भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
तांस्तु दृष्ट्वा महाभागः सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।<br>नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्॥ ५<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च।<br>ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वमृषिसत्तमाः॥ ६<br><br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्।<br>अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः॥ ७<br><br>हर्यश्वेषु प्रणष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः॥ ८<br><br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः।<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् पूर्ववत् स तान्॥ ९<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वा भ्रातृनथो पुनः।<br>आगत्य चाथ सृष्टिं च करिष्यथ विशेषतः॥ १०<br><br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृपथा तदा।<br>ततः प्रभृति न भ्रातुः कनीयान् मार्गमिच्छति।<br>अन्विष्यन् दुःखमाप्नोति तेन तत् परिवर्जयेत्॥ ११पुत्रोंको पैदा किया, जो 'हर्यश्व' नामसे विख्यात हुए। उन हर्यश्वनामक दक्ष-पुत्रोंको नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि करनेके लिये उत्सुक देखकर महाभाग नारदने निकट आये हुए उन लोगोंसे कहा—'श्रेष्ठ ऋषियो! पहले आपलोग सर्वत्र घूमकर पृथ्वीके विस्तार तथा उसके ऊपर और नीचेके भागको जान लें, तब विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' नारदजीकी बात सुनकर वे लोग विभिन्न दिशाओंकी ओर चले गये और आजतक भी वे उसी प्रकार नहीं लौटे, जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलकर पुनः वापस नहीं आतीं। इस प्रकार हर्यश्व नामक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रभावशाली प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया, जो शबल नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये द्विजवर सृष्टि-रचनाके लिये एकत्र होकर नारदजीके निकट पहुँचे, तब उन्होंने उन अनुगतोंसे भी पुनः वही पूर्ववत् बात कही—'ऋषियो! आपलोग पहले सब ओर घूमकर पृथ्वीके विस्तारको समझिये और अपने भाइयोंका पता लगाकर लौटिये, तत्पश्चात् विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' तब जिस मार्गसे भाई लोग गये थे, उसी मार्गसे वे लोग भी चले, उसी मार्गसे चले गये (और पुनः वापस नहीं आये)। तभीसे छोटा भाई बड़े भाईको ढूँढ़ने नहीं जाता। यदि जाता है तो वह दुःखभागी होता है। इसलिये ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये॥२—११॥*
ततस्तेषु विनष्टेषु षष्टिं कन्याः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तथा॥ १२<br><br>प्रादात् स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १३<br><br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १४<br><br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तरमादितः।<br>मरुत्वतो वसुर्यामी लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १५<br><br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् निबोधत॥ १६<br><br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्जीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १७<br><br>भानोस्तु भानवस्तद्वन्मुहूर्तायां मुहूर्त्तकाः।<br>लम्बायां घोषनामानो नागवीथी तु यामिजा॥ १८तदनन्तर उन पुत्रोंके भी विनष्ट हो जानेपर प्रचेतानन्दन प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दक्षने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो भृगुनन्दन शुक्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो कन्याएँ अङ्गिराको प्रदान कर दीं। अब आपलोग इन देवमाताओंके नाम तथा जिस प्रकार इनकी संतानोंका विस्तार हुआ, वह सब आदिसे ही विस्तारपूर्वक सुनिये। इनमेंसे मरुत्वती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, अरुंधती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और सुन्दरी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ बतलायी गयी हैं। अब इनके पुत्रोंके भी नाम सुनिये—विश्वाने (दस) विश्वेदेवोंको, साध्याने (बारह) साध्योंको, मरुत्वतीने (उनचास) मरुतोंको, वसुने आठ वसुओंको, भानुने (बारह) सूर्योंको, मुहूर्ताने मुहूर्त्तकको, लम्बाने घोषको, यामीने नागवीथीको

* विष्णुपुराण १।१५।१०१, ब्रह्म० २।८०, वायु० ६५ आदिमें ऐसा ही है, पर भागवत० ६।५ में इसके विपरीत सम्मति है।