मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २४ | * मत्स्यपुराण * |
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| यथाऽऽतपो न रहितश्छायया दृश्यते क्वचित्।<br>गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वं तथैव न विमुञ्चति॥ ९<br><br>वेदराशिः स्मृतो ब्रह्मा सावित्री तदधिष्ठिता।<br>तस्मान्न कश्चिद्दोषः स्यात् सावित्रीगमने विभोः॥ १०<br><br>तथापि लज्जावनतः प्रजापतिरभूत् पुरा।<br>स्वसुतोपगमाद् ब्रह्मा शशाप कुसुमायुधम्॥ ११<br><br>यस्मान्ममापि भवता मनः संक्षोभितं शरैः।<br>तस्मात्त्वद्देहमचिराद् रुद्रो भस्मीकरिष्यति॥ १२<br><br>ततः प्रसादयामास कामदेवश्चतुर्मुखम्।<br>न मामकारणे शप्तुं त्वमिहार्हसि मानद॥ १३<br><br>अहमेवंविधः सृष्टस्त्वयैव चतुरानन।<br>इन्द्रियक्षोभजनकः सर्वेषामेव देहिनाम्॥ १४<br><br>स्त्रीपुंसोरविचारेण मया सर्वत्र सर्वदा।<br>क्षोभ्यं मनः प्रयत्नेन त्वयैवोक्तं पुरा विभो॥ १५<br><br>तस्मादनपराधोऽहं त्वया शप्तस्तथा विभो।<br>कुरु प्रसादं भगवन् स्वशरीराप्तये पुनः॥ १६ | भी हैं। जिस प्रकार धूप (सूर्य) छायासे विलग होकर कहीं भी दिखायी नहीं पड़ते, उसी प्रकार गायत्री भी ब्रह्माके सामीप्यको नहीं छोड़ती हैं। यद्यपि ब्रह्मा वेदसमूहरूप हैं और सावित्री (या सरस्वती) उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिये ब्रह्माको सावित्रीपर कुदृष्टि डालनेसे कोई दोष नहीं लगा, तथापि उस समय अपने उस कुकर्मसे प्रजापति ब्रह्मा लज्जासे अभिभूत हो गये और कामदेवको शाप देते हुए यों बोले—'चूँकि तुमने अपने बाणोंद्वारा मेरे भी मनको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया है, इसलिये भगवान् रुद्र शीघ्र ही तुम्हारे शरीरको भस्म कर डालेंगे।' तदनन्तर कामदेवने बड़ी अनुनय-विनयसे ब्रह्माको प्रसन्न किया। वह बोला—'मानद! इस विषयमें आपका मुझे निष्कारण ही शाप देना उचित नहीं है। चतुरानन! आपने ही तो मुझे इस प्रकार सम्पूर्ण देहधारियोंकी इन्द्रियोंको क्षुब्ध करनेके लिये पैदा किया है। विभो! आपने ही पहले मुझे ऐसी आज्ञा दी है कि स्त्री-पुरुषका कोई विचार न करके तुम प्रयत्नपूर्वक सर्वत्र सर्वदा उनके मनको क्षुब्ध किया करो। इसलिये विभो! मैं निरपराध हूँ, तथापि आपने मुझे वैसा शाप दे डाला है; अतः भगवन्! मुझपर कृपा कीजिये, जिससे मैं पुनः अपने पूर्वशरीरको प्राप्त कर सकूँ।' ॥ ३—१६ ॥ | | ब्रह्मोवाच<br><br>वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते यादवान्वयसम्भवः।<br>रामो नाम यदा मर्त्यो मत्सत्त्वबलमाश्रितः॥ १७<br><br>अवतीर्या सुरध्वंसी द्वारकामधिवत्स्यति।<br>तद्भ्रातुस्तत्समस्य त्वं तदा पुत्रत्वमेष्यसि॥ १८<br><br>एवं शरीरमासाद्य भुक्त्वा भोगानशेषतः।<br>ततो भरतवंशान्ते भूत्वा वत्सनृपात्मजः॥ १९<br><br>विद्याधराधिपत्यं च यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>सुखानि धर्मतः प्राप्य मत्समपं गमिष्यसि॥ २०<br><br>एवं शापप्रसादाभ्यामुपेतः कुसुमायुधः।<br>शोकप्रमोदाभियुतो जगाम स यथागतम्॥ २१ | ब्रह्माने कहा—कामदेव! वैवस्वत-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर असुरोंके विनाशक श्रीराम जब मेरे बल-पराक्रमसे सम्पन्न होकर मानव-रूपमें यदुवंशमें (बलरामरूपसे) अवतीर्ण होंगे और द्वारकाको अपना निवासस्थान बनायेंगे, उस समय तुम उन्हींके समान बल-पराक्रमशाली उनके भ्राता (श्रीकृष्ण)-के पुत्ररूपमें उत्पन्न होगे। इस प्रकार शरीरको प्राप्तकर (द्वारकामें) सम्पूर्ण भोगोंका भोग करनेके उपरान्त तुम भरत-वंशमें महाराज वत्सके पुत्र होगे। तत्पश्चात् विद्याधरोंके अधिपति होकर महाप्रलयपर्यन्त धर्मपूर्वक सुखोंका उपभोग करके मेरे समीप वापस आ जाओगे। इस प्रकार शाप और कृपासे संयुक्त कामदेव शोक और आनन्दसे अभिभूत होकर जैसे आया था, वैसे ही चला गया॥ १७—२१ ॥ |