मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| प्रलम्बायनाश्च ऋषय औपमन्यव एव च।<br>सांख्यायनाश्च ऋषयस्तथा वै वेदशेरकाः॥ ११<br>पालंकायन उद्गाहा ऋषयश्च बलेक्षवः।<br>मातेया ब्रह्ममलिनः पन्नागारिस्तथैव च॥ १२<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा।<br>भगीवसुर्वसिष्ठश्च इन्द्रप्रमदिरेव च॥ १३ | प्रलम्बायन, औपमन्यु, सांख्य़ायन, वेदशेरक, पालंकायन, उद्गाह, बलेक्षु, मातेय, ब्रह्ममली तथा पन्नगारि—इन सभी ऋषियोंके भगीवसु, वसिष्ठ तथा इन्द्रप्रमदि—ये तीन ऋषि प्रवर कहे गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है॥ १—१३ १/२॥ | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>औपस्थलास्वस्थलयो बालो हालो हलाश्र्च ये ॥ १४<br>मध्यन्दिनो माक्षतयः पैप्पलादिर्विचक्षुषः।<br>त्रैशृङ्गायणासैबल्काः कुण्डिनश्च नरोत्तम ॥ १५<br>त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>वसिष्ठमित्रावरुणौ कुण्डिनश्च महातपाः॥ १६<br>दानकाया महावीर्या नागेयाः परमास्तथा।<br>आलम्बा वायनश्चापि ये चक्रोडादयो नराः ॥ १७<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>शिवकर्णौ वयश्चैव पादपश्च तथैव च॥ १८<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा।<br>जातूकर्ण्यो वसिष्ठश्च तथैवात्रिश्च पार्थिव।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>वसिष्ठवंशेऽभिहिता मयैते<br>ऋषिप्रधानाः सततं द्विजेन्द्राः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्त्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ २० | नरोत्तम! औपस्थल, अस्वस्थलय, बाल, हाल, हल, मध्यन्दिन, माक्षतय, पैप्पलादि, विचक्षुष, त्रैशृङ्गायण, सैबल्क तथा कुण्डिन—इन सभी ऋषियोंके वसिष्ठ, मित्रावरुण तथा महातपस्वी कुण्डिन—ये तीन प्रवर माने गये हैं। दानकाय, महावीर्य, नागेय, परम, आलम्ब, वायन तथा चक्रोड आदि—इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। राजन्! शिवकर्ण, वय तथा पादप—इन सभीके जातूकर्ण्य, वसिष्ठ तथा अत्रि—ये तीन प्रवर कहे गये हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। इस प्रकार महर्षि वसिष्ठके गोत्रमें उत्पन्न हुए ऋषियोंकी नामावलि मैं आपसे बता चुका। इनके नामोंके संकीर्तनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १४—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने वसिष्ठगोत्रानुवर्णनं नाम द्विशततमोऽध्यायः॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें वसिष्ठगोत्रानुवर्णन नामक दो सौवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०० ॥