मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ४ * | २३ |
|---|
| वैराजा यत्र ते जाता बहवः शंसितव्रताः।<br>स्वायम्भुवा महाभागाः सप्त सप्त तथापरे॥ ४६<br><br>स्वारोचिषाद्याः सर्वे ते ब्रह्मतुल्यस्वरूपिणः।<br>औत्तमिप्रमुखास्तद्वद् येषां त्वं सप्तमोऽधुना॥ ४७ | लोग अधिपुरुष भी कहते हैं—ऐसा हमने सुना है। उस ब्रह्म-वंशमें सात-सातके विभागसे जो बहुत-से महाभाग्यशाली एवं नियमोंका पालन करनेवाले स्वारोचिष आदि तथा उसी प्रकार औत्तमि आदि स्वायम्भुव मनु हुए हैं, वे सभी ब्रह्माके समान ही स्वरूपवाले थे। उन्हींमें इस समय तुम सातवें मनु हो॥ ४१–४७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मुखोत्पत्तिर्नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गेमें मुखोत्पत्तिनामक तीसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेसे ब्रह्मा दोषी क्यों नहीं हुए—एतद्विषयक मनुका प्रश्न, मत्स्यभगवान्का उत्तर तथा इसी प्रसङ्गमें आदिसृष्टिका वर्णन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा |
|---|---|
| अहो कष्टतरं चैतदङ्गजागमनं विभो।<br>कथं न दोषमगमत् कर्मणानेन पद्मभूः॥ १<br>परस्परं च सम्बन्धः सगोत्राणामभूत् कथम्।<br>वैवाहिकस्तत्सुतानां छिन्धि मे संशयं विभो॥ २ | —सर्वव्यापी भगवन्! अहो! पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन तो अत्यन्त कष्टका विषय है, परंतु ऐसा कर्म करनेपर भी कमलयोनि ब्रह्मा दोषभागी क्यों नहीं हुए? तथा उनके सगोत्र पुत्रोंका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कैसे हुआ? विभो! मेरे इस संशयको दूर कीजिये॥ १-२॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे |
| दिव्येयमादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा।<br>अतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदतीन्द्रियशरीरिका॥ ३<br>दिव्यतेजोमयी भूप दिव्यज्ञानसमुद्भवा।<br>न मर्त्यैरभितः शक्या वक्तुं वै मांसचक्षुभिः॥ ४<br>यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम्।<br>विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः॥ ५<br>कार्याकार्ये न देवानां शुभाशुभफलप्रदे।<br>यस्मात्तस्मान्न राजेन्द्र तद्विचारो नृणां शुभः॥ ६<br>अन्यच्च सर्ववेदानामधिष्ठाता चतुर्मुखः।<br>गायत्री ब्रह्मणस्तद्वदङ्गभूता निगद्यते॥ ७<br>अमूर्त्तं मूर्तिमद् वापि मिथुनं तत् प्रचक्षते।<br>विरिञ्चिर्यत्र भगवांस्तत्र देवी सरस्वती।<br>भारती यत्र यत्रैव तत्र तत्र प्रजापतिः॥ ८ | —राजन्! रजोगुणसे उत्पन्न हुई यह शतरूपारूपी* आदिसृष्टि दिव्य है। जिस प्रकार इस (मूल प्रकृति)की इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे अतीत हैं, उसी प्रकार इस (शतरूपा, सहस्ररूपा नारी)-का शरीर भी इन्द्रियातीत है। यह दिव्य तेजसे सम्पन्न एवं दिव्य ज्ञानसे समुद्भूत है, अतः मांस-पिण्डरूप नेत्रधारी मानवोंद्वारा इसका भलीभाँति वर्णन नहीं किया जा सकता। जैसे सर्पोंके मार्गको सर्प तथा सम्पूर्ण पक्षियोंके मार्गको आकाशचारी पक्षी ही जान सकते हैं, वैसे ही (शतरूपा आदि) दिव्य जीवोंके (अचिन्त्य) मार्गको दिव्य जीव ही समझ सकते हैं, मानव कदापि नहीं जान सकते। राजेन्द्र! चूँकि देवताओंके कार्य (करनेयोग्य अर्थात् उचित) तथा अकार्य (न करनेयोग्य अर्थात् अनुचित) शुभ एवं अशुभ फल देनेवाले नहीं होते, इसलिये उनके विषयमें विचार करना मानवोंके लिये श्रेयस्कर नहीं है।* दूसरा कारण यह है कि जिस प्रकार ब्रह्मा सारे वेदोंके अधिष्ठाता हैं, उसी प्रकार (शतरूपारूपी) गायत्री ब्रह्माके अङ्गसे उत्पन्न हुई बतलायी जाती हैं। इसलिये यह मिथुनरूप (जोड़ा) अमूर्त (अव्यक्त) या मूर्तिमान् (व्यक्त) दोनों ही रूपोंमें कहा जाता है। यहाँतक कि जहाँ-जहाँ भगवान् ब्रह्मा हैं, वहाँ-वहाँ (गायत्रीरूपी) सरस्वती देवी भी हैं और जहाँ-जहाँ सरस्वती देवी हैं, वहीं-वहीं ब्रह्मा |
* इसलिये 'न देवचरितं चरेत्', 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्' की चेतावनी—उपदेश प्रसिद्ध है।