मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २०० * | ८२७ |
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| त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>असितो देवलश्चैव कश्यपश्व महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>ऋषिप्रधानस्य च कश्यपस्य<br>दाक्षायणीभ्यः सकलं प्रसूतम्।<br>जगत्समग्रं मनुसिंह पुण्यं<br>किं ते प्रवक्ष्याम्यहमुत्तरं तु॥ २० | असित, देवल तथा महातपस्वी कश्यप—ये तीनों ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजन्! ऋषियोंमें प्रमुख कश्यपद्वारा दाक्षायणीके गर्भसे इस समग्र जगत्की उत्पत्ति हुई है। अतः उनके वंशका यह विवरण अति पुण्यदायक है। इसके पश्चात् अब मैं तुमसे किस पवित्र कथाका वर्णन करूँ?॥ १९—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने कश्यपवंशवर्णनं नाम नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक एक सौ निन्यानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९९॥
दो सौवाँ अध्याय
गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि वसिष्ठकी शाखाका कथन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! इसके बाद अब मैं वसिष्ठगोत्रमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। वसिष्ठगोत्रियोंका प्रवर एकमात्र वसिष्ठ ही है। इनका परस्पर विवाह नहीं होता। व्याघ्रपाद, औपगव, वैक्लव, शाद्वलायन, कपिष्ठल, औपलोम, अलब्ध, शठ, कठ, गौपायन, बोधप, दाकव्य, वाह्यक, बालिशय, पालिशय, वाग्ग्रन्थि, आपस्थूण, शीतवृत्त, ब्राह्मपुरेयक, लोभायन, स्वस्तिकर, शाण्डिलि, गौडिनि, वाडोहलि, सुमना, उपावृद्धि, चौलि, बौलि, ब्रह्मबल, पौलि, श्रवस्, पौण्डव तथा याज्ञवल्क्य—ये सभी महर्षि एक प्रवरवाले हैं। महर्षि वसिष्ठ इनके प्रवर हैं और इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। शैलालय, महाकर्ण, कौर्व्य, क्रोधिन, कपिञ्जल, बालखिल्य, भागवित्तायन, कौलायन, कालशिख, कोरकृष्ण, सुरायण, शाकाहार्य, शाकधी, काण्व, उपलप, शाकायन, उहाक, माषशरावय, दाकायन, बालवय, वाकय, गोरथ, लम्बायन, श्यामवय, क्रोडोदरायण, |
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| वसिष्ठवंशजान् विप्रान् निबोध वदतो मम।<br>एकार्षेयस्तु प्रवरो वासिष्ठानां प्रकीर्तितः॥ १<br>वसिष्ठा एव वासिष्ठा अविवाह्या वसिष्ठजैः।<br>व्याघ्रपादा औपगवा वैक्लवा शाद्वलायनाः॥ २<br>कपिष्ठला औपलोमा अलब्धाश्च शठाः कठाः।<br>गौपायना बोधपाश्च दाकव्या ह्यथ वाह्यकाः॥ ३<br>बालिशयाः पालिशयास्ततो वाग्ग्रन्थयश्च ये।<br>आपस्थूणाः शीतवृत्तास्तथा ब्राह्मपुरेयकाः॥ ४<br>लोमायनाः स्वस्तिकराः शाण्डिलिगौडिनिस्तथा।<br>वाडोहलिश्च सुमनाश्चोपावृद्धिस्तथैव च॥ ५<br>चौलिर्वौलिर्ब्रह्मबलः पौलिः श्रवस एव च।<br>पौण्ड्वो याज्ञवल्क्यश्च एकार्षेया महर्षयः॥ ६<br>वसिष्ठ एषां प्रवरो ह्यवैवाह्याः परस्परम्।<br>शैलालयो महाकर्णः कौरव्यः क्रोधिनस्तथा॥ ७<br>कपिञ्जला वालखिल्या भागवित्तायनाश्च ये।<br>कौलायनः कालशिखः कोरकृष्णाः सुरायणाः॥ ८<br>शाकाहार्याः शाकधियः काण्वा उपलपाश्च ये।<br>शाकायना उहाकाश्च अथ माषशरावयः॥ ९<br>दाकायना बालवयो वाकयो गोरथास्तथा।<br>लम्बायनाः श्यामवयो ये च क्रोडोदरायणाः॥ १० |