मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ४ * | २५ |
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| मनुरुवाच<br>कोऽसौ यदुरिति प्रोक्तो यद्वंशे कामसम्भवः।<br>कथं च दग्धो रुद्रेण किमर्थं कुसुमायुधः॥ २२<br>भरतस्यान्वये कस्य का च सृष्टिः पुराभवत्।<br>एतत् सर्वं समाचक्ष्व मूलतः संशयो हि मे॥ २३ | मनुने पूछा—भगवन्! आपने जिनके वंशमें कामदेवकी उत्पत्ति बतलायी है, वे यदु कौन हैं? भगवान् रुद्रने कामदेवको किसलिये और कैसे जलाया तथा भरतवंशमें पहले किसकी और कौन-सी सृष्टि हुई थी? (इन बातोंको सुनकर) मेरे मनमें महान् संदेह उत्पन्न हो गया है; अतः आप प्रारम्भसे ही इन सबका वर्णन कीजिये॥ २२-२३ ॥ | | मत्स्य उवाच<br>या सा देहार्थसम्भूता गायत्री ब्रह्मवादिनी।<br>जननी या मनोर्देवी शतरूपा शतेन्द्रिया॥ २४<br>रतिर्मनस्तपोबुद्धिर्महान्दिक्सम्भ्रमस्तथा ।<br>ततः स शतरूपायां सप्तापत्यान्यजीजनत्॥ २५<br>ये मरीच्यादयः पुत्रा मानसस्तस्य धीमतः।<br>तेषामयमभूल्लोकः सर्वज्ञानात्मकः पुरा॥ २६<br>ततोऽसृजद् वामदेवं त्रिशूलवरधारिणम्।<br>सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम्॥ २७<br>वामदेवस्तु भगवानसृजन्मुखतो द्विजान्।<br>राजन्यानसृजद् बाह्वोर्विट् शूद्रानूरुपादयोः॥ २८<br>विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>छन्दांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं च ततः परम्॥ २९<br>ततः साध्यगणानीशस्त्रिनेत्रानसृजत् पुनः।<br>कोटींश्च चतुराशीतिर्जरामरणवर्जिताः॥ ३०<br>वामोऽसृजन्मर्त्यांस्तान् ब्रह्मणा विनिवारितः।<br>नैवंविधा भवेत् सृष्टिर्जरामरणवर्जिता॥ ३१<br>शुभाशुभात्मिका या तु सैव सृष्टिः प्रशस्यते।<br>एवं स्थितः स तेनादौ सृष्टेः स्थाणुरतोऽभवत्॥ ३२ | मत्स्यभगवान् कहने लगे—राजन्! ब्रह्माके शरीरके आधे भागसे जो ब्रह्मवादिनी गायत्री उत्पन्न हुई थी और जो मनुकी माता थी तथा जिसे शतरूपा और शतेन्द्रिया नामसे भी जाना जाता था, उसी शतरूपाके गर्भसे ब्रह्माजीने रति, मन, तप, बुद्धि, महान्, दिक् तथा सम्भ्रम—इन सात संतानोंको जन्म दिया। तथा उन बुद्धिमान् ब्रह्माके पहले जो मरीचि आदि दस मानस-पुत्र हुए थे, उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण ज्ञानात्मक संसारकी रचना हुई। तदनन्तर ब्रह्माने श्रेष्ठ त्रिशूलधारी वामदेवकी और पुनः पूर्वजोंके भी पूर्वज शक्तिशाली सनत्कुमारकी रचना की। भगवान् वामदेव (शिव)-ने अपने मुखसे ब्राह्मणोंकी, बाहुओंसे क्षत्रियोंकी, ऊरुओंसे वैश्योंकी और पैरोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति की। तदुपरान्त उन्होंने क्रमशः बिजली, वज्र, मेघ, रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष और छन्दकी रचना की। उसके बाद मेघकी सृष्टि की। तत्पश्चात् उन शक्तिशाली वामदेवने जरा-मरणरहित एवं त्रिनेत्रधारी चौरासी करोड़ साध्यगणोंको उत्पन्न किया। चूँकि वामदेवने उन्हें जरा-मरणरहित रचा था, इसलिये ब्रह्माने उन्हें सृष्टि रचनेसे मना कर दिया (और कहा कि) इस प्रकार जरा-मरणसे विवर्जित सृष्टि नहीं होती, अपितु जो सृष्टि शुभ और अशुभसे युक्त होती है, वही प्रशंसनीय है। ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वामदेव सृष्टिकार्यसे निवृत्त होकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो गये॥ २४—३२॥ | | स्वायम्भुवो मनुर्धीमांस्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।<br>पत्नीमवाप रूपाढ्यामनन्तीं नाम नामतः॥ ३३<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुस्तस्यामजीजनत्।<br>धर्मस्य कन्या चतुरा सूनृता नाम भामिनी॥ ३४<br>उत्तानपादात्तनयान् प्राप मन्थरगामिनी।<br>अपस्यतिमपस्यन्तं कीर्तिमन्तं ध्रुवं तथा॥ ३५ | (अब मैथुनी सृष्टिका वर्णन करते हैं—) परम बुद्धिमान् स्वायम्भुव मनुने कठोर तपस्या करके अनन्ती नामवाली एक सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। मनुने उसके गर्भसे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामके दो पुत्र उत्पन्न किये। पुनः धर्मकी कन्या सूनृताने, जो परम सुन्दरी, मन्थरगतिसे चलनेवाली और चतुर थी, उत्तानपादके सम्पर्कसे पुत्रोंको प्राप्त किया। उस समय प्रजापति उत्तानपादने सूनृताके गर्भसे अपस्यति, अपस्यन्त, कीर्तिमान् तथा ध्रुव (इन चार पुत्रों)*—को उत्पन्न किया। |
* यही कल्पभेद-व्यवस्था है। अन्यत्र उत्तानपादके ध्रुव और उत्तम ये दो ही पुत्र कहे गये हैं और सूनृताका नाम भी सुनीति आया है।