मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०३- प्रवरकीर्तनमें धर्मके वंशका वर्णन
| * अध्याय १९९ * | ८२५ |
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| विश्वामित्रश्चाश्मरथ्यो वञ्जुलिश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १४<br>विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकः पूरणस्तथा।<br>विश्वामित्रः पूरणश्च तयोर्द्वौ प्रवरौ स्मृतौ॥ १५<br>परस्परमवैवाह्याः पूरणाश्च परस्परम्।<br>लोहिता अष्टकाश्चैषां त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ १६<br>विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकश्च महातपाः।<br>अष्टका लोहितैर्नित्यमवैवाह्याः परस्परम्॥ १७<br>उदरेणुः क्रथकश्च ऋषिश्शोदावहिस्तथा।<br>आर्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः स्मृतः॥ १८<br>ऋणवन् गतिनश्चैव विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>उदुम्बरः सैषिरिटिर्ऋषिस्त्राक्षायणिस्तथा।<br>शाट्यायनिः करीराशी शालंकायनिलावकी।<br>मौञ्जायनिश्च भगवांस्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ २०<br>खिलिखिलिस्तथा विद्द्यो विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ २१<br>एते तवोक्ताः कुशिका नरेन्द्र<br>महानुभावाः सततं द्विजेन्द्राः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ २२ | इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। विश्वामित्र, लोहित, अष्टक और पूरण—इनके विश्वामित्र और पूरण—ये दो प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। पूरण, लोहित तथा अष्टक—इन ऋषियोंके विश्वामित्र, लोहित तथा महातपस्वी अष्टक प्रवर माने गये हैं। इनमें अष्टक वंशवालोंका लोहित वंशवालोंके साथ परस्पर विवाह नहीं होता। उदरेणु, क्रथक तथा उदावहि—इन सबके ऋणवन्, गतिन तथा विश्वामित्र—ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। उदुम्बर, सैषिरिटि, त्राक्षायणि, शाट्यायनि, करीराशी, शालंकायनि, लावकि तथा ऐश्वर्यशाली मौञ्जायनि—इन ऋषियोंके खिलिखिलि, विद्द्य तथा विश्वामित्र—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नरेन्द्र! मैंने आपसे इन कुशिकवंशी महानुभाव द्विजेन्द्रोंका वर्णन कर चुका। इनके नामसंकीर्तनसे मनुष्य समग्र पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १३—२२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने विश्वामित्रवंशानुवर्णनं नामाष्टनवतत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें विश्वामित्रवंशानुवर्णन नामक एक सौ अठानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९८॥
एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय
गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि कश्यपके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य तथा कुले।<br>गोत्रकारानृषीन् वक्ष्ये तेषां नामानि मे शृणु॥ १<br>आश्राायणिर्ऋषिगणो मेषकीरिटकायनाः।<br>उदग्रजा माठराश्च भोजा विनयलक्षणाः॥ २ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! महर्षि मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। अब मैं उन्हीं कश्यपके कुलमें जन्म लेनेवाले गोत्र-प्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर रहा हूँ, उनके नाम मुझसे सुनिये—आश्राायणि, मेपकीरिटकायन, |
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२०४- श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन
८२६ | * मत्स्यपुराण *
| शालाहलेयाः कौरिष्टाः कन्यकाश्चासुरायणाः।<br>मन्दाकिन्यां वै मृगयाः श्रोतना भौतपायनाः ॥ ३<br>देवयाना गोमयाना ह्यधश्छायाभयाश्च ये।<br>कात्यायनाः शाक्रायणा बर्हियोगगदायनाः ॥ ४<br>भवनन्दिर्महाचक्रिर्दाक्षपायण एव च।<br>योधयानाः कार्त्तिक्यो हस्तिदानास्तथैव च॥ ५<br>वात्स्यायना निकृतजा ह्याश्वलायनिनस्तथा।<br>प्रागायणाः पैलमौलिराश्ववातायनस्तथा॥ ६<br>कौबेरकाश्च श्याकारा अग्निशर्माणायणश्च ये।<br>मेषपाः कैकरसपास्तथा चैव तु बभ्रवः॥ ७<br>प्राचेयो ज्ञानसंज्ञेया आग्रा प्रासेव्य एव च।<br>श्यामोदरा वैवशपास्तथा चैवोद्बलायनाः ॥ ८<br>काष्ठाहारिणमारीचा आजिहायनहास्तिकाः।<br>वैकणेयाः काश्यपेयाः सासिसाहारितायनाः ॥ ९<br>मातङ्गिनश्च भृगवस्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>वत्सरः कश्यपश्चैव निध्रुवश्च महातपाः ॥ १०<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि द्वयामुष्यायणगोत्रजान् ॥ ११<br>अनसूयो नाकुरयः स्नातपो राजवर्तपः।<br>शैशिरोदवहिश्चैव सैरन्ध्री रौपसेवकिः॥ १२<br>यामुनिः काद्रुपिङ्गाक्षिः सजातम्बिस्तथैव च।<br>दिवावष्टाश्च इत्येते भक्त्या ज्ञेयाश्च काश्यपाः॥ १३<br>त्र्यार्षेयाश्च तथैवैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>वत्सरः कश्यपश्चैव वसिष्ठश्च महातपाः॥ १४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>संयातिश्च नभश्चोभौ पिप्पल्योऽथ जलंधरः ॥ १५<br>भुजातपूरः पूर्यश्च कर्दमो गर्दभीमुखः।<br>हिरण्यबाहुकैरातावुभौ काश्यपगोभिलौ ॥ १६<br>कुलहो वृषकण्डश्च मृगकेतुस्तथोत्तरः।<br>निदाघमसृणौ भर्त्स्या महान्तः केरलाश्च ये ॥ १७<br>शाण्डिल्यो दानवश्चैव तथा वै देवजातयः।<br>पैप्पलादिः सप्रवरा ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ १८ | उदग्रज, माठर, भोज, विनय लक्षण, शालाहलेय, कौरिष्ट, कन्यक, आसुरायण, मन्दाकिनीमें उत्पन्न मृगय, श्रोतन, भौतपायन, देवयान, गोमयान, अधश्छाय, अभय, कात्यायन, शाक्रायण, बर्हियोग, गदायन, भवनन्दि, महाचक्रि, दाक्षपायण, बोधयान, कार्त्तिक्य, हस्तिदान, वात्स्यायन, निकृतज, आश्वलायनी, प्रागायण, पैलमौलि, आश्ववातायन, कौबेरक, श्याकार, अग्निशर्माण, मेषप, कैकरसप, वभ्रु, प्राचेय, ज्ञानसंज्ञेय, आग्न, प्रासेव्य, श्यामोदर, वैवशप, उद्बलायन, काष्ठाहारिण, मारीच, आजिहायन, हास्तिक, वैकर्णेय, काश्यपेय, सासि, साहारितायन तथा मातङ्गी भृगु—इन ऋषियोंके वत्सर, कश्यप तथा महातपस्वी निध्रुव—ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें भी आपसमें विवाह नहीं होता॥१-१० ३॥<br><br>इसके उपरान्त अब मैं द्वयामुष्यायणके गोत्रमें उत्पन्न ऋषियोंके नामोंको बतला रहा हूँ—अनसूय, नाकुरय, स्नातप, राजवर्तप, शैशिर, उदवहि, सैरन्ध्री, रौपसेवकि, यामुनि, काद्रुपिंगाक्षि, सजातम्बि तथा दिवावष्ट—इन्हें भक्तिपूर्वक कश्यपके वंशमें उत्पन्न समझना चाहिये। इन सभी ऋषियोंके वत्सर, कश्यप तथा महातपस्वी वसिष्ठ—ये तीनों प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। संयाति, नभ, पिप्पल्य, जलंधर, भुजातपूर, पूर्य, कर्दम, गर्दभीमुख, हिरण्यबाहु, कैरात, काश्यप, गोभिल, कुलह, वृषकण्ड, मृगकेतु, उत्तर, निदाघ, मसृण, भर्त्स्य, महान्, केरल, शाण्डिल्य, दानव, देवजाति तथा पैप्पलादि—इन सभी ऋषियोंके |
| * अध्याय २०० * | ८२७ |
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| त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>असितो देवलश्चैव कश्यपश्व महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>ऋषिप्रधानस्य च कश्यपस्य<br>दाक्षायणीभ्यः सकलं प्रसूतम्।<br>जगत्समग्रं मनुसिंह पुण्यं<br>किं ते प्रवक्ष्याम्यहमुत्तरं तु॥ २० | असित, देवल तथा महातपस्वी कश्यप—ये तीनों ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजन्! ऋषियोंमें प्रमुख कश्यपद्वारा दाक्षायणीके गर्भसे इस समग्र जगत्की उत्पत्ति हुई है। अतः उनके वंशका यह विवरण अति पुण्यदायक है। इसके पश्चात् अब मैं तुमसे किस पवित्र कथाका वर्णन करूँ?॥ १९—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने कश्यपवंशवर्णनं नाम नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक एक सौ निन्यानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९९॥
दो सौवाँ अध्याय
गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि वसिष्ठकी शाखाका कथन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! इसके बाद अब मैं वसिष्ठगोत्रमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। वसिष्ठगोत्रियोंका प्रवर एकमात्र वसिष्ठ ही है। इनका परस्पर विवाह नहीं होता। व्याघ्रपाद, औपगव, वैक्लव, शाद्वलायन, कपिष्ठल, औपलोम, अलब्ध, शठ, कठ, गौपायन, बोधप, दाकव्य, वाह्यक, बालिशय, पालिशय, वाग्ग्रन्थि, आपस्थूण, शीतवृत्त, ब्राह्मपुरेयक, लोभायन, स्वस्तिकर, शाण्डिलि, गौडिनि, वाडोहलि, सुमना, उपावृद्धि, चौलि, बौलि, ब्रह्मबल, पौलि, श्रवस्, पौण्डव तथा याज्ञवल्क्य—ये सभी महर्षि एक प्रवरवाले हैं। महर्षि वसिष्ठ इनके प्रवर हैं और इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। शैलालय, महाकर्ण, कौर्व्य, क्रोधिन, कपिञ्जल, बालखिल्य, भागवित्तायन, कौलायन, कालशिख, कोरकृष्ण, सुरायण, शाकाहार्य, शाकधी, काण्व, उपलप, शाकायन, उहाक, माषशरावय, दाकायन, बालवय, वाकय, गोरथ, लम्बायन, श्यामवय, क्रोडोदरायण, |
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| वसिष्ठवंशजान् विप्रान् निबोध वदतो मम।<br>एकार्षेयस्तु प्रवरो वासिष्ठानां प्रकीर्तितः॥ १<br>वसिष्ठा एव वासिष्ठा अविवाह्या वसिष्ठजैः।<br>व्याघ्रपादा औपगवा वैक्लवा शाद्वलायनाः॥ २<br>कपिष्ठला औपलोमा अलब्धाश्च शठाः कठाः।<br>गौपायना बोधपाश्च दाकव्या ह्यथ वाह्यकाः॥ ३<br>बालिशयाः पालिशयास्ततो वाग्ग्रन्थयश्च ये।<br>आपस्थूणाः शीतवृत्तास्तथा ब्राह्मपुरेयकाः॥ ४<br>लोमायनाः स्वस्तिकराः शाण्डिलिगौडिनिस्तथा।<br>वाडोहलिश्च सुमनाश्चोपावृद्धिस्तथैव च॥ ५<br>चौलिर्वौलिर्ब्रह्मबलः पौलिः श्रवस एव च।<br>पौण्ड्वो याज्ञवल्क्यश्च एकार्षेया महर्षयः॥ ६<br>वसिष्ठ एषां प्रवरो ह्यवैवाह्याः परस्परम्।<br>शैलालयो महाकर्णः कौरव्यः क्रोधिनस्तथा॥ ७<br>कपिञ्जला वालखिल्या भागवित्तायनाश्च ये।<br>कौलायनः कालशिखः कोरकृष्णाः सुरायणाः॥ ८<br>शाकाहार्याः शाकधियः काण्वा उपलपाश्च ये।<br>शाकायना उहाकाश्च अथ माषशरावयः॥ ९<br>दाकायना बालवयो वाकयो गोरथास्तथा।<br>लम्बायनाः श्यामवयो ये च क्रोडोदरायणाः॥ १० |
२०५- धेनु-दान-विधि
८२८ * मत्स्यपुराण *
| प्रलम्बायनाश्च ऋषय औपमन्यव एव च।<br>सांख्यायनाश्च ऋषयस्तथा वै वेदशेरकाः॥ ११<br>पालंकायन उद्गाहा ऋषयश्च बलेक्षवः।<br>मातेया ब्रह्ममलिनः पन्नागारिस्तथैव च॥ १२<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा।<br>भगीवसुर्वसिष्ठश्च इन्द्रप्रमदिरेव च॥ १३ | प्रलम्बायन, औपमन्यु, सांख्य़ायन, वेदशेरक, पालंकायन, उद्गाह, बलेक्षु, मातेय, ब्रह्ममली तथा पन्नगारि—इन सभी ऋषियोंके भगीवसु, वसिष्ठ तथा इन्द्रप्रमदि—ये तीन ऋषि प्रवर कहे गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है॥ १—१३ १/२॥ | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>औपस्थलास्वस्थलयो बालो हालो हलाश्र्च ये ॥ १४<br>मध्यन्दिनो माक्षतयः पैप्पलादिर्विचक्षुषः।<br>त्रैशृङ्गायणासैबल्काः कुण्डिनश्च नरोत्तम ॥ १५<br>त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>वसिष्ठमित्रावरुणौ कुण्डिनश्च महातपाः॥ १६<br>दानकाया महावीर्या नागेयाः परमास्तथा।<br>आलम्बा वायनश्चापि ये चक्रोडादयो नराः ॥ १७<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>शिवकर्णौ वयश्चैव पादपश्च तथैव च॥ १८<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा।<br>जातूकर्ण्यो वसिष्ठश्च तथैवात्रिश्च पार्थिव।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>वसिष्ठवंशेऽभिहिता मयैते<br>ऋषिप्रधानाः सततं द्विजेन्द्राः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्त्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ २० | नरोत्तम! औपस्थल, अस्वस्थलय, बाल, हाल, हल, मध्यन्दिन, माक्षतय, पैप्पलादि, विचक्षुष, त्रैशृङ्गायण, सैबल्क तथा कुण्डिन—इन सभी ऋषियोंके वसिष्ठ, मित्रावरुण तथा महातपस्वी कुण्डिन—ये तीन प्रवर माने गये हैं। दानकाय, महावीर्य, नागेय, परम, आलम्ब, वायन तथा चक्रोड आदि—इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। राजन्! शिवकर्ण, वय तथा पादप—इन सभीके जातूकर्ण्य, वसिष्ठ तथा अत्रि—ये तीन प्रवर कहे गये हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। इस प्रकार महर्षि वसिष्ठके गोत्रमें उत्पन्न हुए ऋषियोंकी नामावलि मैं आपसे बता चुका। इनके नामोंके संकीर्तनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १४—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने वसिष्ठगोत्रानुवर्णनं नाम द्विशततमोऽध्यायः॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें वसिष्ठगोत्रानुवर्णन नामक दो सौवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०० ॥
२०६- कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
* अध्याय २०१ *
८२९
दो सौ एकवाँ अध्याय
प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| वसिष्ठस्तु महातेजा निमेः पूर्वपुरोहितः।<br>बभूवुः पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञास्तस्य समंततः॥ १<br><br>श्रान्तात्मा पार्थिवश्रेष्ठ विशश्राम तदा गुरुः।<br>तं गत्वा पार्थिवश्रेष्ठो निमिर्वचनमब्रवीत्॥ २<br><br>भगवन् यष्टुमिच्छामि तन्मां याजय मा चिरम्।<br>तमुवाच महातेजा वसिष्ठः पार्थिवोत्तमम्॥ ३<br><br>कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व तव यज्ञैः सुसत्तमैः।<br>श्रान्तोऽस्मि राजन् विश्रम्य याजयिष्यामि ते नृप॥ ४<br><br>एवमुक्तः प्रत्युवाच वसिष्ठं नृपसत्तमः।<br>पारलौकिककार्ये तु कः प्रतीक्षितुमुत्सहेत्॥ ५<br><br>न च मे सौहृदं ब्रह्मन् कृतान्तेन बलीयसा।<br>धर्मकार्ये त्वरा कार्या चलं यस्माद्धि जीवितम्॥ ६<br><br>धर्मपथ्यौदनो जन्तुर्मृतोऽपि सुखमश्नुते।<br>श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम्॥ ७<br><br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं चास्य न वा कृतम्।<br>क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम् ॥ ८<br><br>वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति।<br>न कालस्य प्रियः कश्चिद् द्वेष्यश्चास्य न विद्यते॥ ९<br><br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे प्रसह्य हरते जनम्।<br>प्राणवायोश्चलत्वं च त्वया विदितमेव च॥ १०<br><br>यदत्र जीव्यते ब्रह्मन् क्षणमात्रं तदद्भुतम्।<br>शरीरं शाश्वतं मन्ये विद्याभ्यासे धनार्जने॥ ११<br><br>अशाश्वतं धर्मकार्ये ऋणवानस्मि संकटे।<br>सोऽहं सम्भृतसम्भारो भवन्मूलमुपागतः॥ १२<br><br>न चेद् याजयसे मां त्वमन्यं यास्यामि याजकम्। | राजसत्तम! महातेजस्वी वसिष्ठजी निमिके पूर्व पुरोहित थे। उनके सदा चारों ओर यज्ञ होते रहते थे। पार्थिवश्रेष्ठ! किसी समय यज्ञोंका सम्पादन करानेसे श्रान्त हुए गुरु वसिष्ठ विश्राम कर रहे थे, उसी समय राजाओंमें श्रेष्ठ निमिने उनके पास जाकर इस प्रकार कहा—'भगवन्! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, अतः मेरा यज्ञ कराइये, देर मत कीजिये।' यह सुनकर महातेजस्वी वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ निमिसे कहा—'राजन्! मैं आपके श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करानेसे थक गया हूँ, अतः कुछ कालतक प्रतीक्षा कीजिये। नरेश! विश्राम कर लेनेके बाद मैं पुनः आपका यज्ञ कराऊँगा।' ऐसा कहे जानेपर राजश्रेष्ठ निमिने वसिष्ठजीको इस प्रकार उत्तर दिया—'ब्रह्मन्! परलोक-सम्बन्धी कार्यमें कौन मनुष्य प्रतीक्षा करना चाहेगा? बलवान् यमराजसे मेरी कोई मित्रता तो है नहीं, अतः धर्मकार्यमें शीघ्रता ही करनी चाहिये; क्योंकि जीवन क्षणभङ्गुर है। धर्मरूप ओदनको पथ्य बनानेवाला प्राणी मरनेपर भी सुखका उपभोग करता है। इसलिये कल होनेवाले कार्यको आज ही एवं दूसरे प्रहरमें सम्पादित होनेवाले कार्यको पूर्वप्रहरमें ही सम्पन्न कर लेना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य कर लिया है अथवा नहीं। अतः मृत्यु खेत, बाजार और गृहमें आसक्त या अन्यत्र कहीं आसक्त मनवाले मनुष्यको उसी प्रकार लेकर चल देती है, जैसे भेड़िया मृगके बच्चेको लेकर चला जाता है। कालका न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेष्य ही है। आयुके साधक कर्मके क्षीण होते ही वह बलपूर्वक मनुष्यका अपहरण कर लेता है। प्राणवायुकी चञ्चलता तो आप भी जानते ही हैं। ब्रह्मन्! ऐसी दशामें जो क्षणभर भी जीवित रहता है, यही आश्चर्य है। विद्याके अभ्यास और धनके उपार्जनमें शरीरको चिरस्थायी समझना चाहिये, किंतु धर्म-कार्यमें उसे क्षणभङ्गुर मानना चाहिये। ऐसे संकटके समय मैं ऋणी बन गया हूँ, अतः मैं सभी द्रव्योंका आयोजन कर आपके चरणोंके निकट आया हूँ। यदि इस समय आप मेरा यज्ञ नहीं करायेंगे तो मैं किसी अन्य याजकके पास जाऊँगा'॥ १—१२ ३॥ |
८३० | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवमुक्तस्तदा तेन निमिना ब्राह्मणोत्तमः ॥ १३<br>शशाप तं निमिं क्रोधाद् विदेहस्त्वं भविष्यसि।<br>श्रान्तं मां त्वं समुत्सृज्य यस्मादन्यं द्विजोत्तमम्॥ १४<br>धर्मज्ञस्तु नरेन्द्र त्वं याजकं कर्तुमिच्छसि।<br>निमिस्तं प्रत्युवाचाथ धर्मकार्यरत्तस्य मे॥ १५<br>विघ्नं करोषि नान्येन याजनं च तथेच्छसि।<br>शापं ददामि तस्मात् त्वं विदेहोऽथ भविष्यसि॥ १६<br>एवमुक्ते तु तौ जातौ विदेहौ द्विजपार्थिवौ।<br>देहहीनौ तयोर्जीवौ ब्रह्माणमुपजग्मतुः ॥ १७<br>तावागतौ समीक्ष्याथ ब्रह्मा वचनमब्रवीत्।<br>अद्यप्रभृति ते स्थानं निमिजीव ददाम्यहम् ॥ १८<br>नेत्रपक्ष्मसु सर्वेषां त्वं वसिष्यसि पार्थिव।<br>त्वत्सम्बन्धात् तथा तेषां निमेषः सम्भविष्यति ॥ १९<br>चालयिष्यन्ति तु तदा नेत्रपक्ष्माणि मानवाः।<br>एवमुक्तो मनुष्याणां नेत्रपक्ष्मसु सर्वशः॥ २०<br>जगाम निमिजीवस्तु वरदानात् स्वयम्भुवः।<br>वसिष्ठजीवो भगवान् ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ २१<br>मित्रावरुणयोः पुत्रो वसिष्ठ त्वं भविष्यसि।<br>वसिष्ठेति च ते नाम तत्रापि च भविष्यति॥ २२<br>जन्मद्वयमतीतं च तत्रापि त्वं स्मरिष्यसि।<br>एतस्मिन्नेव काले तु मित्रश्च वरुणस्तथा॥ २३<br>बदर्याश्रममासाद्य तपस्तेपतुरव्ययम्।<br>तपस्यतोस्तयोरेवं कदाचिन्माधवे ऋतौ॥ २४<br>पुष्पितद्रुमसंस्थाने शुभे दयितमारुते।<br>उर्वशी तु वरारोहा कुर्वती कुसुमोच्चयम् ॥ २५<br>सुसूक्ष्मरक्तवसना तयोर्दृष्टिपथं गता।<br>तां दृष्ट्वेन्दुमुखीं सुभ्रूं नीलनीरजलोचनाम् ॥ २६<br>उभौ चुक्षुभतुर्देवौ तद्रूपपरिमोहितौ।<br>तपस्यतोस्तयोर्वीर्यमस्खलच्च मृगासने ॥ २७<br>स्कन्नं रेतस्ततो दृष्ट्वा शापभीता वराप्सरा।<br>चकार कलशे शुक्लं तोयपूर्णे मनोरमे॥ २८<br>तस्मादृषिवरौ जातौ तेजसाप्रतिमौ भुवि।<br>वसिष्ठश्चाप्यगस्त्यश्च मित्रावरुणयोः सुतौ॥ २९ | तब उन निमिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठने क्रोधपूर्वक निमिको शाप देते हुए कहा—'नरेन्द्र! यदि तुम धर्मके ज्ञाता होकर भी मुझ थके हुए पुरोहितका परित्याग कर किसी अन्य ब्राह्मणश्रेष्ठको याजक बनाना चाहते हो तो तुम शरीररहित हो जाओगे।' तब निमिने उत्तर दिया—'मैं धार्मिक कार्यके लिये उद्यत हूँ, किंतु आप इसमें विघ्न डाल रहे हैं तथा दूसरेके द्वारा यज्ञ सम्पन्न होने देना भी नहीं चाहते, अतः मैं भी आपको शाप दे रहा हूँ कि आप भी विदेह हो जायेंगे।' ऐसा कहते ही वे दोनों ब्राह्मण और राजा शरीररहित हो गये। तब उन दोनोंके देहहीन जीव ब्रह्माके पास गये। उन दोनोंको आया हुआ देखकर ब्रह्मा इस प्रकार बोले—'निमिरूप जीव! आजसे मैं तुम्हारे लिये एक स्थान दे रहा हूँ। राजन्! तुम सभी प्राणियोंके नेत्रोंके पलकोंमें निवास करोगे। तुम्हारे संयोगसे ही उनके निमेष-उन्मेष (आँखका खुलना और बंद होना) होंगे। तब सभी मानव नेत्रोंके पलकोंको चलाते रहेंगे।' इस प्रकार कहे जानेपर निमिका जीव ब्रह्माके वरदानसे सभी मनुष्योंके नेत्र-पलकोंपर स्थित हो गया॥ १३–२० १/२ ॥<br><br>तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने वसिष्ठके जीवसे कहा—'वसिष्ठ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे। वहाँ भी तुम्हारा नाम वसिष्ठ ही होगा और तुम्हें बीते हुए दो जन्मोंका स्मरण बना रहेगा। इसी समय मित्र और वरुण—दोनों बदरिकाश्रममें आकर दुष्कर तपस्यामें तत्पर थे। इस प्रकार उन दोनोंके तपस्यामें रत रहनेपर किसी समय वसन्त-ऋतुमें जब सभी वृक्ष और लताएँ पुष्पित थीं, मन्द-मन्द मनोहर पवन प्रवाहित हो रहा था, सुन्दरी उर्वशी पुष्पोंको चुनती हुई वहाँ आयी। वह महीन लाल वस्त्र धारण किये हुए थी। संयोगवश वह उन दोनों तपस्वियोंकी आँखोंके सामने आ गयी। उसके नेत्र नील कमलके समान थे तथा मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। उस सुन्दर भौंहोंवाली उर्वशीको देखकर उसके रूपपर मोहित हो उन दोनों तपस्वियोंका मन क्षुब्ध हो उठा। तब तपस्या करते हुए ही उन दोनोंका वीर्य मृगासनपर स्खलित हो गया। तब शापसे भयभीत हुई सुन्दरी उर्वशीने उस वीर्यको जलपूर्ण मनोरम कलशमें रख दिया। उस कलशसे वसिष्ठ और अगस्त्य नामक दो ऋषिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए, जो भूतलपर अनुपम तेजस्वी थे। वे मित्र और वरुणके पुत्र कहलाये। तदनन्तर वसिष्ठने |
| * अध्याय २०१ * | ८३१ |
|---|
| वसिष्ठस्तूपयेमेऽथ भगिनीं नारदस्य तु।<br>अरुंधतीं वरारोहां तस्यां शक्तिमजीजनत्॥ ३०<br><br>शक्तेः पराशरः पुत्रस्तस्य वंशं निबोध मे।<br>यस्य द्वैपायनः पुत्रः स्वयं विष्णुरजायत॥ ३१<br><br>प्रकाशो जनितो लोके येन भारतचन्द्रमाः।<br>येनाज्ञानमोऽन्धस्य लोकस्योन्मीलनं कृतम्।<br>पराशरस्य तस्य त्वं शृणु वंशमनुत्तमम्॥ ३२ | देवर्षि नारदकी बहन सुन्दरी अरुन्धतीसे विवाह किया और उसके गर्भसे शक्ति नामक पुत्रको उत्पन्न किया। शक्तिके पुत्र पराशर हुए। अब मुझसे उनके वंशका वर्णन सुनिये। स्वयं भगवान् विष्णु पराशरके पुत्र-रूपमें द्वैपायन नामसे उत्पन्न हुए, जिन्होंने इस लोकमें भारतरूपी चन्द्रमाको प्रकाशित किया, जिससे अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके नेत्र खुल गये। अब उन पराशरके श्रेष्ठ वंशकी परम्परा सुनिये॥२९—३२॥ |
| काण्डशयो वाहनपो जैह्रपो भौमतापनः।<br>गोपालिरेषां पञ्चम एते गौराः पराशराः॥ ३३<br><br>प्रपोह्या वाह्यमयाः ख्यातेयाः कौतुजातयः।<br>हर्यश्विः पञ्चमो ह्येषां नीला ज्ञेयाः पराशराः॥ ३४<br><br>कार्ष्णायनाः कपिमुखाः काकेयस्था जपातयः।<br>पुष्करः पञ्चमश्चैषां कृष्णा ज्ञेयाः पराशराः॥ ३५<br><br>श्राविष्ठायनबालेयाः स्वायष्ठाश्चोपयाश्च ये।<br>इषीकहस्तश्चैते वै पञ्च श्वेताः पराशराः॥ ३६<br><br>वाटिको बादरिश्चैव स्तम्बा वै क्रोधनायनाः।<br>क्षैमिरेषां पञ्चमस्तु एते श्यामाः पराशराः॥ ३७<br><br>खल्यायना वार्ष्णायनास्तैलेयाः खलु यूथपाः।<br>तन्तिरेषां पञ्चमस्तु एते धूम्राः पराशराः॥ ३८<br><br>पराशराणां सर्वेषां त्र्यार्षेयः प्रवरो मतः।<br>पराशरश्च शक्तिश्च वसिष्ठश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या सर्व एते पराशराः॥ ३९<br><br>उक्तास्तवैते नृप वंशमुख्याः<br> पराशराः सूर्यसमप्रभावाः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br> पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ४० | काण्डशय, वाहनप, जैहाप, भौमतापन और पाँचवें गोपालि—ये गौर पराशर नामसे प्रसिद्ध हैं। प्रपोह्य, वाह्यमय, ख्यातेय, कौतुजाति और पाँचवें हर्यश्वि—इन्हें नील पराशर जानना चाहिये। कार्ष्णायन, कपिमुख, काकेयस्थ, जपाति और पाँचवें पुष्कर—इन्हें कृष्ण पराशर समझना चाहिये। श्राविष्ठायन, बालेय, स्वायष्ट, उपय और इषीकहस्त—ये पाँच श्वेत पराशर हैं। वाटिक, बादरि, स्तम्ब, क्रोधनायन और पाँचवें क्षैमि—ये श्याम पराशर हैं। खल्यायन, वार्ष्णायन, तैलेय, यूथप और पाँचवें तन्ति—ये धूम्र पराशर हैं। इन सभी पराशरोंके पराशर, शक्ति और महातपस्वी वसिष्ठ—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इन सभी पराशरोंका परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। राजन्! मैंने आपसे सूर्यके समान प्रभावशाली पराशरवंशी गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर दिया। इनके नामोंके परिकीर्तनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥३३—४०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने पराशरवंशवर्णनं नामैकाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनमें पराशर-वंश-वर्णन नामक दो सौ एकवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०१॥
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२०७- उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व
८३२ * मत्स्यपुराण *
दो सौ दोवाँ अध्याय
गोत्रप्रवरकीर्तनमें महर्षि अगस्त्य, पुलह, पुलस्त्य और क्रतुकी शाखाओंका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| अतः परमगस्त्यस्य वक्ष्ये वंशोद्भवान् द्विजान्।<br>अगस्त्यश्चः करम्भश्चः कौसल्याः शकटास्तथा ॥ १<br>सुमेधसो मयोभुवस्तथा गान्धारकायणाः।<br>पौलस्त्याः पौलहाश्चैव क्रतुवंशभवास्तथा ॥ २<br>त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>अगस्त्यश्च महेन्द्रश्च ऋषिश्चैव मयोभुवः ॥ ३<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>पौर्णमासाः पारणाश्च त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः ॥ ४<br>अगस्त्यः पौर्णमासश्च पारणश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्याः पौर्णमासास्तु पारणैः ॥ ५<br>एवमुक्तो ऋषीणां तु वंश उत्तमपौरुषः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि किं भवानद्य कथ्यताम् ॥ ६ | राजन्! इसके बाद अब मैं अगस्त्यके वंशमें उत्पन्न हुए द्विजोंका वर्णन कर रहा हूँ। अगस्त्य, करम्भ, कौसल्य, शकट, सुमेधा, मयोभुव, गान्धारकायण, पौलस्त्य, पौलह तथा क्रतु-वंशोत्पन्न—इनके अगस्त्य, महेन्द्र और महर्षि मयोभुव—ये तीन शुभ प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। पौर्णमास और पारण—इन ऋषियोंके अगस्त्य, पौर्णमास और महातपस्वी पारण—ये तीन प्रवर हैं। पौर्णमासोंका पारणोंके साथ विवाह निषिद्ध है। राजन्! इस प्रकार मैंने ऋषियोंके उत्तम पुरुषोंसे परिपूर्ण वंशका वर्णन कर दिया। इसके बाद अब मैं किसका वर्णन करूँ, यह अब आप बतलाइये॥ १—६॥ |
| मनुरुवाच | मनुजीने पूछा— |
| पुलहस्य पुलस्त्यस्य क्रतोश्चैव महात्मनः।<br>अगस्त्यस्य तथा चैव कथं वंशस्तदुच्यताम् ॥ ७ | भगवन्! पुलह, पुलस्त्य, महात्मा क्रतु और अगस्त्यका वंश कैसा था, इसे बतलाइये॥ ७॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् बोले— |
| क्रतुः खल्वनपत्योऽभूद् राजन् वैवस्वतेऽन्तरे।<br>इध्मवाहं स पुत्रत्वे जग्राह ऋषिसत्तमः ॥ ८<br>अगस्त्यपुत्रं धर्मज्ञमागस्त्याः क्रतवस्ततः।<br>पुलहस्य तथा पुत्रास्त्रयश्च पृथिवीपते ॥ ९<br>तेषां तु जन्म वक्ष्यामि उत्तरत्र यथाविधि।<br>पुलहस्तु प्रजां दृष्ट्वा नातिप्रीतमनाः स्वकाम् ॥ १०<br>अगस्त्यजं दृढास्यं तु पुत्रत्वे वृतवांस्ततः।<br>पौलहाश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः ॥ ११<br>पुलस्त्यान्वयसम्भूतान् दृष्ट्वा रक्षःसमुद्भवान्।<br>अगस्त्यस्य सुतं धीमान् पुत्रत्वे वृतवांस्ततः ॥ १२<br>पौलस्त्याश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः।<br>सगोत्रत्वादिमे सर्वे परस्परमनन्वयाः ॥ १३ | राजन्! वैवस्वत-मन्वन्तरमें क्रतु जब संतानहीन हो गये, तब उन ऋषिश्रेष्ठने अगस्त्यके धर्मज्ञ पुत्र इध्मवाहको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया। तभीसे अगस्त्यवंशी क्रतुवंशी कहलाने लगे। भूपाल! पुलहके तीन पुत्र थे, उनका जन्म-वृत्तान्त मैं आगे विधिपूर्वक वर्णन करूँगा। पुलहका मन अपनी संतानको देखकर प्रसन्न नहीं रहता था, अतः उन्होंने अगस्त्यके पुत्र दृढास्यको पुत्ररूपमें वरण कर लिया। राजन्! इसीलिये पुलहवंशी अगस्त्यवंशीके नामसे कहे जाते हैं। पुलस्त्य ऋषि अपनी संततिको राक्षसोंसे उत्पन्न होते देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। तब उन बुद्धिमान्ने अगस्त्यके पुत्रको पुत्ररूपमें वरण कर लिया। राजन्! तभीसे पुलस्त्यवंशी भी अगस्त्यवंशी कहलाने लगे। सगोत्र होनेके कारण इन सभीमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध वर्जित है। |
- अध्याय २०३ * । ८३३
| एते तवोक्ताः प्रवरा द्विजानां<br> महानुभावा नृप वंशकाराः।<br>एषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br> पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ १४॥ | नरेश! इस प्रकार मैंने ब्राह्मणोंके वंशप्रवर्तक महानुभाव प्रवरोंका वर्णन कर दिया। इन लोगोंके नामोंका कीर्तन करनेसे मानवके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं॥८—१४॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनमें अगस्त्यवंश-वर्णन नामक दो सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०२॥
दो सौ तीनवाँ अध्याय
प्रवरकीर्तनमें धर्मके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते शृणु धर्मस्य पार्थिव।<br>दाक्षायणीभ्यः सकलं वंशं दैवतमुत्तमम्॥ १<br>पर्वतादिमहादुर्गशरीराणि नराधिप।<br>अरुन्धत्याः प्रसूतानि धर्माद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २<br>अष्टौ च वसवः पुत्राः सोमपाश्च विभोस्तथा।<br>धरो ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानलानिलौ॥ ३<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>धरस्य पुत्रो द्रविणः कालः पुत्रो ध्रुवस्य तु॥ ४<br>कालस्यावयवानां तु शरीराणि नराधिप।<br>मूर्तिमन्ति च कालाद्धि सम्प्रसूतान्यशेषतः॥ ५<br>सोमस्य भगवान् वर्चः श्रीमांश्चापस्य कीर्त्यते।<br>अनेकजन्मजननः कुमारस्त्वनलस्य तु॥ ६<br>पुरोजवाश्चानिलस्य प्रत्यूषस्य तु देवलः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य त्रिदशानां स वर्धकः॥ ७ | राजन्! इस वैवस्वत मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर धर्मने दक्षकी कन्याओंके गर्भसे जिस उत्तम देव-वंशका विस्तार किया, उसका वर्णन सुनिये। नरेश्वर! इस वैवस्वत मन्वन्तरमें धर्मके द्वारा अरुन्धतीके गर्भसे पर्वत आदि एवं महादुर्गके समान विशालकाय संतान उत्पन्न हुए तथा उन्हीं सर्वव्यापी धर्मसे आठ सोमपायी पुत्र उत्पन्न हुए, जो वसु कहलाते हैं। उनके नाम हैं—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। धरका पुत्र द्रविण और ध्रुवका पुत्र काल हुआ। नरेश! कालके अवयवोंके जितने मूर्तिमान् शरीर हैं, वे सभी कालसे ही उत्पन्न हुए हैं। सोमके प्रभावशाली पुत्रको वर्च और आपके पुत्रको श्रीमान् कहा जाता है। अनेक जन्म धारण करनेवाला कुमार अनलका पुत्र हुआ। अनिलका पुत्र पुरोजव और प्रत्यूषका पुत्र देवल हुआ। प्रभासका पुत्र विश्वकर्मा हुआ जो देवताओंका बढ़ई है॥ १–७॥ |
| समीहितकराः प्रोक्ता नागवीथ्यादयो नव।<br>लम्बापुत्रः स्मृतो घोषो भानोः पुत्राश्च भानवः॥ ८<br>ग्रहर्क्षाणां च सर्वेषामन्येषां चामितौजसाम्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः सर्वे पुत्राः प्रकीर्तिताः॥ ९<br>संकल्पायाश्च संकल्पस्तथा पुत्रः प्रकीर्तितः।<br>मुहूर्ताश्च मुहूर्तायाः साध्याः साध्यासुताः स्मृताः॥ १० | नागवीथी आदि नव सन्तति अभीष्टको पूर्ण करनेवाली है। लम्बाका पुत्र घोष और भानुके पुत्र भानव (बारह आदित्य) कहे गये हैं, जो ग्रहों, नक्षत्रों एवं अन्य सभी अमित ओजस्वियोंमें बढ़-चढ़कर हैं। सभी मरुद्गण मरुत्वतीके पुत्र हैं तथा संकल्पाका पुत्र संकल्प कहा जाता है। मुहूर्तके पुत्र मुहूर्त और साध्याके पुत्र साध्यगण |
८३४ * मत्स्यपुराण *
| मनो मनुश्च प्राणश्च नरोषा नोच वीर्यवान्।<br>चित्तहार्योऽयनश्चैव हंसो नारायणस्तथा॥ ११<br>विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः।<br>विश्वायाश्च तथा पुत्रा विश्वेदेवाः प्रकीर्तिताः॥ १२<br>क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालकामो मुनिस्तथा।<br>कुरजो मनुजो वीजो रोचमानश्च ते दश॥ १३<br>एतावदुक्तस्तव धर्मवंशः संक्षेपतः पार्थिववंशमुख्य।<br>व्यासेन वक्तुं न हि शक्यमस्ति राजन् विना वर्षशतैरनेकैः॥ १४ | कहे गये हैं। मन, मनु, प्राण, नरोषा, नोच, वीर्यवान्, चित्तहार्य, अयन, हंस, नारायण, विभु और प्रभु—ये बारह साध्य कहे गये हैं। विश्वाके पुत्र विश्वेदेव कहे जाते हैं। क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, कालकाम, मुनि, कुरज, मनुज, बीज और रोचमान—ये दस विश्वेदेव हैं। राजवंशश्रेष्ठ! मैंने आपसे यहाँतक धर्मके वंशका संक्षेपसे वर्णन कर दिया। राजन्! अनेक सैकड़ों वर्षोंके बिना इसका विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ ८—१४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे धर्मवंशवर्णने धर्मप्रवरानुकीर्तनं नाम त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके धर्मवंशवर्णनमें धर्म-प्रवरानुकीर्तन नामक दो सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०३॥
दो सौ चारवाँ अध्याय
श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| एतद्वंशभवा विप्राः श्राद्धे भोज्याः प्रयत्नतः।<br>पितॄणां वल्लभं यस्मादेषु श्राद्धं नरेश्वर॥ १ | नरेश्वर! इन धर्मके वंशमें उत्पन्न हुए विप्रोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये; क्योंकि इन ब्राह्मणोंके सम्बन्धसे किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अतिशय प्रिय है। |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिर्याः प्रकीर्तिताः।<br>गाथाः पार्थिवशार्दूल कामयद्भिः पुरे स्वके॥ २ | राजसिंह! इसके बाद अब मैं उस गाथाका वर्णन कर रहा हूँ जिसका अपने पुरमें स्थित कामना करनेवाले पितरोंने कथन किया था। |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्याज्जलाञ्जलिम्।<br>नदीषु बहुतोयासु शीतलासु विशेषतः॥ ३ | क्या हमलोगोंके वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो अधिक एवं शीतल जलवाली नदियोंमें जाकर हमलोगोंको जलाञ्जलि देगा? |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः श्राद्धं नित्यमाचरेत्।<br>पयोमूलफलैर्भक्ष्यैस्तिलतोयेन वा पुनः॥ ४ | क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो दूध, मूल, फल और खाद्य सामग्रियोंसे या तिलसहित जलसे नित्य श्राद्ध करेगा? |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्यात्त्रयोदशीम्।<br>पायसं मधुसर्पिर्भ्यां वर्षासु च मघासु च॥ ५ | क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो वर्षा-ऋतुके मघानक्षत्रकी त्रयोदशी तिथिको मधु और घीसे मिश्रित दूधमें पका हुआ खाद्य पदार्थ हमें समर्पित करेगा? |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं खड्गमांसेन यः सकृत्।<br>श्राद्धं कुर्यात् प्रयत्नेन कालशाकेन वा पुनः॥ ६ | क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो कालशाकसे श्राद्ध करेगा? |
| कालशाकं महाशाकं मधु मुन्यन्नमेव च।<br>विषाणवर्जा ये खड्गा आसूर्यं तदशीमहि॥ ७ | कालशाक, महाशाक, मधु और मुनिजनोंके अनुकूल अन्नोंको हमलोग सूर्यास्तसे पूर्व ही ग्रहण करते हैं। |
| गयायां दर्शने राहोः खड्गमांसेन योगिनाम्।<br>भोजयेत् कः कुलेऽस्माकं छायायां कुञ्जरस्य च॥ ८ | हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कौन व्यक्ति सूर्यग्रहणके अवसरपर अर्थात् राहुके दर्शनकालतक गयातीर्थमें एवं गजच्छायायोगमें योगियोंको फलके गूदेका भोजन करायेगा? |
२०८- सावित्री और सत्यवान्का चरित्र
* अध्याय २०४ * ८३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आकल्पकालिकी तृप्तिस्तेनास्माकं भविष्यति।<br>दाता सर्वेषु लोकेषु कामचारो भविष्यति॥ ९<br>आभूतसम्प्लवं कालं नात्र कार्या विचारणा।<br>यदेतत्पञ्चकं तस्मादेकेनापि वयं सदा॥ १०<br>तृप्तिं प्राप्स्याम चानन्तां किं पुनः सर्वसम्पदा।<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं दद्यात् कृष्णाजिनं च यः॥ ११ | इन खाद्य पदार्थोंसे हमलोगोंको कल्पपर्यन्त तृप्ति बनी रहती है और दाता प्रलयकालपर्यन्त सभी लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरण करता है—इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वकथित इन पाँचोंमेंसे एकसे भी हमलोग सदा अनन्त तृप्ति प्राप्त करते हैं, फिर सभीके द्वारा करनेपर तो कहना ही क्या है? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो कृष्णमृगचर्मका दान देगा?॥ ९—११॥ |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।<br>प्रसूयमानां यो धेनुं दद्याद् ब्राह्मणपुङ्गवे॥ १२<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं वृषभं यः समुत्सृजेत्।<br>सर्ववर्णविशेषेण शुक्लं नीलं वृषं तथा॥ १३<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः कुर्याच्छ्रद्धयान्वितः।<br>सुवर्णदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च॥ १४<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।<br>कूपारामतडागानां वापीनां यश्च कारकः॥ १५<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं सर्वभावेन यो हरिम्।<br>प्रयायाच्छरणं विष्णुं देवेशं मधुसूदनम्॥ १६<br>अपि नः स कुले भूयात् कश्चिद् विद्वान् विचक्षणः।<br>धर्मशास्त्राणि यो दद्याद् विधिना विदुषामपि॥ १७<br>एतावदुक्तं तव भूमिपाल<br>श्राद्धस्य कल्पं मुनिसम्प्रदिष्टम्।<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च<br>लोकेषु मुख्यत्वकरं तथैव॥ १८<br>इत्येतां पितृगाथां तु श्राद्धकाले तु यः पितॄन्।<br>श्रावयेत्तस्य पितरो लभन्ते दत्तमक्षयम्॥ १९ | क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा नरश्रेष्ठ पैदा होगा, जो ब्राह्मणश्रेष्ठको व्याती हुई गायका दान देगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो वृषभका उत्सर्ग करेगा? वह वृष विशेषरूपसे सभी रङ्गोंकी अपेक्षा नील अथवा शुक्ल वर्णका होना चाहिये। क्या हमलोगोंके कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो श्रद्धासम्पन्न होकर सुवर्ण-दान, गो-दान और पृथ्वीदान करेगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा पुरुषश्रेष्ठ पैदा होगा, जो कूप, बगीचा, सरोवर और बावलियोंका निर्माण करायेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म ग्रहण करेगा जो सभी प्रकारसे मधु दैत्यके नाशक देवेश भगवान् विष्णुकी शरण ग्रहण करेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा प्रतिभाशाली विद्वान् होगा, जो विद्वानोंको विधिपूर्वक धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका दान देगा? भूपाल! मैंने इस प्रकार आपसे मुनियोंद्वारा कही गयी इस श्राद्धकर्मकी विधिको वर्णन कर दिया। यह पापनाशिनी, पुण्यको बढ़ानेवाली एवं संसारमें प्रमुखता प्रदान करनेवाली है। जो श्राद्धके समय पितरोंको यह पितृगाथा सुनाता है उसके पितर दिये गये पदार्थोंको अक्षयरूपमें प्राप्त करते हैं॥ १२—१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृगाथाकीर्तनं नाम चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृगाथानुकीर्तन नामक दो सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०४॥
| ८३६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
दो सौ पाँचवाँ अध्याय
धेनु-दान-विधि
| मनुरुवाच <br> प्रसूयमाना दातव्या धेनुर्ब्राह्मणपुङ्गवे। <br> विधिना केन धर्मज्ञ दानं दद्याच्च किं फलम्॥ १ <br><br> मत्स्य उवाच <br> स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां मुक्तालाङ्गूलभूषिताम्। <br> कांस्योपदोहनां राजन् सवत्सां द्विजपुङ्गवे॥ २ <br> प्रसूयमानां गां दत्त्वा महत्पुण्यफलं लभेत्। <br> यावद्वत्सो योनिगतो यावद्गर्भं न मुञ्चति॥ ३ <br> तावद् वै पृथिवी ज्ञेया सशैलवनकानना। <br> प्रसूयमानां यो दद्याद् धेनुं द्रविणसंयुताम्॥ ४ <br> ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना। <br> चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः॥ ५ <br> यावन्ति धेनुरोमाणि वत्सस्य च नराधिप। <br> तावत्संख्यं युगगणं देवलोके महीयते॥ ६ <br> पितॄन् पितामहांश्चैव तथैव प्रपितामहान्। <br> उद्धरिष्यत्यसंदेहं नरकाद् भूरिदक्षिणः॥ ७ <br> घृतक्षीरवहाः कुल्या दधिपायसकर्दमाः। <br> यत्र तत्र गतिस्तस्य द्रुमाश्चेप्सितकामदाः। <br> गोलोकः सुलभस्तस्य ब्रह्मलोकश्च पार्थिव॥ ८ <br> स्त्रियश्च तं चन्द्रसमानवक्त्राः <br> प्रतप्तजाम्बूनदतुल्यरूपाः। <br> महानितम्बास्तनुवृत्तमध्या <br> भजन्त्यजस्रं नलिनाभनेत्राः॥ ९ | **मनुजीने पूछा—**धर्मके तत्त्वोंको जाननेवाले भगवन्! श्रेष्ठ ब्राह्मणको ब्याती हुई गौका दान किस विधिसे देना चाहिये और उस दानसे क्या फल प्राप्त होता है?॥ १॥ <br><br> **मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! जिसके सींग सुवर्णजटित हों, खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, जिसकी पूँछ मोतियोंसे सुशोभित हो तथा जिसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो, ऐसी सवत्सा गौका दान श्रेष्ठ ब्राह्मणको देना चाहिये। ब्याती हुई गायका दान करनेपर महान् पुण्यफल प्राप्त होता है। जबतक बछड़ा योनिके भीतर रहता है एवं जबतक गर्भको नहीं छोड़ता, तबतक उस गौको वन-पर्वतोंसहित पृथ्वी समझना चाहिये। जो व्यक्ति द्रव्यसहित ब्याती हुई गायका दान देता है, उसने मानो सभी समुद्र, गुफा, पर्वत और जंगलोंके साथ चतुर्दिग्व्यास पृथ्वीका दान कर दिया, इसमें संदेह नहीं है। नरेश्वर! उस बछड़ेके तथा गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने युगोंतक दाता देवलोकमें पूजित होता है। विपुल दक्षिणा देनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपने पिता, पितामह तथा प्रपितामहका नरकसे उद्धार कर देता है। वह जहाँ-कहीं जाता है, वहाँ उसे दही और पायसरूपी कीचड़से युक्त घृत एवं क्षीरकी नदियाँ प्राप्त होती हैं तथा मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाले वृक्ष प्राप्त होते रहते हैं। राजन्! उसे गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाते हैं तथा चन्द्रमुखी, तपाये हुए सुवर्णके समान वर्णवाली, स्थूल नितम्बवाली, पतली कमरसे सुशोभित, कमलनयनी स्त्रियाँ निरन्तर उसकी सेवा करती हैं॥ २—९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे धेनुदानं नाम पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें धेनु-दान-माहात्म्य नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०५॥
२०९- सत्यवान्का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना
* अध्याय २०६ * | ८३७
दो सौ छठा अध्याय
कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>कृष्णाजिनप्रदानस्य विधिकारलौ ममानघ।<br>ब्राह्मणं च तथाऽऽचक्ष्व तत्र मे संशयो महान्॥ १ | **मनुजीने पूछा—**निष्पाप परमात्मन्! कृष्ण मृगचर्म प्रदान करनेकी विधि, उसका समय तथा कैसे ब्राह्मणको दान देना चाहिये—इसका विधान मुझे बताइये। इस विषयमें मुझे महान् संदेह है॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>वैशाखी पौर्णमासी च ग्रहणे शशिसूर्ययोः।<br>पौर्णमासी तु या माघी ह्याषाढी कार्तिकी तथा॥ २<br>उत्तरायणे च द्वादश्यां तस्यां दत्तं महाफलम्।<br>आहिताग्निर्द्विजो यस्तु तद् देयं तस्य पार्थिव॥ ३<br>यथा येन विधानेन तन्मे निगदतः शृणु।<br>गोमयेनोपलिप्ते तु शुचौ देशे नराधिप॥ ४<br>आदावेव समास्तीर्य शोभनं वस्त्रमाविकम्।<br>ततः सशृङ्गं सखुरमास्तरेत् कृष्णमार्गकम्॥ ५<br>कर्तव्यं रुक्मशृङ्गं तद् रौप्यदन्तं तथैव च।<br>लाङ्गूलं मौक्तिकैर्युक्तं तिलच्छन्नं तथैव च॥ ६<br>तिलैः सुपूरितं कृत्वा वाससाऽऽच्छादयेद् बुधः।<br>सुवर्णनाभं तत् कुर्यादलंकुर्याद् विशेषतः॥ ७<br>रत्नैर्गन्धैर्यथाशक्त्या तस्य दिक्षु च विन्यसेत्।<br>कांस्यपात्राणि चत्वारि तेषु दद्याद् यथाक्रमम्॥ ८<br>मृण्मयेषु च पात्रेषु पूर्वादिषु यथाक्रमम्।<br>घृतं क्षीरं दधि क्षौद्रमेवं दद्याद् यथाविधि॥ ९<br>चम्पकस्य तथा शाखामभ्रणं कुम्भमेव च।<br>बाह्योपस्थानकं कृत्वा शुभचित्तो निवेशयेत्॥ १० | **मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! वैशाखकी पूर्णिमाको, चन्द्रमा एवं सूर्यके ग्रहणके अवसरपर, माघ, आषाढ़ तथा कार्तिककी पूर्णिमा तिथिमें, सूर्यके उत्तरायण रहनेपर तथा द्वादशी तिथिमें (कृष्णमृगचर्मके) दानका महाफल कहा गया है। जो ब्राह्मण नित्य अग्न्याधान करनेवाला हो उसीको वह दान देना चाहिये। अब जिस प्रकार और जिस विधानसे वह दान देना चाहिये, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। नरेश्वर! पवित्र स्थानपर गोबरसे लिपी हुई पृथ्वीपर सर्वप्रथम सुन्दर ऊनी वस्त्र बिछाकर फिर खुर और सींगोंसे युक्त उस कृष्णमृगचर्मको बिछा दे। उस मृगचर्मके सींगोंको सुवर्णसे, दाँतोंको चाँदीसे, पूँछको मोतियोंसे अलंकृत कर उसे तिलोंसे आवृत कर दे। बुद्धिमान् पुरुष उस मृगचर्मको तिलोंसे पूरित कर वस्त्रसे ढक दे। उसकी सुवर्णमय नाभि बनाकर उसे अपनी शक्तिके अनुकूल रत्नों तथा सुगन्धित पदार्थोंसे विशेषरूपसे अलंकृत कर दे। फिर क्रमानुसार काँसेके बने हुए चार पात्रोंको उसकी चारों दिशाओंमें रखे। फिर पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः चार मिट्टीके पात्रोंमें घृत, दुग्ध, दही तथा मधु विधिवत् भर दे। तदुपरान्त चम्पककी एक डाल तथा छिद्ररहित एक कलश बाहर पूर्वकी ओर मङ्गलमय भावनासे स्थापित करे॥ २—१०॥ |
| सूक्ष्मवस्त्रं शुभं पीतं मार्जनार्थं प्रयोजयेत्।<br>तथा धातुमयं पात्रं पादयोस्तस्य दापयेत्॥ ११<br>यानि कानि च पापानि मया लोभात् कृतानि वै।<br>लौहपात्रादिदानेन प्रणश्यन्तु ममाशु वै॥ १२ | मार्जनके लिये एक सुन्दर महीन पीले वस्त्रका प्रयोग करे तथा धातु-निर्मित पात्र उसके दोनों पैरोंके पास रख दे। तत्पश्चात् ऐसा कहे कि 'मैंने लोभमें पड़कर जिन-जिन पापोंको किया है, वे लौहमय पात्रादिका दान करनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जायें।' |
| ८३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| तिलपूर्णं ततः कृत्वा वामपादे निवेशयेत्।<br>यानि कानि च पापानि कर्मोत्थानि कृतानि च॥ १३<br>कांस्यपात्रप्रदानेन तानि नश्यन्तु मे सदा।<br>मधुपूर्णं तु तत् कृत्वा पादे वै दक्षिणे न्यसेत्॥ १४<br>परापवादपैशुन्याद् वृथा मांसस्य भक्षणात्।<br>तत्रोत्थितं च मे पापं ताम्रपात्रात् प्रणश्यतु॥ १५<br>कन्यामृताद् गवां चैव परदाराभिमर्षणात्।<br>रौप्यपात्रप्रदानाद्धि क्षिप्रं नाशं प्रयातु मे॥ १६<br>ऊर्ध्वपादे त्विमे कार्यं ताम्रस्य रजतस्य च।<br>जन्मान्तरसहस्रेषु कृतं पापं कुबुद्धिना॥ १७<br>सुवर्णपात्रदानात् तु नाशयाशु जनार्दन।<br>हेममुक्ता विद्रुमं च दाडिमं बीजपूरकम्॥ १८<br>प्रशस्तपात्रे श्रवणे खुरे शृङ्गाटकानि च।<br>एवं कृत्वा यथोक्तेन सर्वशाकफलानि च॥ १९<br>तत्प्रतिग्रहविद् विद्वानाहिताग्निर्द्विजोत्तमः।<br>स्नातो वस्त्रयुगच्छन्नः स्वशक्त्या चाप्यलङ्कृतः॥ २०<br>प्रतिग्रहश्च तस्योक्तः पुच्छदेशे महीपते।<br>तत एवं समीपे तु मन्त्रमेनमुदीरयेत्॥ २१<br>कृष्णाजिनेति कृष्णान् हिरण्यं मधुसर्पिषी।<br>ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम्॥ २२<br>यस्तु कृष्णाजिनं दद्यात् सखुरं शृङ्गसंयुतम्।<br>तिलैः प्रच्छाद्य वासोभिः सर्ववस्त्रैरलंकृतम्॥ २३<br>वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु विशाखायां विशेषतः।<br>ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना॥ २४<br>सप्तद्वीपान्विता दत्ता पृथिवी नात्र संशयः।<br>कृष्णकृष्णाङ्कलो देवः कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते॥ २५<br>सुवर्णदानात् त्वद्दानाद् धूतपापस्य प्रीयताम्।<br>त्रयस्त्रिंशत्सुराणां त्वमाधारत्वे व्यवस्थितः॥ २६<br>कृष्णोऽसि मूर्तिमान् साक्षात् कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते।<br>सुवर्णनाभिकं दद्यात् प्रीयतां वृषभध्वजः॥ २७ | फिर काँसेके पात्रको तिलोंसे भरकर बायें पैरके पास रखे और कहे कि 'मैंने प्रसङ्गवश जिन-जिन पापोंका आचरण किया है, मेरे वे सभी पाप इस कांस्य-पात्रके दानसे सदाके लिये नष्ट हो जायँ।' फिर ताम्र-पात्रमें मधु भरकर दाहिने पैरके पास रखे और कहे कि 'दूसरेकी निन्दा या चुगुली करने अथवा किसी अवैध मांसका भक्षण करनेसे उत्पन्न हुआ मेरा पाप इस ताम्र-पात्रका दान करनेसे नष्ट हो जाय।' 'कन्या और गौके लिये मिथ्या कहनेसे तथा परकीय स्त्रीका स्पर्श करनेसे जो पाप उत्पन्न हुआ हो, मेरा वह पाप चाँदीके पात्रदानसे शीघ्र ही नष्ट हो जाय।' चाँदी तथा ताँबेके बने हुए पात्रोंको पैरके ऊपरी भागमें रखना चाहिये। 'जनार्दन! मैंने अपनी दुष्ट बुद्धिके द्वारा हजारों जन्मोंमें जो पाप किया है उसे आप सुवर्णपात्रके दानसे शीघ्र ही नष्ट कर दें।' यह मन्त्र सुवर्णपात्र दान करते समय कहे। उस समय सुवर्ण, मोती, मूँगा, अनार और बिजौरा नींबूको अच्छे पात्रमें रखकर उस मृगचर्मके कान, खुर और सींगपर स्थापित कर दे। यथोक्त विधिके अनुसार ऐसा करके सभी प्रकारके शाक-फलोंको भी रख दे। महीपते! तत्पश्चात् जो ब्राह्मणश्रेष्ठ प्रतिग्रहकी विधिका ज्ञाता, विद्वान् और अग्न्याधान करनेवाला हो तथा स्नानके पश्चात् दो सुन्दर वस्त्रको धारणकर अपनी शक्तिके अनुसार अलंकृत भी हो, ऐसे ब्राह्मणको उस मृगचर्मके पुच्छदेशमें दान देनेका विधान है। उस समय उसके समीप इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। जो 'कृष्णाजिनेति०'—इस मन्त्रका उच्चारण कर कृष्णमृगचर्म, सुवर्ण, मधु और घृत ब्राह्मणको दान करता है, वह सभी दुष्कर्मोंसे छूट जाता है॥ ११—२२॥<br>जो मनुष्य खुर तथा सींगसहित कृष्णमृगचर्मको तिलोंसे ढककर एवं सभी प्रकारके वस्त्रोंसे अलङ्कृत कर विशेषतया विशाखा नक्षत्रसे युक्त वैशाखमासकी पूर्णिमा तिथिको दान करता है, उसने निःसंदेह समुद्रों, गुफाओं, पर्वतों एवं जंगलोंसमेत सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका दान कर दिया। कृष्णाजिन! तुम कृष्णस्वरूपधारी देवता हो, तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णदान तथा तुम्हारे दानसे जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हैं, ऐसे मुझपर तुम प्रसन्न हो जाओ। कृष्णाजिन! तुम तैंतीस देवताओंके आधार-स्वरूप निश्चित किये गये हो और साक्षात् मूर्तिमान् श्रीकृष्ण हो, तुम्हें प्रणाम है। पुनः वृषभध्वज शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ—इस भावनासे सुवर्णयुक्त नाभिवाले मृगचर्मका दान |
* अध्याय २०६ * <span style="float: right;">८३९</span>
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| कृष्णः कृष्णगलो देवः कृष्णाजिनधरस्तथा।<br>तद्दानाद्धतपापस्य प्रीयतां वृषभध्वजः॥ २८<br><br>अनेन विधिना दत्त्वा यथावत् कृष्णमार्गकम्।<br>न स्पृश्योऽसौ द्विजो राजञ्श्वितियूपसमो हि सः॥ २९<br><br>तं दाने श्राद्धकाले च दूरतः परिवर्जयेत्।<br>स्वगृहात् प्रेष्य तं विप्रं मङ्गलस्नानमाचरेत्॥ ३० | करना चाहिये। जो श्यामवर्ण, कृष्णकण्ठ तथा कृष्णचर्म धारण करनेवाले देवता हैं, आपके दानसे पापशून्य हुए मुझपर वे शंकर प्रसन्न हों। राजन्! उपर्युक्त विधिसे कृष्णमृगचर्मका दान देनेके पश्चात् उस प्रतिगृहीता ब्राह्मणका स्पर्श नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह (श्मशानस्था अस्पृश्या) चिताके खूँटेके समान हो जाता है। उसका श्राद्ध और दानके समय दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। उस ब्राह्मणको अपने घरसे विदाकर फिर मङ्गलस्नान करनेका विधान है॥ २३-३०॥ |
| पूर्णकुम्भेन राजेन्द्र शाखया चम्पकस्य तु।<br>कृत्वाऽऽचार्यश्च कलशं मन्त्रेणानेन मूर्धनि॥ ३१<br><br>आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा ऋचा संस्नाप्य षोडश।<br>अहते वाससी वीत आचान्तः शुचितामियात्॥ ३२<br><br>तद्वासः कुम्भसहितं नीत्वा क्षेप्यं चतुष्पथे।<br>ततो मण्डलमाविशेत् कृत्वा देवान् प्रदक्षिणम्॥ ३३<br><br>पीते वृत्ते सपत्नीकं मार्जयेद् याज्यकं द्विजः।<br>मार्जयेन्मुक्तिकामं तु ब्राह्मणेन घटेन वै॥ ३४<br><br>श्रीकामं वैष्णवेनेह कलशेन तु पार्थिव।<br>राज्यकामं तथा मूर्ध्नि ऐन्द्रेण कलशेन तु॥ ३५<br><br>द्रव्यप्रतापकामं तु आग्नेयघटवारिणा।<br>मृत्युञ्जयविधानाय याम्येन कलशेन तु॥ ३६<br><br>ततस्तु तिलकं कार्यं ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्।<br>दत्त्वा तत्कर्मसिद्धयर्थं ग्राह्याऽऽशीस्तु विशेषतः॥ ३७ | राजेन्द्र! तत्पश्चात् आचार्य चम्पककी शाखासे युक्त जलपूर्ण कलशके जलसे दाताके मस्तकपर ‘आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा०' आदि सोलह ऋचाओंसे अभिषेचन करे, तब वह दो बिना फटे वस्त्रोंको पहनकर आचमन करके पवित्र होता है। पुनः उस वस्त्रको कलशमें डालकर उसे चौराहेपर फेंक दे। इसके बाद देवताओंकी प्रदक्षिणा कर मण्डपमें प्रवेश करे। तदनन्तर ब्राह्मण उस पीत वस्त्रधारी सपत्नीक यजमानका मार्जन करे। यदि यजमान मुक्तिकी इच्छा रखता हो तो ब्राह्मणसम्बन्धी घटसे उसका मार्जन करे। राजन्! यदि यजमान लक्ष्मीका अभिलाषी हो तो विष्णुसम्बन्धी कलशके जलसे उसका मार्जन करे। यदि राज्यकी कामना हो तो इन्द्रसम्बन्धी कलशके जलसे यजमानके मस्तकपर अभिषेक करे। द्रव्य और प्रतापकी कामना करनेवाले यजमानका अग्निसम्बन्धी कलशके जलसे सिंचन करे। मृत्युपर विजय पानेके विधानके लिये यमसम्बन्धी कलशके जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् यजमानको तिलक लगाये। दाता ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर कृष्णमृगचर्म-दानकी सिद्धिके लिये उनसे विशेष रूपसे आशीर्वाद ग्रहण करे॥ ३१-३७॥ |
| कृतेनानेन या तुष्टिर्न सा शक्या सुरैरपि।<br>वक्तुं हि नृपतिश्रेष्ठ तथाप्युद्देशतः शृणु॥ ३८<br><br>समग्रभूमिदानस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्।<br>सर्वांल्लोकांश्च जयति कामचारी विहङ्गवत्॥३९<br><br>आभूतसम्प्लवं तावत् स्वर्गमाप्नोत्यसंशयम्।<br>न पिता पुत्रमरणं वियोगं भार्यया सह॥४० | नृपतिश्रेष्ठ! इसके करनेसे जो तुष्टि प्राप्त होती है, उसका वर्णन करनेकी शक्ति यद्यपि देवताओंमें भी नहीं है तथापि मैं संक्षेपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। वह दाता निश्चय ही समग्र पृथ्वीके दानका फल प्राप्त करता है, सभी लोकोंको जीत लेता है, पक्षीके समान सर्वत्र स्वेच्छानुसार विचरण करता है, महाप्रलयकालपर्यन्त निःसंदेह स्वर्गलोकमें स्थित रहता है, पिता पुत्रकी मृत्यु और पत्नीके वियोगको नहीं देखता। |
२१०- यमराजका सत्यवान्के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप
८४० * मत्स्यपुराण *
| धनदेशपरित्यागं न चैवेहाप्नुयात् क्वचित्।<br>कृष्णोप्सितं कृष्णमृगस्य चर्म<br>दत्त्वा द्विजेन्द्राय समाहितात्मा।<br>यथोक्तमेतन्मरणं न शोचेत्<br>प्राप्नोत्यभीष्टं मनसः फलं तत्॥ ४१ | उसे मर्त्यलोकमें कहीं भी धन और देशके परित्यागका अवसर नहीं प्राप्त होता। जो मनुष्य समाहितचित्त हो कुलीन ब्राह्मणको श्रीकृष्णकी प्रिय वस्तु कृष्ण-मृगचर्मका दान करता है वह कभी मृत्युकी चिन्तासे शोकग्रस्त नहीं होता और अपने मनके अनुकूल सभी फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ ३८—४१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कृष्णाजिनप्रदानं नाम षडधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कृष्णमृगचर्मप्रदान नामक दो सौ छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०६॥
दो सौ सातवाँ अध्याय
उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व
| मनुरुवाच<br>भगवन् श्रोतुमिच्छामि वृषभस्य च लक्षणम्।<br>वृषोत्सर्गविधिं चैव तथा पुण्यफलं महत्॥ १ | मनुजीने कहा—भगवन्! अब मैं उत्सर्ग किये जानेवाले वृषभके लक्षणों, वृषोत्सर्गकी विधि और वृषोत्सर्गसे प्राप्त होनेवाले महान् पुण्यफलको सुनना चाहता हूँ॥ १॥ |
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| मत्स्य उवाच<br>धेनुमादौ परीक्षेत सुशीलां च गुणान्विताम्।<br>अव्यङ्गामपरिक्लिष्टां जीववत्सामरोगिणीम्॥ २<br>स्निग्धवर्णां स्निग्धखुरां स्निग्धशृङ्गीं तथैव च।<br>मनोहराकृतिं सौम्यां सुप्रमाणामनुद्धताम्॥ ३<br>आवर्तैर्दक्षिणावर्तैर्युक्तां दक्षिणतस्तथा।<br>वामावर्तैर्वामतश्च विस्तीर्णजघनां तथा॥ ४<br>मृदुसंहतताम्रोष्ठीं रक्तग्रीवासुशोभिताम्।<br>अश्यामदीर्घा स्फुटिता रक्तजिह्वा तथा च या॥ ५<br>विस्रावामलनेत्रा च शफैर्विरलैरदृढैः।<br>वैदूर्यमधुवर्णैश्च जलबुद्बुदसंनिभैः॥ ६<br>रक्तस्निग्धैश्च नयनैस्तथा रक्तकनीनिकैः।<br>सप्तचतुर्दशदन्ता तथा वा श्यामतालुका॥ ७<br>षडुन्नता सुपाश्र्वोरुः पृथुपञ्चसमायता।<br>अष्टायतशिरोग्रीवा या राजन् सा सुलक्षणा॥ ८ | मत्स्यभगवान् बोले—राजन्! सर्वप्रथम धेनुकी परीक्षा करनी चाहिये। जो सुशीला, गुणवती, अविकृत अङ्गोवाली, मोटी-ताजी, जिसके बछड़े जीते हों, रोगरहित, मनोहर रंगवाली, चिकने खुरवाली, चिकने सींगोंवाली, सुदृश्य, सीधी-सादी, न अधिक ऊँची, न अधिक नाटी अर्थात् मध्यम कदवाली, अचञ्चल, भँवरीवाली, विशेषतः दाहिनी ओरकी भँवरियाँ दाहिनी ओर और बायीं ओरकी बायीं ओर हों, विस्तृत जाँघोंवाली, मुलायम एवं सटे हुए लाल होठोंवाली, लाल गलेसे सुशोभित, काली एवं लम्बी न हो ऐसी स्फुटित लाल जिह्वावाली, अश्रुसहित निर्मल नेत्रोंवाली, सुदृढ़ एवं सटे हुए खुरोंवाली, वैदूर्य, मधु अथवा जलके बुद्बुदके समान रंगोंवाली, लाल चिकने नेत्र और लाल कनीनिकासे युक्त, इक्कीस दाँत और श्यामवर्णके तालुसे सम्पन्न हो, जिसके छः स्थान उच्च, पाँच स्थान समान, सिर, ग्रीवा और आठ स्थान विस्तृत तथा बगल और ऊरु देश सुन्दर हों, वह गौ शुभ लक्षणोंसे युक्त मानी गयी है॥ २—८॥ |
| मनुरुवाच<br>षडुन्नताः के भगवन् के च पञ्च समायताः।<br>आयताश्च तथैवाष्टौ धेनूनां के शुभावहाः॥ ९ | मनुने पूछा—भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि गौओंके छः स्थान उन्नत, पाँच स्थान सम तथा आठ स्थान आयत होने चाहिये, वे शुभदायक स्थान कौन-कौन हैं?॥ ९॥ |
| * अध्याय २०७ * | ८४१ |
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| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— पृथ्वीपते! छाती, पीठ, सिर, दोनों कोख तथा कमर— इन छः उन्नत स्थानोंवाली धेनुओंको विज्ञलोग श्रेष्ठ मानते हैं। सूर्यपुत! दोनों कान, दोनों नेत्र तथा ललाट—इन पाँच स्थानोंका सम-आयत होना प्रशंसित है। पूँछ, गलकम्बल, दोनों सक्थियाँ (घुटनोंसे नीचेके भाग) और चारों स्तन—ये आठ तथा सिर और गर्दन—ये दो मिलाकर दस स्थान आयत होनेपर श्रेष्ठ माने गये हैं। भूपते! ऐसी सर्वलक्षणसम्पन्न धेनुके शुभ लक्षणोंसे युक्त बछड़ेकी भी परीक्षा करनी चाहिये। जिसका कंधा और ककुद् ऊँचा हो, पूँछ और गलेका कम्बल (चमड़ा) कोमल हो, कटितट और स्कन्ध विशाल हो, वैदूर्य मणिके समान नेत्र हों, सींगोंका अग्रभाग प्रबाल (मूँगे)-के सदृश हो, पूँछ लम्बी तथा मोटी हो, तीखे अग्रभागवाले नौ या अठारह सुन्दर दाँत हों तथा मल्लिका-पुष्पोंकी तरह श्वेत आँखें हों, ऐसे वृषका उत्सर्ग करना चाहिये, उसके गृहमें रहनेसे भी धन-धान्यकी वृद्धि होती है॥ १०—१५॥ | | उरः पृष्ठं शिरः कुक्षी श्रोणी च वसुधाधिप।<br>षडुन्नतानि धेनूनां पूजयन्ति विचक्षणाः॥ १०<br>कर्णौ नेत्रे ललाटं च पञ्च भास्करनन्दन।<br>समायतानि शस्यन्ते पुच्छं सास्ना च सक्थिनी॥ ११<br>चत्वारश्च स्तना राजन् ज्ञेया ह्यष्टौ मनीषिभिः।<br>शिरो ग्रीवायताश्चैते भूमिपाल दश स्मृताः॥ १२<br>तस्याः सुतं परीक्षेत वृषभं लक्षणान्वितम्।<br>उन्नतस्कन्ध ककुद्मृजुलाङ्गूलकम्बलम्॥ १३<br>महाकटितटस्कन्धं वैदूर्यमणिलोचनम्।<br>प्रवालगर्भशृङ्गाग्रं सुदीर्घपृथुवालधिम्॥ १४<br>नवाष्टादशसंख्यैर्वा तीक्ष्णाग्रैर्दशनैः शुभैः।<br>मल्लिकाक्षञ्च मोक्तव्यो गृहेऽपि धनधान्यदः॥ १५ | | | वर्णतस्ताम्रकपिलो ब्राह्मणस्य प्रशस्यते।<br>श्वेतो रक्तश्च कृष्णश्च गौरः पाटल एव च॥ १६<br>मद्रिकस्ताम्रपृष्ठश्च शबलः पञ्चवालकैः।<br>पृथुकर्णो महास्कन्धः श्लक्ष्णरोमा च यो भवेत्।<br>रक्ताक्षः कपिलो यश्च रक्तशृङ्गतलो भवेत्॥ १७<br>श्वेतोदरः कृष्णपार्श्वो ब्राह्मणस्य तु शस्यते।<br>स्निग्धो रक्तेन वर्णेन क्षत्रियस्य प्रशस्यते॥ १८<br>काञ्चनाभेन वैश्यस्य कृष्णोनाप्यन्त्यजन्मनः।<br>यस्य प्रागायते शृङ्गे भ्रूमुखाभिमुखे सदा॥ १९<br>सर्वेषामेव वर्णानां सर्वः सर्वार्थसाधकः।<br>मार्जारपादः कपिलो धन्यः कपिलपिङ्गलः॥ २०<br>श्वेतो मार्जारपादस्तु धन्यो मणिनिभेक्षणः।<br>करटः पिङ्गलश्चैव श्वेतपादस्तथैव च॥ २१<br>सर्वपादसितो यश्च द्विपादश्वेत एव च।<br>कपिञ्जलनिभो धन्यस्तथा तित्तिरिसंनिभः॥ २२ | ब्राह्मणके लिये ताम्रके समान लाल अथवा कपिल वर्णका वृषभ उत्तम है। जो सफेद, लाल, काला, भूरा, पाटल, पूरा ऊँचा लाल पीठवाला, पाँच प्रकारके रोएँसे चितकबरा, स्थूल कानोंवाला विशाल कंधेसे युक्त, चिकने रोमोंवाला, लाल आँखोंवाला, कपिल, सींगका निचला भाग लाल रंगवाला, सफेद पेट और कृष्ण पार्श्वभागवाला हो, ऐसा वृषभ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। लाल रंगके चिकने रोमवाला वृषभ क्षत्रिय जातिके लिये, सुवर्णके समान वर्णवाला वृषभ वैश्यके लिये और काले रंगका वृष शूद्रके लिये उत्तम माना गया है। जिस वृषभके सींग आगेकी ओर विस्तृत तथा भौंहें मुखकी ओर झुकी हों, वह सभी वर्णोंके लिये सर्वार्थ-सिद्ध करनेवाला होता है। बिलावके समान पैरोंवाला, कपिल या पीले रंगका मिश्रित वृषभ धन्य होता है। श्वेत रंगका, बिल्लीके समान पैरवाला और मणिके समान आँखोंवाला वृषभ धन्य है। कौवेके समान काले और पीले रंगवाला तथा श्वेत पैरोंवाला वृष धन्य है। जिसके सभी पैर अथवा दो पैर श्वेतवर्णके हों और जिसका रंग कपिञ्जल अथवा तीतरके समान हो, वह भी धन्य है॥ १६—२२॥ | | आकर्णमूलं श्वेतं तु मुखं यस्य प्रकाशते।<br>नन्दीमुखः स विज्ञेयो रक्तवर्णो विशेषतः॥ २३ | जिस वृषभका मुख कानतक श्वेत दिखायी पड़ता हो तथा विशेषतया वह लाल वर्णका हो, उसे नन्दीमुख जानना चाहिये। |
२११- सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति
८४२ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
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| श्वेतं तु जठरं यस्य भवेत् पृष्ठं च गोपतेः।<br>वृषभः स समुद्राक्षः सततं कुलवर्धनः॥ २४<br><br>मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः।<br>कमलैर्मण्डलैश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः॥ २५<br><br>अतसीपुष्पवर्णश्च तथा धन्यतरः स्मृतः।<br>एते धन्यास्तथाऽन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप॥ २६<br><br>कृष्णतालवोष्ठवदना रूक्षशृङ्गशफाश्च ये।<br>अव्यक्तवर्णा ह्रस्वाश्च व्याघ्रसिंहनिभाश्च ये॥ २७<br><br>ध्वाङ्क्षगृध्रसवर्णाश्च तथा मूषकसंनिभाः।<br>कुण्ठाः काणास्तथा खञ्जाः केकराक्षास्तथैव च॥ २८<br><br>विषमश्वेतपादाश्च उद्भ्रान्तनयनास्तथा।<br>नैते वृषाः प्रमोक्तव्या न च धार्यास्तथा गृहे॥ २९<br><br>मोक्तव्यानां च धार्याणां भूयो वक्ष्यामि लक्षणम्।<br>स्वस्तिकाकारशृङ्गाश्च तथा मेघौघनिःस्वनाः॥ ३०<br><br>महाप्रमाणाश्च तथा मत्तमातङ्गगामिनः।<br>महोरस्का महोच्छाया महाबलपराक्रमाः।<br>शिरः कर्णौ ललाटं च वालधिश्चरणास्तथा॥ ३१<br><br>नेत्रे पार्श्वे च कृष्णानि शस्यन्ते चन्द्रभासिनाम्।<br>श्वेतान्येतानि शस्यन्ते कृष्णस्य तु विशेषतः॥ ३२<br><br>भूमौ कर्षति लाङ्गूलं प्रलम्बस्थूलवालधिः।<br>पुरस्तादुद्यतो नीलो वृषभश्च प्रशस्यते॥ ३३ | जिस वृषभका पेट तथा पीठ श्वेतवर्ण हो, वह समुद्राक्ष नामक वृषभ कहा जाता है। वह सर्वदा कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है। जो वृष मल्लिकाके फूलके समान चितकबरे रंगवाला होता है, वह धन्य है। जो कमल-मण्डलके समान चितकबरा होता है, वह सौभाग्यवर्द्धक होता है तथा अलसीके फूलके समान नीले रंगवाला बैल धन्यतर कहा गया है। राजन्! ये उत्तम लक्षणोंवाले वृष हैं। अब मैं आपसे अशुभ लक्षणसम्पन्न वृषभोंका वर्णन कर रहा हूँ। जो काले तालु, ओंठ और मुखवाले, रूखे सींगों एवं खुरोंवाले, अव्यक्त रंगवाले, नाटे, बाघ तथा सिंहके समान भयानक, कौवे और गृध्रके समान रंगवाले या मूषकके समान अल्पकाय, मन्द स्वभाववाले, काने, लँगड़े, नीची-ऊँची आँखोंवाले, विषम (तीन या एक) पैरोंमें श्वेत रंगवाले तथा चञ्चल नेत्रोंवाले हों, ऐसे वृषभोंका न तो उत्सर्ग करना चाहिये और न उन्हें अपने घरमें ही रखना ठीक है। मैं पुनः उत्सर्ग करने तथा पालने योग्य (श्रेष्ठ) वृषभोंका लक्षण बतला रहा हूँ। जिनके सींग स्वस्तिकके आकारके हों और स्वर बादलोंकी गर्जनाके सदृश हो, जो ऊँचे कदवाले, हाथीके समान चलनेवाले, विशाल छातीवाले, बहुत ऊँचे, महान् बल-पराक्रमसे युक्त हों तथा चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णके जिन वृषभोंके सिर, दोनों कान, ललाट, पूँछ, चारों पैर, दोनों नेत्र, दोनों बगलें काले रंगके हों एवं काले रंगवाले वृषभोंके ये स्थान श्वेत हों तो वे उत्तम माने गये हैं। जिसकी लम्बी और मोटी पूँछ पृथ्वीपर रगड़ खाती हो और जिसका अगला भाग उठा हुआ हो, वह नील वृषभ प्रशंसनीय माना गया है॥ २३—३३॥ |
| शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते।<br>अनड्वाहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिर्जयावहाः॥ ३४ | जिनके शरीरमें शक्ति, ध्वज और पताकाओंकी रेखा बनी हो, वे वृषभ धन्य हैं और विचित्र सिद्धि एवं विजय प्रदान करनेवाले हैं। |
| प्रदक्षिणं निवर्तन्ते स्वयं ये विनिवर्तिताः।<br>समुन्नतशिरोग्रीवा धन्यास्ते यूथवर्धनाः॥ ३५ | जो घुमाये जानेपर या स्वयं घूमनेपर दाहिनी ओर घूमते हों तथा जिनके सिर एवं कंधे समुन्नत हों, वे धन्य तथा अपने समूहके वृद्धिकारक हैं। |
| रक्तशृङ्गाग्रनयनः श्वेतवर्णो भवेद् यदि।<br>शफैः प्रवालसदृशैर्नास्ति धन्यतरस्ततः॥ ३६ | जिसके सींगोंके अग्रभाग तथा नेत्र लाल हों और वह यदि श्वेतवर्णका हो तथा उसके खुर प्रवालके समान लाल हों तो उससे श्रेष्ठ कोई वृषभ नहीं होता। |
| एते धार्याः प्रयत्नेन मोक्तव्या यदि वा वृषाः।<br>धारिताश्च तथा मुक्ता धनधान्यप्रवर्धनाः॥ ३७ | ऐसे वृषभोंका प्रयत्नपूर्वक पालन अथवा उत्सर्ग करना चाहिये; क्योंकि ये रखने अथवा उत्सर्ग करने—दोनों दशाओंमें धन-धान्यको बढ़ाते हैं। |
* अध्याय २०८ * । ८४३
| चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्वेतानि गोपतेः ।<br>लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत् ॥ ३८<br><br>वृष एवं स मोक्तव्यो न सन्धार्यो गृहे भवेत्।<br>तदर्थमेषा चरति लोके गाथा पुरातनी ॥ ३९<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>गौरीं चाप्युद्वहेत् कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ४०<br><br>एवं वृषं लक्षणसम्प्रयुक्तं<br>गृहोद्भवं क्रीतमथापि राजन्।<br>मुक्त्वा न शोचेन्मरणं महात्मा<br>मोक्षं गतश्चाहमतोऽभिधास्ये ॥ ४१ | जिस वृषभके चारों चरण, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा शेष शरीरका रंग लाह-रसके समान हो, उसे नील वृषभ कहते हैं। ऐसा वृषभ उत्सर्ग कर देना चाहिये, उसे घरमें पालना ठीक नहीं हैं; क्योंकि ऐसे वृषभके लिये लोकमें एक ऐसी पुरानी गाथा प्रचलित है कि बहुतेरे पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे कोई भी तो गयाकी यात्रा करेगा या गौरी कन्याका दान करेगा या नीले वृषभका उत्सर्ग करेगा। राजन्! ऐसे लक्षणयुक्त वृषभका चाहे वह घरमें उत्पन्न हुआ हो या खरीदा गया हो, उत्सर्ग कर महात्मा पुरुष कभी मृत्युके भयसे शोकग्रस्त नहीं होता; उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ३४—४१॥ |
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इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृषभलक्षणं नाम समाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृषभलक्षण नामक दो सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०७॥
दो सौ आठवाँ अध्याय
सावित्री और सत्यवान्का चरित्र
| सूत उवाच<br>ततः स राजा देवेशं पप्रच्छामितविक्रमः।<br>पतिव्रतानां माहात्म्यं तत्सम्बद्धां कथामपि॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर अपरिमित पराक्रमी राजा मनुने भगवान् मत्स्यसे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्य तथा तत्सम्बन्धी कथाके विषयमें प्रश्न किया॥ १॥ |
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| मनुरुवाच<br>पतिव्रतानां का श्रेष्ठा कया मृत्युः पराजितः।<br>नामसंकीर्तनं कस्याः कीर्तनीयं सदा नरैः।<br>सर्वपापक्षयकरमिदानीं कथयस्व मे॥ २ | मनुजीने पूछा—(प्रभो!) पतिव्रता स्त्रियोंमें कौन श्रेष्ठ है? किस स्त्रीने मृत्युको पराजित किया है? तथा मनुष्योंको सदा किस (सती नारी)-का नामोच्चारण करना चाहिये? आप अब मुझसे सभी पापोंको नष्ट करनेवाली इस कथाका वर्णन कीजिये॥ २॥ |
| मत्स्य उवाच<br>वैलौम्यं धर्मराजोऽपि नाचरत्यथ योषिताम्।<br>पतिव्रतानां धर्मज्ञ पूज्यास्तस्यापि ताः सदा॥ ३<br><br>अत्र ते वर्णयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>यथा विमोक्षितो भर्ता मृत्युपाशगतः स्त्रिया॥ ४<br><br>मद्रेषु शाकलो राजा बभूवाश्वपतिः पुरा।<br>अपुत्रस्तप्यमानोऽसौ पुत्रार्थी सर्वकामदाम्॥ ५ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**धर्मज्ञ! धर्मराज भी पतिव्रता स्त्रियोंके प्रतिकूल कोई व्यवहार नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनके लिये भी सर्वदा सम्माननीय हैं। इस विषयमें मैं तुमसे पापोंको नष्ट करनेवाली वैसी कथाका वर्णन कर रहा हूँ कि किस प्रकार पतिव्रता स्त्रीने मृत्युके पाशमें पड़े हुए अपने पतिको बन्धनमुक्त कराया था। प्राचीन समयमें मद्रदेश (वर्तमान स्यालकोट जनपद)-में शाकलवंशी अश्वपति नामक एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। |
२१२- यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति
८४४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
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| आराध्यति सावित्रीं लक्षितोऽसौ द्विजोत्तमैः।<br>सिद्धार्थकैर्हूयमानां सावित्रीं प्रत्यहं द्विजैः॥ ६<br><br>शतसंख्यैश्चतुर्थ्यां तु दशमासागते दिने।<br>काले तु दर्शयामास स्वां तनुं मनुजेश्वरम्॥ ७ | तब ब्राह्मणोंके निर्देशपर वे पुत्रकी कामनासे सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सावित्रीकी आराधना करने लगे। वे प्रतिदिन सैकड़ों ब्राह्मणोंके साथ सावित्रीदेवीकी प्रसन्नताके लिये सफेद सरसोंका हवन करते थे। दस महीना बीत जानेपर चतुर्थी तिथिको सावित्री (गायत्री) देवीने राजाको दर्शन दिया॥ ३–७॥ |
| सावित्र्युवाच<br>राजन् भक्तोऽसि मे नित्यं दास्यामि त्वां सुतां सदा।<br>तां दत्तां मत्प्रसादेन पुत्रीं प्राप्स्यसि शोभनाम्॥ ८<br><br>एतावदुक्त्वा सा राज्ञः प्रणतस्यैव पार्थिव।<br>जगामादर्शनं देवी खे तथा नृप चञ्चला॥ ९<br><br>मालती नाम तस्यासीद् राज्ञः पत्नी पतिव्रता।<br>सुषुवे तनयां काले सावित्रीमिव रूपतः॥ १०<br><br>सावित्र्याहुतया दत्ता तद्रूपसदृशी तथा।<br>सावित्री च भवत्वेषा जगाद नृपतिर्द्विजान्॥ ११<br><br>नामाकुर्वन् द्विजश्रेष्ठाः सावित्रीति नृपोत्तम।<br>कालेन यौवनं प्राप्तं ददौ सत्यवते पिता॥ १२<br><br>नारदस्तु ततः प्राह राजानं दीप्ततेजसम्।<br>संवत्सरेण क्षीणायुर्भविष्यति नृपात्मजः।<br>सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते चिन्तयित्वा नराधिपः॥ १३<br><br>तथापि प्रददौ कन्यां द्युमत्सेनात्मजे शुभे।<br>सावित्र्यपि च भर्त्तारमासाद्य नृपमन्दिरे॥ १४<br><br>नारदस्य तु वाक्येन दूयमानेन चेतसा।<br>शुश्रूषां परमां चक्रे भर्तुःश्वशुरयोर्वने॥ १५<br><br>राज्याद् भ्रष्टः सभार्यस्तु नष्टचक्षुर्नराधिपः।<br>न तुतोष समासाद्य राजपुत्रीं तथा स्नुषाम्॥ १६<br><br>चतुर्थेऽहनि मर्तव्यं तथा सत्यवता द्विजाः।<br>श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता तदा राजसुतापि सा॥ १७<br><br>चक्रे त्रिरात्रं धर्मज्ञा व्रतं तस्मिंस्तदा दिने।<br>दारुपुष्पफलाहारी सत्यवांस्तु ययौ वनम्॥ १८<br><br>श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता याचनामङ्गभीरुणा।<br>सावित्र्यपि जगामार्ता सह भर्त्रा महद्वनम्॥ १९ | सावित्रीने कहा— राजन्! तुम मेरे नित्य भक्त हो, अतः मैं तुम्हें कन्या प्रदान करूँगी। मेरी कृपासे तुम्हें मेरी दी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या प्राप्त होगी। राजन्! चरणोंमें पड़े हुए राजासे इतना कहकर वह देवी आकाशमें बिजलीकी भाँति अदृश्य हो गयी। नरेश! उस राजाकी मालती नामकी पतिव्रता पत्नी थी। समय आनेपर उसने सावित्रीके समान रूपवाली एक कन्याको जन्म दिया। तब राजाने ब्राह्मणोंसे कहा—तपके द्वारा आवाहन किये जानेपर सावित्रीने इसे मुझे दिया है तथा यह सावित्रीके समान रूपवाली है, अतः इसका नाम सावित्री होगा। नृपश्रेष्ठ! तब उन ब्राह्मणोंने उस कन्याका सावित्री नाम रख दिया। समयानुसार सावित्री युवती हुई, तब पिताने उसका सत्यवान्के लिये वाग्दान कर दिया। इसी बीच नारदने उस उद्दीप्त तेजस्वी राजासे कहा कि 'उस राजकुमारकी आयु एक ही वर्षमें समाप्त हो जायगी।' (नारदजीकी वाणी सुनकर) यद्यपि राजाके मनमें चिन्ता तो हुई, पर यह विचारकर कि 'कन्यादान एक ही बार किया जाता है' उन्होंने अपनी कन्या सावित्रीको द्युमत्सेनके सुन्दर पुत्र सत्यवान्को प्रदान कर दिया। सावित्री भी पतिको पाकर अपने भवनमें नारदकी अशुभ वाणी सुनकर दुःखित मनसे काल व्यतीत करने लगी। वह वनमें सास-श्वसुर तथा पतिदेवकी बड़ी शुश्रूषा करती थी; किंतु राजा द्युमत्सेन अपने राज्यसे च्युत हो गये थे तथा पत्नीसहित अन्धा होनेके कारण वैसी गुणवती राजपुत्रीको पुत्रवधू-रूपमें प्राप्तकर संतुष्ट नहीं थे। 'आजसे चौथे दिन सत्यवान् मर जायगा' ऐसा ब्राह्मणोंके मुखसे सुनकर धर्मपरायणा राजपुत्री सावित्रीने श्वशुरसे आज्ञा लेकर त्रिरात्र-व्रतका अनुष्ठान किया। चौथा दिन आनेपर जब सत्यवान्ने लकड़ी, पुष्प एवं फलकी टोहमें जंगलकी ओर प्रस्थान किया, तब याचनाभङ्गसे डरती हुई सावित्री भी सास-श्वशुरकी आज्ञा लेकर दुःखित मनसे पतिके साथ उस भयंकर जंगलमें गयी। (नारदके वचनका ध्यान कर) चित्तमें अतिशय कष्ट रहनेपर भी |