नहीं आतीं। इस प्रकार हर्यश्व नामक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रभावशाली प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया, जो शबल नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये द्विजवर सृष्टि-रचनाके लिये एकत्र होकर नारदजीके निकट पहुँचे, तब उन्होंने उन अनुगतोंसे भी पुनः वही पूर्ववत् बात कही—'ऋषियो! आपलोग पहले सब ओर घूमकर पृथ्वीके विस्तारको समझिये और अपने भाइयोंका पता लगाकर लौटिये, तत्पश्चात् विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' तब जिस मार्गसे भाई लोग गये थे, उसी मार्गसे वे लोग भी चले, उसी मार्गसे चले गये (और पुनः वापस नहीं आये)। तभीसे छोटा भाई बड़े भाईको ढूँढ़ने नहीं जाता। यदि जाता है तो वह दुःखभागी होता है। इसलिये ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये॥२—११॥* |
| ततस्तेषु विनष्टेषु षष्टिं कन्याः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तथा॥ १२<br><br>प्रादात् स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १३<br><br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १४<br><br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तरमादितः।<br>मरुत्वतो वसुर्यामी लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १५<br><br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् निबोधत॥ १६<br><br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्जीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १७<br><br>भानोस्तु भानवस्तद्वन्मुहूर्तायां मुहूर्त्तकाः।<br>लम्बायां घोषनामानो नागवीथी तु यामिजा॥ १८ | तदनन्तर उन पुत्रोंके भी विनष्ट हो जानेपर प्रचेतानन्दन प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दक्षने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो भृगुनन्दन शुक्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो कन्याएँ अङ्गिराको प्रदान कर दीं। अब आपलोग इन देवमाताओंके नाम तथा जिस प्रकार इनकी संतानोंका विस्तार हुआ, वह सब आदिसे ही विस्तारपूर्वक सुनिये। इनमेंसे मरुत्वती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, अरुंधती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और सुन्दरी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ बतलायी गयी हैं। अब इनके पुत्रोंके भी नाम सुनिये—विश्वाने (दस) विश्वेदेवोंको, साध्याने (बारह) साध्योंको, मरुत्वतीने (उनचास) मरुतोंको, वसुने आठ वसुओंको, भानुने (बारह) सूर्योंको, मुहूर्ताने मुहूर्त्तकको, लम्बाने घोषको, यामीने नागवीथीको |
* विष्णुपुराण १।१५।१०१, ब्रह्म० २।८०, वायु० ६५ आदिमें ऐसा ही है, पर भागवत० ६।५ में इसके विपरीत सम्मति है।
| * अध्याय ५ * | २९ |
|---|
| पृथिवीतलसम्भूतमरुन्धत्यामजायत ।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो वसुसृष्टिं निबोधत ॥ १९<br>ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतो दिशम्।<br>वसवस्ते समाख्यातास्तेषां सर्गे निबोधत ॥ २०<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २१<br>आपस्य पुत्राश्चत्वारः शान्तो वै दण्ड एव च।<br>शाम्बोऽथ मणिवक्त्रश्च यज्ञरक्षाधिकारिणः ॥ २२<br>ध्रुवस्य कालः पुत्रस्तु वर्चः सोमादजायत।<br>द्रविणो हव्यवाहश्च धरपुत्रावुभौ स्मृतौ ॥ २३<br>कल्याणियां ततः प्राणो रमणः शिशिरोऽपि च।<br>मनोहरा धरात् पुत्रानवापाथ हरेः सुता ॥ २४<br>शिवा मनोजवं पुत्रमविज्ञातगतिं तथा।<br>अवाप चानलात् पुत्रावग्निप्रायगुणौ पुनः ॥ २५<br>अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत।<br>तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ २६<br>अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्त्तिकेयस्ततः स्मृतः।<br>प्रत्यूषस्य ऋषेः पुत्रो विभुर्नाम्नाथ देवलः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्पी प्रजापतिः ॥ २७<br>प्रासादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु ।<br>तडागारामकूपेषु स्मृतः सोऽमरवर्धकिः ॥ २८ | और संकल्पाने संकल्पको जन्म दिया। अरुन्धतीके गर्भसे भूतलपर होनेवाले समस्त जीव-जन्तुओंकी उत्पत्ति हुई। अब वसुओंकी सृष्टिके विषयमें सुनिये—ये जो प्रभाशाली देवता सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हैं, वे सभी 'वसु' नामसे विख्यात हैं। अब इनके सृष्टि-विस्तारका वर्णन सुनिये। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। इनमें आप नामक वसुके शान्त, दण्ड, शाम्ब और मणिवक्त्र नामक चार पुत्र हुए, जो सब-के-सब यज्ञ-रक्षाके अधिकारी हैं। (शेष वसुओंमें) ध्रुवका पुत्र काल हुआ। सोमसे वर्चाकी उत्पत्ति हुई। धरके कल्याणिनीके गर्भसे द्रविण और हव्यवाह नामके दो पुत्र बतलाये जाते हैं तथा हरिकी कन्या मनोहराने उन्हीं धरके संयोगसे प्राण, रमण और शिशिर नामक तीन पुत्र प्राप्त किये। शिवाने अनलसे मनोजव तथा अविज्ञातगति नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया, जो प्रायः अग्निके सदृश ही गुणवाले थे। अग्निपुत्र कुमार (कार्त्तिकेय) सरकंडेके झुरमुटमें पैदा हुए थे। इनके अनुज शाख, विशाख और नैगमेय नामसे प्रसिद्ध हैं। कृत्तिकाकी संतति होनेके कारण ये कार्त्तिकेय नामसे भी विख्यात हैं। प्रत्यूष वसुके विभु तथा देवल* नामके दो पुत्र हुए, जो आगे चलकर महान् ऋषि हुए। प्रभासका पुत्र विश्वकर्मा हुआ, जो शिल्पविद्यामें निपुण और प्रजापति हुआ। वह प्रासाद (अट्टालिका) भवन, उद्यान, प्रतिमा, आभूषण, वापी, सरोवर, बगीचा और कुएँ आदिके निर्माणकार्यमें देवताओंके बढ़ईरूपसे विख्यात हुआ॥ १२—२८॥ | | अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः।<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ २९<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः।<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः ॥ ३०<br>एतेषां मानसानां तु त्रिशूलवरधारिणाम्।<br>कोटयश्चतुराशीतिस्तत्पुत्राश्चाक्षया मताः ॥ ३१<br>दिक्षु सर्वासु ये रक्षां प्रकुर्वन्ति गणेश्वराः।<br>पुत्रपौत्रसुताश्चैते सुरभीगर्भसम्भवाः ॥ ३२ | अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, सुरराजत्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये एकादश रुद्र गणेश्वर नामसे प्रख्यात हैं। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले इन ब्रह्माके मानस पुत्ररूप गणेश्वरोंके चौरासी करोड़ पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब अक्षय माने गये हैं। सुरभीके गर्भसे उद्भूत ये एकादश रुद्रोंके पुत्र-पौत्र आदि, जो गणेश्वर कहे जाते हैं, सभी दिशाओंमें (चराचर जगत्की) रक्षा करते हैं॥ २९—३२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे वसुरुद्रान्वयवायो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें वसुओं और रुद्रोंके वंशका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५ ॥
* असित और एकपर्णाके पुत्र महर्षि देवल, जो 'देवलस्मृति' के रचयिता हैं, इनसे भिन्न हैं।
६- कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन
३० * मत्स्यपुराण *
छठा अध्याय
कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— (शौनकादि ऋषियो!) अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंका वर्णन करता हूँ। अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू, विश्वा और मुनि— ये तेरह कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब इनके पुत्रोंका वर्णन सुनिये। चाक्षुष मनुके कार्यकालमें जो तुषित नामके देवगण थे, वे ही वैवस्वत मन्वन्तरमें द्वादश आदित्यके नामसे प्रख्यात हुए। इनके नाम हैं—इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, यम, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् और विष्णु। ये सभी सहस्र किरणोंसे सम्पन्न हैं और द्वादश आदित्य कहे जाते हैं। अदितिने मरीचि-नन्दन कश्यपके संयोगसे इन श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया था। महर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण नामसे विख्यात हुए। द्विजवरो! ये देवगण प्रत्येक मन्वन्तर तथा प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। हमने सुना है कि दितिने महर्षि कश्यपके सम्पर्कसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया था। हिरण्यकशिपुके उसीके समान पराक्रमी प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद और ह्लाद नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उनमेंसे प्रह्लादके चार पुत्र हुए—आयुष्मान्, शिबि, बाष्कल और चौथा विरोचन। उस विरोचनने बलिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। विप्रवरो! बलिके सौ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें बाण ज्येष्ठ था। इसके अतिरिक्त, धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्र, चन्द्रांशुतापन, निकुम्भनाभ, गुर्वक्ष, कुक्षिभीम, विभीषण तथा इसी प्रकारके और भी बहुत-से पुत्र थे, जो बाणसे छोटे, परंतु सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे। उनमें बाणके सहस्र भुजाएँ थीं और वह समस्त अस्त्रसमूहोंका ज्ञाता था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकर उसके नगरमें निवास करते थे। उसने (अपनी तपस्याके प्रभावसे) पिनाकधारी शंकरजीकी समतावाले महाकालपदको प्राप्त कर लिया था। (दितिके द्वितीय पुत्र) हिरण्याक्षके उलूक, शकुनि, भूतसंतापन और महानाभनामक पुत्र हुए। इनसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंकी संख्या सतहत्तर करोड़ थी। वे सभी महान् बलशाली, विशाल शरीरवाले, नाना प्रकारका रूप धारण करनेमें समर्थ और महान् ओजस्वी थे॥१-१५॥ |
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| कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकान्।<br>अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा तथा॥ १<br>सुरभिर्विनता तद्वत्ताम्रा क्रोधवशा इरा।<br>कद्रूर्विश्वा मुनिस्तद्वत्तासां पुत्रान् निबोधत॥ २<br>तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे चैते ह्यादित्या द्वादश स्मृताः॥ ३<br>इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणो यमः।<br>विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च॥ ४<br>एते सहस्त्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः।<br>मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान्॥ ५<br>कृशाश्वस्य ऋषेः पुत्रा देवप्रहरणाः स्मृताः।<br>एते देवगणा विप्राः प्रतिमन्वन्तरेषु च॥ ६<br>उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे कल्पे तथैव च।<br>दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्॥ ७<br>हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च।<br>हिरण्यकशिपोस्तद्वज्जातं पुत्रचतुष्टयम्॥ ८<br>प्रह्लादश्चानुह्लादश्च संह्लादो ह्राद एव च।<br>प्रह्लादपुत्र आयुष्माञ्शिबिर्बाष्कल एव च॥ ९<br>विरोचनश्चतुर्थश्च स बलिं पुत्रमाप्तवान्।<br>बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं ततो द्विजाः॥ १०<br>धृतराष्ट्रस्तथा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रांशुतापनः।<br>निकुम्भनाभो गुर्वक्षः कुक्षिभीमो विभीषणः॥ ११<br>एवमाद्यास्तु बहवो बाणज्येष्ठा गुणाधिकाः।<br>बाणः सहस्त्रबाहुश्च सर्वास्त्रगणसंयुतः॥ १२<br>तपसा तोषितो यस्य पुरे वसति शूलभृत्।<br>महाकालत्वमगमत् साम्यं यश्च पिनाकिनः॥ १३<br>हिरण्याक्षस्य पुत्रोऽभूदुलूकः शकुनिस्तथा।<br>भूतसंतापनश्चैव महानाभस्तथैव च॥ १४<br>एतेभ्यः पुत्रपौत्राणां कोटयः सप्तसप्ततिः।<br>महाबला महाकाया नानारूपा महौजसः॥ १५ |
| * अध्याय ६ * | ३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।<br>विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूद् येषां मध्ये महाबलः ॥ १६<br>द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरोधरः।<br>अयोमुखः शम्बरश्च कपिशो वामनस्तथा ॥ १७<br>मारीचिर्मेघवांश्चैव इरागर्भशिरास्तथा।<br>विद्रावणश्च केतुश्च केतुवीर्यः शतह्रदः ॥ १८<br>इन्द्रजित् सप्तजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।<br>एकचक्रो महाबाहुर्वज्राक्षस्तारकस्तथा ॥ १९<br>असिलोमा पुलोमा च बिन्दुबार्णो महासुरः।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च एवमाद्या दनोः सुताः ॥ २० | इसी प्रकार दनुने भी कश्यपके संयोगसे सौ बलशाली पुत्रोंको प्राप्त किया, जिनमें महाबली विप्रचित्ति प्रधान था। इसके अतिरिक्त द्विमूर्धा, शकुनि, शंकुशिरोधर, अयोमुख, शम्बर, कपिश, वामन, मारीचि, मेघवान्, इरागर्भशिरा, विद्रावण, केतु, केतुवीर्य, शतह्रद, इन्द्रजित्, सप्तजित्, वज्रनाभ, एकचक्र, महाबाहु, वज्राक्ष, तारक, असिलोमा, पुलोमा, बिन्दु, महासुर बाण, स्वर्भानु और वृषपर्वा—ये तथा इसी प्रकारके और भी दनुके पुत्र थे। |
| स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शची चैव पुलोमजा।<br>उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहूः ॥ २१<br>शर्मिष्ठा सुन्दरी चैव चन्द्रा च वृषपर्वणः।<br>पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते हि ते ॥ २२ | इनमें स्वर्भानुकी प्रभा, पुलोमाकी शची, मयकी उपदानवी, मन्दोदरी और कुहू, वृषपर्वाकी शर्मिष्ठा, सुन्दरी और चन्द्रा तथा वैश्वानरकी पुलोमा और कालका नामकी कन्याएँ थीं। |
| बह्वपत्ये महासत्त्वे मारीचस्य परिग्रहे।<br>तयोः षष्टिसहस्राणि दानवानामभूत् पुरा ॥ २३<br>पौलोमान् कालकेयांश्च मारीचोऽजनयत् पुरा।<br>अवध्या येऽमराणां वै हिरण्यपुरवासिनः ॥ २४<br>चतुर्मुखाल्लब्धवरास्ते हता विजयेन तु। | इनमें महान् बलशालिनी एवं बहुत-सी संतानोंवाली पुलोमा और कालका मरीचि-पुत्र कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन दोनोंसे पूर्वकालमें साठ हजार दानवोंकी उत्पत्ति हुई थी। पूर्वकालमें मरीचिनन्दन कश्यपने* (इन्हीं पुलोमा और कालकाके गर्भसे) पौलोम और कालकेय संज्ञक दानवोंको पैदा किया था, जो हिरण्यपुरमें निवास करते थे तथा ब्रह्मासे वरदान प्राप्त होनेके कारण वे देवताओंके लिये भी अवध्य थे; परंतु विजय (अर्जुन)—ने उनका संहार कर डाला। |
| विप्रचित्तिः सैंहिकेयान् सिंहिकायामजीजनत् ॥ २५<br>हिरण्यकशिपोर्ये वै भागिनेयास्त्रयोदश।<br>व्यंसः कल्पश्च राजेन्द्र नलो वातापिरेव च ॥ २६<br>इल्वलो नमुचिश्चैव श्वसृपश्राजनस्तथा।<br>नरकः कालनाभश्च सरमाणस्तथैव च ॥ २७<br>कालवीर्यश्च विख्यातो दनुवंशविवर्धनाः। | विप्रचित्तिने सिंहिकाके गर्भसे सैंहिकेय-संज्ञक पुत्रोंको जन्म दिया, जिनकी संख्या तेरह थी। ये हिरण्यकशिपुके भानजे थे। उनके नाम ये हैं—व्यंस, कल्प, राजेन्द्र, नल, वातापि, इल्वल, नमुचि, श्वसृप, अजन, नरक, कालनाभ, सरमाण तथा प्रसिद्ध कालवीर्य। ये सभी दनु-वंशको बढ़ानेवाले थे। |
| संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः स्मृताः ॥ २८<br>अवध्याः सर्वदेवानां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>ये हता भर्गमाश्रित्य त्वर्जुनेन रणाजिरे ॥ २९ | दैत्य संह्रादके पुत्र निवातकवचके नामसे विख्यात हुए। वे सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, नागों और राक्षसोंद्वारा अवध्य थे; किंतु अर्जुनने शिवजीका आश्रय ग्रहण करके रणभूमिमें उन्हें यमलोकका पथिक बना दिया। |
| षट् कन्या जनयामास ताम्रा मारीचबीजतः।<br>शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवी गृधिका शुचिः ॥ ३० | ताम्राने कश्यपसे शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका और शुचि नामक छः कन्याओंको जन्म दिया। |
* वाल्मी० रामा० १।१।२० आदि, भागवत० १।६।३१, ३।१२।३२, ४।१।१३, ९।१।१०, विष्णुपुराण १।१५।१३१, २१।८, मत्स्य० ३।६, ४।२६, ११५।९, वायु० ५०।१६८, ५२।२५, १०१।३५, ४९, ब्रह्माण्ड० २।३२।९६, २।२१।४३-४४ आदिके अनुसार मरीचि ऋषिके एकमात्र पुत्र कश्यप ही हैं। किसी-किसी पुराणमें उनका एक दूसरा पुत्र 'पौर्णमास' भी निर्दिष्ट है।
३२ * मत्स्यपुराण *
| शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।<br>श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुररानप्यजीजनत्॥ ३१<br>गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।<br>हंससारसक्रौञ्चांश्च प्लवाञ्छुचिरजीजनत्॥ ३२<br>अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्।<br>एष ताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायां निबोधत॥ ३३ | इनमें शुकीने धर्मके संयोगसे शुक और उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीसे श्येन (बाज) तथा भासीसे कुरर(चकवा)-की उत्पत्ति हुई। गृध्रीने गीधों, पँडुत्रियों और कबूतरोंको पैदा किया। शुचिके गर्भसे हंस, सारस, क्रौंच और प्लव (कारण्डव या विशेष जलपक्षी) प्रादुर्भूत हुए। सुग्रीवीने बकरा, घोड़ा, भेंडा, ऊँट और गधोंको जन्म दिया। इस प्रकार यह ताम्राके वंशका वर्णन किया, अब विनताकी वंश-परम्पराके विषयमें सुनिये॥ १६—३३॥ |
| गरुडः पततां नाथो अरुणश्च पतत्रिणाम्।<br>सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता॥ ३४<br>सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतावुभौ।<br>सम्पातिपुत्रो बभ्रुश्च शीघ्रगश्चापि विश्रुतः॥ ३५<br>जटायुषः कर्णिकारः शतगामी च विश्रुतौ।<br>सारसो रज्जुबालश्च भेरुण्डश्चापि तत्सुताः॥ ३६<br>तेषामनन्तमभवत् पक्षिणां पुत्रपौत्रकम्।<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत् पुरा॥ ३७<br>सहस्रशिरसां कद्रूः सहस्रं चापि सुव्रत।<br>प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिररिंदम॥ ३८<br>शेषवासुकिकर्कोटशङ्खैरावतकम्बलाः।<br>धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः॥ ३९<br>एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः।<br>शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः॥ ४०<br>शङ्कुरोमा च बहुलो वामनः पाणिनस्तथा।<br>कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृताः॥ ४१<br>एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पुत्रपौत्रकम्।<br>प्रायशो यत् पुरा दग्धं जनमेजयमन्दिरे॥ ४२<br>रक्षोगणं क्रोधवशा स्वनामानमजीजनत्।<br>दंष्ट्रिणां नियुतं तेषां भीमसेनादगात् क्षयम्॥ ४३<br>रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यो वराङ्गनाः।<br>सुरभिर्जनयामास कश्यपात् संयतव्रता॥ ४४<br>मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा।<br>तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्॥ ४५<br>तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्वमजीजनत्।<br>विश्वा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः॥ ४६<br>तत एकोनपञ्चाशन्मरुतः कश्यपाद् दितिः।<br>जनयामास धर्मज्ञान् सर्वानमरवल्लभान्॥ ४७ | (विनताके दो पुत्र) गरुड़ और अरुण आकाशचारी छोटे-बड़े समस्त पक्षियोंके स्वामी हैं। (उसकी तीसरी संतान) सौदामिनी नामकी कन्या है, जो गगन-मण्डलमें विख्यात है। अरुणके सम्पाति और जटायु नामके दो पुत्र हुए। उनमें सम्पातिके पुत्र बभ्रु और शीघ्रग नामसे विख्यात हुए। जटायुके दो पुत्र कर्णिकार और शतगामी नामसे प्रसिद्ध हुए। इनके अतिरिक्त जटायुके सारस, रज्जुबाल और भेरुण्डनामक पुत्र भी थे। इन पक्षियोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। सुव्रत! सुरसा तथा कद्रूके गर्भसे सहस्र फणोंवाले एक-एक हजार सर्पोंकी उत्पत्ति हुई। परन्तप! उनमें छब्बीस प्रधान हैं। उनके नाम ये हैं—शेष, वासुकि, कर्कोटक, शङ्ख, ऐरावत, कम्बल, धनञ्जय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंकुरोमा, बहुल, वामन, पाणिन, कपिल, दुर्मुख और पतञ्जलि। इन सभी सर्पोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अगणित थी, परंतु प्राचीनकालमें जनमेजयके सर्पयज्ञमें (इनमेंसे) प्रायः अधिकांश जला दिये गये। क्रोधवशाने अपने ही नामवाले (क्रोधवश नामक) दंष्ट्रधारी एक लाख राक्षसोंको जन्म दिया, जो भीमसेनद्वारा नष्ट कर दिये गये। संयत व्रतवाली सुरभिने महर्षि कश्यपके संयोगसे रुद्रगणों तथा सुन्दर अङ्गोंवाली गायों और भैंसोंको उत्पन्न किया। मुनिने मुनि-समुदाय तथा अप्सरा-समूहको पैदा किया, उसी प्रकार अरिष्टाने बहुत-से किन्नर और गन्धर्वोंको जन्म दिया। इरासे समस्त तृण, वृक्ष, लता और झाड़ी आदिकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार विश्वाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया तथा दितिने कश्यपके सम्पर्कसे उनचास मरुतोंको उत्पन्न किया, जो सभी धर्मज्ञ और देवप्रिय थे॥ ३४—४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे कश्यपान्वयो नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६॥
उत्पत्ति
गीताप्रेस, गोरखपुर
J.N.Prasad 1984
भगवान् मत्स्यरुपमें
भगवान् नृसिंह
भगवान् वराह