मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 28, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 28
२६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उत्तानपादोऽजनयत् सूनृतायां प्रजापतिः।<br>ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि कृत्वा तपः पुरा॥ ३६<br><br>दिव्यमाप ततः स्थानमचलं ब्रह्मणो वरात्।<br>तमेव पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ३७<br><br>धन्या नाम मनोः कन्या ध्रुवाच्छिष्टमजीजनत्।<br>अग्निकन्या तु सुच्छाया शिष्टात्मा सुषुवे सुतान्॥ ३८<br><br>कृपं रिपुञ्जयं वृत्तं वृकं च वृकतेजसम्।<br>चक्षुषं ब्रह्मदौहित्र्यां वीरिण्यां स रिपुञ्जयः॥ ३९<br><br>वीरणस्यात्मजायां तु चक्षुर्मनुमजीजनत्।<br>मनुर्वै राजकन्यायां नड्वलायां स चाक्षुषः॥ ४०<br><br>जनयामास तनयान् दश शूरानकल्मषान्।<br>ऊरुः पूरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवागधविः॥ ४१<br><br>अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चापराजितः।<br>अभिमन्युस्तु दशमो नड्वलायामजायत॥ ४२<br><br>ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी तु सुप्रभान्।<br>अग्निं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम्॥ ४३<br><br>पितृकन्या सुनीथा तु वेनमङ्गादजीजनत्।<br>वेनमन्द्यायिनं विप्रा ममन्थुस्तत्करादभूत्।<br>पृथुर्नाम महातेजाः स पुत्रौ द्वावजीजनत्॥ ४४<br><br>अन्तर्द्धानस्तु मारीचं शिखण्डिन्यामजीजनत्। | उनमें ध्रुवने पूर्वकालमें तीन सहस्र वर्षोंतक तप करके ब्रह्माके वरदानसे दिव्य एवं अटल स्थानको प्राप्त किया। आज भी उन्हीं ध्रुवको आगे करके सप्तर्षिमण्डल स्थित है। उन्हीं ध्रुवके संयोगसे मनुकी कन्या धन्याने शिष्टको जन्म दिया। शिष्टके सम्पर्कसे अग्नि-कन्या सुच्छायाने कृप, रिपुञ्जय, वृत्त, वृक, वृकतेजस् और चक्षुषू नामक पुत्रोंको पैदा किया। उनमें रिपुञ्जयने ब्रह्माकी दौहित्री एवं वीरणकी कन्या वीरिणीके गर्भसे चाक्षुष मनुको उत्पन्न किया। चाक्षुष मनुने राजपुत्री नड्वलाके गर्भसे ऊरु, पूरु, तपस्वी शतद्युम्न, सत्यवाक्, हवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न, अपराजित और दसवाँ अभिमन्यु—इन दस निष्पाप एवं शूरवीर पुत्रोंको पैदा किया। आग्नेयीने ऊरुके संयोगसे अग्नि, सुमनस्, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरस् और गय—इन छः परम कान्तिमान् पुत्रोंको जन्म दिया। पितरोंकी कन्या सुनीथाने अङ्गके सम्पर्कसे वेनको उत्पन्न किया। (वेन अत्यन्त अन्यायी था। जब वह विप्रशापसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब) ब्राह्मणोंने उस अन्यायी वेनके हाथका मन्थन किया। उससे महातेजस्वी पृथु नामका पुत्र प्रकट हुआ। उनके (अन्तर्धान और हविर्धान नामक) दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें अन्तर्धानने शिखण्डिनीके गर्भसे मारीच नामक पुत्र पैदा किया॥ ३३—४४ १/२॥ |
| हविर्धानात् षडाग्नेयी धिषणाजनयत् सुतान्।<br>प्राचीनबर्हिषं साङ्गं यमं शुक्लं बलं शुभम्॥ ४५<br><br>प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत् प्रजापतिः।<br>हविर्धानाः प्रजास्तेन बहवः सम्प्रवर्तिताः॥ ४६<br><br>सवर्णायां तु सामुद्र्यां दशाधत्त सुतान् प्रभुः।<br>सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः॥ ४७<br><br>तत्तपोरक्षिता वृक्षा बभुलोंके समन्ततः।<br>देवादेशाच्च तानग्निरदहद् रविनन्दन॥ ४८<br><br>सोमकन्याभवत् पत्नी मारीषा नाम विश्रुता।<br>तेभ्यस्तु दक्षमेकं सा पुत्रमग्रयमजीजनत्॥ ४९ | अग्नि-कन्या धिषणाने हविर्धानके संयोगसे प्राचीन-बर्हिष्, साङ्ग, यम, शुक्र, बल और शुभ—इन छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनमें महान् ऐश्वर्यशाली प्राचीनबर्हि प्रजापति थे। उन्होंने हविर्धान नामसे विख्यात बहुत-सी प्रजाओंका विस्तार किया तथा समुद्र-कन्या सवर्णाके गर्भसे दस पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी धनुर्वेदके पारगामी विद्वान् थे तथा प्रचेता नामसे विख्यात हुए। रविनन्दन! इन्हीं प्रचेताओँके तपसे सुरक्षित रहकर वृक्षजगत्में चारों ओर शोभा पा रहे थे, परंतु इन्द्रदेवके आदेशसे अग्निने उन्हें जलाकर भस्म कर दिया। तत्पश्चात् चन्द्रमाकी कन्या, जो मारिषा नामसे विख्यात थी, उन प्रचेताओँकी पत्नी हुई। उसने उनके संयोगसे एक दक्ष नामक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया। |