मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २०१ *
८२९
दो सौ एकवाँ अध्याय
प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| वसिष्ठस्तु महातेजा निमेः पूर्वपुरोहितः।<br>बभूवुः पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञास्तस्य समंततः॥ १<br><br>श्रान्तात्मा पार्थिवश्रेष्ठ विशश्राम तदा गुरुः।<br>तं गत्वा पार्थिवश्रेष्ठो निमिर्वचनमब्रवीत्॥ २<br><br>भगवन् यष्टुमिच्छामि तन्मां याजय मा चिरम्।<br>तमुवाच महातेजा वसिष्ठः पार्थिवोत्तमम्॥ ३<br><br>कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व तव यज्ञैः सुसत्तमैः।<br>श्रान्तोऽस्मि राजन् विश्रम्य याजयिष्यामि ते नृप॥ ४<br><br>एवमुक्तः प्रत्युवाच वसिष्ठं नृपसत्तमः।<br>पारलौकिककार्ये तु कः प्रतीक्षितुमुत्सहेत्॥ ५<br><br>न च मे सौहृदं ब्रह्मन् कृतान्तेन बलीयसा।<br>धर्मकार्ये त्वरा कार्या चलं यस्माद्धि जीवितम्॥ ६<br><br>धर्मपथ्यौदनो जन्तुर्मृतोऽपि सुखमश्नुते।<br>श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम्॥ ७<br><br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं चास्य न वा कृतम्।<br>क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम् ॥ ८<br><br>वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति।<br>न कालस्य प्रियः कश्चिद् द्वेष्यश्चास्य न विद्यते॥ ९<br><br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे प्रसह्य हरते जनम्।<br>प्राणवायोश्चलत्वं च त्वया विदितमेव च॥ १०<br><br>यदत्र जीव्यते ब्रह्मन् क्षणमात्रं तदद्भुतम्।<br>शरीरं शाश्वतं मन्ये विद्याभ्यासे धनार्जने॥ ११<br><br>अशाश्वतं धर्मकार्ये ऋणवानस्मि संकटे।<br>सोऽहं सम्भृतसम्भारो भवन्मूलमुपागतः॥ १२<br><br>न चेद् याजयसे मां त्वमन्यं यास्यामि याजकम्। | राजसत्तम! महातेजस्वी वसिष्ठजी निमिके पूर्व पुरोहित थे। उनके सदा चारों ओर यज्ञ होते रहते थे। पार्थिवश्रेष्ठ! किसी समय यज्ञोंका सम्पादन करानेसे श्रान्त हुए गुरु वसिष्ठ विश्राम कर रहे थे, उसी समय राजाओंमें श्रेष्ठ निमिने उनके पास जाकर इस प्रकार कहा—'भगवन्! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, अतः मेरा यज्ञ कराइये, देर मत कीजिये।' यह सुनकर महातेजस्वी वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ निमिसे कहा—'राजन्! मैं आपके श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करानेसे थक गया हूँ, अतः कुछ कालतक प्रतीक्षा कीजिये। नरेश! विश्राम कर लेनेके बाद मैं पुनः आपका यज्ञ कराऊँगा।' ऐसा कहे जानेपर राजश्रेष्ठ निमिने वसिष्ठजीको इस प्रकार उत्तर दिया—'ब्रह्मन्! परलोक-सम्बन्धी कार्यमें कौन मनुष्य प्रतीक्षा करना चाहेगा? बलवान् यमराजसे मेरी कोई मित्रता तो है नहीं, अतः धर्मकार्यमें शीघ्रता ही करनी चाहिये; क्योंकि जीवन क्षणभङ्गुर है। धर्मरूप ओदनको पथ्य बनानेवाला प्राणी मरनेपर भी सुखका उपभोग करता है। इसलिये कल होनेवाले कार्यको आज ही एवं दूसरे प्रहरमें सम्पादित होनेवाले कार्यको पूर्वप्रहरमें ही सम्पन्न कर लेना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य कर लिया है अथवा नहीं। अतः मृत्यु खेत, बाजार और गृहमें आसक्त या अन्यत्र कहीं आसक्त मनवाले मनुष्यको उसी प्रकार लेकर चल देती है, जैसे भेड़िया मृगके बच्चेको लेकर चला जाता है। कालका न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेष्य ही है। आयुके साधक कर्मके क्षीण होते ही वह बलपूर्वक मनुष्यका अपहरण कर लेता है। प्राणवायुकी चञ्चलता तो आप भी जानते ही हैं। ब्रह्मन्! ऐसी दशामें जो क्षणभर भी जीवित रहता है, यही आश्चर्य है। विद्याके अभ्यास और धनके उपार्जनमें शरीरको चिरस्थायी समझना चाहिये, किंतु धर्म-कार्यमें उसे क्षणभङ्गुर मानना चाहिये। ऐसे संकटके समय मैं ऋणी बन गया हूँ, अतः मैं सभी द्रव्योंका आयोजन कर आपके चरणोंके निकट आया हूँ। यदि इस समय आप मेरा यज्ञ नहीं करायेंगे तो मैं किसी अन्य याजकके पास जाऊँगा'॥ १—१२ ३॥ |