भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24
२२* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
सरस्वत्यथ गायत्री ब्रह्माणी च परंतप।<br>ततः स्वदेहसम्भूतामात्मजामित्यकल्पयत्॥ ३२<br>दृष्ट्वा तां व्यथितस्तावत् कामबाणार्दितो विभुः।<br>अहो रूपमहो रूपमिति चाह प्रजापतिः॥ ३३<br>ततो वसिष्ठप्रमुखा भगिनीमिति चुक्रुशुः।<br>ब्रह्मा न किंचिद् ददृशे तन्मुखालोकनादृते॥ ३४<br>अहो रूपमहो रूपमिति प्राह पुनः पुनः।<br>ततः प्रणामनम्रां तां पुनरेवाभ्यलोकयत्॥ ३५<br>अथ प्रदक्षिणं चक्रे सा पितुर्वरवर्णिनी।<br>पुत्रेभ्यो लज्जितस्यास्य तद्रूपालोकनेच्छया॥ ३६<br>आविर्भूतं ततो वक्त्रं दक्षिणं पाण्डुगण्डवत्।<br>विस्मयस्फुरदोष्ठं च पाश्चात्यमुदगात्ततः॥ ३७<br>चतुर्थमभवत् पश्चाद् वामं कामशरातुरम्।<br>ततोऽन्यदभवत्तस्य कामातुरतया तथा॥ ३८<br>उत्पतन्त्यास्तदाकारा अवलोकनकुतूहलात्।<br>सृष्ट्यर्थं यत् कृतं तेन तपः परमदारुणम्॥ ३९<br>तत् सर्वं नाशमगमत् स्वसुतोपगमेच्छया।<br>तेनोर्ध्वं वक्त्रमभवत् पञ्चमं तस्य धीमतः।<br>आविर्भवज्जटाभिश्च तद् वक्त्रं चावृणोत् प्रभुः॥ ४०परंतप! वह स्त्री सरस्वती, 'शतरूपा' नामसे विख्यात हुई। वही सावित्री, गायत्री और ब्रह्माणी भी कही जाती है। इस प्रकार ब्रह्माने अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाली सावित्रीको अपनी पुत्रीके रूपमें स्वीकार किया; परंतु तत्काल ही उस सावित्रीको देखकर वे सर्वश्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा मुग्ध हो उठे और यों कहने लगे—'कैसा मनोहर रूप है! कैसा सौन्दर्यशाली रूप है।' ब्रह्माको सावित्रीके मुखकी ओर अवलोकन करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं दीखता था। वे बारंबार यही कह रहे थे—'कैसा अद्भुत रूप है! कैसी अनोखी सुन्दरता है!' तत्पश्चात् जब सावित्री झुककर उन्हें प्रणाम करने लगी, तब ब्रह्मा पुनः उसे देखने लगे। तदनन्तर सुन्दरी सावित्रीने अपने पिता ब्रह्माकी प्रदक्षिणा की। इसी समय सावित्रीके रूपका अवलोकन करनेकी इच्छा होनेके कारण ब्रह्माके मुखके दाहिने पार्श्वमें पीले गण्डस्थलोंवाला (एक दूसरा) नूतन मुख प्रकट हो गया! पुनः विस्मययुक्त एवं फड़कते हुए होंठोंवाला दूसरा (तीसरा) मुख पीछेकी ओर उद्भूत हुआ तथा उनकी बायीं ओर कामदेवके बाणोंसे व्यथित-से देखनेवाले एक अन्य (चौथे) मुखका आविर्भाव हुआ। सावित्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेके कारण ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचनाके लिये जो अत्यन्त उग्र तप किया गया था, उसका सारा फल नष्ट हो गया तथा उसी पापके परिणामस्वरूप बुद्धिमान् ब्रह्माके मुखके ऊपर एक पाँचवाँ मुख आविर्भूत हुआ, जो जटाओंसे व्याप्त था। ऐश्वर्यशाली ब्रह्माने उस मुखको भी वरण (स्वीकार) कर लिया॥ ३०—४०॥
ततस्तानब्रवीद् ब्रह्मा पुत्रानात्मसमुद्भवान्।<br>प्रजाः सृजध्वमभितः सदेवासुरमानुषीः॥ ४१<br>एवमुक्तास्ततः सर्वे ससृजुर्विविधाः प्रजाः।<br>गतेषु तेषु सृष्ट्यर्थं प्रणामावनतामिमाम्॥ ४२<br>उपयेमे स विश्वात्मा शतरूपामनिन्दिताम्।<br>सम्बभूव तया सार्धमतिकामातुरो विभुः।<br>सलज्जां चकमे देवः कमलोदरमन्दिरे॥ ४३<br>यावदब्दशतं दिव्यं यथान्यः प्राकृतो जनः।<br>ततः कालेन महता तस्याः पुत्रोऽभवन्मनुः॥ ४४<br>स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम्।<br>तद्रूपगुणसामान्यादधिपूरुष उच्यते॥ ४५तदनन्तर ब्रह्माने अपने उन मरीचि आदि मानस पुत्रोंको आज्ञा दी कि तुमलोग भूतलपर चारों ओर देवता, असुर और मानवरूप प्रजाओंकी सृष्टि करो। पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन पुत्रोंने अनेकों प्रकारकी प्रजाओंकी रचना की। सृष्टि-कार्यके लिये अपने उन पुत्रोंके चले जानेपर विश्वात्मा ब्रह्माने प्रणाम करनेके लिये चरणोंमें पड़ी हुई उस अनिन्दिता शतरूपा* का पाणिग्रहण किया। तदनन्तर अधिक समय व्यतीत होनेके उपरान्त शतरूपाके गर्भसे मनु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जो स्वायम्भुव नामसे विख्यात हुआ। उसे विराट् भी कहा जाता है तथा अपने पिता ब्रह्माके रूप और गुणकी समानताके कारण उसे

* इसमें तथा अगले अध्यायमें शतरूपाका वर्णन है। शतरूपाका यहाँ अर्थ शतेन्द्रिया माया (मत्स्यपुराण ४। २४) या मूल प्रकृति है। क्योंकि इसे तथा हरिवंश १। २। १ को छोड़ अन्यत्र सर्वत्र शतरूपा स्वायम्भुव मनुकी पत्नी कही गयी है। यहाँ ४। ३३ में उनकी पत्नी 'अनन्ती' कही गयी है।