भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ५ *२९

| पृथिवीतलसम्भूतमरुन्धत्यामजायत ।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो वसुसृष्टिं निबोधत ॥ १९<br>ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतो दिशम्।<br>वसवस्ते समाख्यातास्तेषां सर्गे निबोधत ॥ २०<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २१<br>आपस्य पुत्राश्चत्वारः शान्तो वै दण्ड एव च।<br>शाम्बोऽथ मणिवक्त्रश्च यज्ञरक्षाधिकारिणः ॥ २२<br>ध्रुवस्य कालः पुत्रस्तु वर्चः सोमादजायत।<br>द्रविणो हव्यवाहश्च धरपुत्रावुभौ स्मृतौ ॥ २३<br>कल्याणियां ततः प्राणो रमणः शिशिरोऽपि च।<br>मनोहरा धरात् पुत्रानवापाथ हरेः सुता ॥ २४<br>शिवा मनोजवं पुत्रमविज्ञातगतिं तथा।<br>अवाप चानलात् पुत्रावग्निप्रायगुणौ पुनः ॥ २५<br>अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत।<br>तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ २६<br>अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्त्तिकेयस्ततः स्मृतः।<br>प्रत्यूषस्य ऋषेः पुत्रो विभुर्नाम्नाथ देवलः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्पी प्रजापतिः ॥ २७<br>प्रासादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु ।<br>तडागारामकूपेषु स्मृतः सोऽमरवर्धकिः ॥ २८ | और संकल्पाने संकल्पको जन्म दिया। अरुन्धतीके गर्भसे भूतलपर होनेवाले समस्त जीव-जन्तुओंकी उत्पत्ति हुई। अब वसुओंकी सृष्टिके विषयमें सुनिये—ये जो प्रभाशाली देवता सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हैं, वे सभी 'वसु' नामसे विख्यात हैं। अब इनके सृष्टि-विस्तारका वर्णन सुनिये। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। इनमें आप नामक वसुके शान्त, दण्ड, शाम्ब और मणिवक्त्र नामक चार पुत्र हुए, जो सब-के-सब यज्ञ-रक्षाके अधिकारी हैं। (शेष वसुओंमें) ध्रुवका पुत्र काल हुआ। सोमसे वर्चाकी उत्पत्ति हुई। धरके कल्याणिनीके गर्भसे द्रविण और हव्यवाह नामके दो पुत्र बतलाये जाते हैं तथा हरिकी कन्या मनोहराने उन्हीं धरके संयोगसे प्राण, रमण और शिशिर नामक तीन पुत्र प्राप्त किये। शिवाने अनलसे मनोजव तथा अविज्ञातगति नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया, जो प्रायः अग्निके सदृश ही गुणवाले थे। अग्निपुत्र कुमार (कार्त्तिकेय) सरकंडेके झुरमुटमें पैदा हुए थे। इनके अनुज शाख, विशाख और नैगमेय नामसे प्रसिद्ध हैं। कृत्तिकाकी संतति होनेके कारण ये कार्त्तिकेय नामसे भी विख्यात हैं। प्रत्यूष वसुके विभु तथा देवल* नामके दो पुत्र हुए, जो आगे चलकर महान् ऋषि हुए। प्रभासका पुत्र विश्वकर्मा हुआ, जो शिल्पविद्यामें निपुण और प्रजापति हुआ। वह प्रासाद (अट्टालिका) भवन, उद्यान, प्रतिमा, आभूषण, वापी, सरोवर, बगीचा और कुएँ आदिके निर्माणकार्यमें देवताओंके बढ़ईरूपसे विख्यात हुआ॥ १२—२८॥ | | अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः।<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ २९<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः।<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः ॥ ३०<br>एतेषां मानसानां तु त्रिशूलवरधारिणाम्।<br>कोटयश्चतुराशीतिस्तत्पुत्राश्चाक्षया मताः ॥ ३१<br>दिक्षु सर्वासु ये रक्षां प्रकुर्वन्ति गणेश्वराः।<br>पुत्रपौत्रसुताश्चैते सुरभीगर्भसम्भवाः ॥ ३२ | अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, सुरराजत्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये एकादश रुद्र गणेश्वर नामसे प्रख्यात हैं। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले इन ब्रह्माके मानस पुत्ररूप गणेश्वरोंके चौरासी करोड़ पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब अक्षय माने गये हैं। सुरभीके गर्भसे उद्भूत ये एकादश रुद्रोंके पुत्र-पौत्र आदि, जो गणेश्वर कहे जाते हैं, सभी दिशाओंमें (चराचर जगत्‌की) रक्षा करते हैं॥ २९—३२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे वसुरुद्रान्वयवायो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें वसुओं और रुद्रोंके वंशका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५ ॥


* असित और एकपर्णाके पुत्र महर्षि देवल, जो 'देवलस्मृति' के रचयिता हैं, इनसे भिन्न हैं।