भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 836, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 836

८२६ | * मत्स्यपुराण *

शालाहलेयाः कौरिष्टाः कन्यकाश्चासुरायणाः।<br>मन्दाकिन्यां वै मृगयाः श्रोतना भौतपायनाः ॥ ३<br>देवयाना गोमयाना ह्यधश्छायाभयाश्च ये।<br>कात्यायनाः शाक्रायणा बर्हियोगगदायनाः ॥ ४<br>भवनन्दिर्महाचक्रिर्दाक्षपायण एव च।<br>योधयानाः कार्त्तिक्यो हस्तिदानास्तथैव च॥ ५<br>वात्स्यायना निकृतजा ह्याश्वलायनिनस्तथा।<br>प्रागायणाः पैलमौलिराश्ववातायनस्तथा॥ ६<br>कौबेरकाश्च श्याकारा अग्निशर्माणायणश्च ये।<br>मेषपाः कैकरसपास्तथा चैव तु बभ्रवः॥ ७<br>प्राचेयो ज्ञानसंज्ञेया आग्रा प्रासेव्य एव च।<br>श्यामोदरा वैवशपास्तथा चैवोद्बलायनाः ॥ ८<br>काष्ठाहारिणमारीचा आजिहायनहास्तिकाः।<br>वैकणेयाः काश्यपेयाः सासिसाहारितायनाः ॥ ९<br>मातङ्गिनश्च भृगवस्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>वत्सरः कश्यपश्चैव निध्रुवश्च महातपाः ॥ १०<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि द्वयामुष्यायणगोत्रजान् ॥ ११<br>अनसूयो नाकुरयः स्नातपो राजवर्तपः।<br>शैशिरोदवहिश्चैव सैरन्ध्री रौपसेवकिः॥ १२<br>यामुनिः काद्रुपिङ्गाक्षिः सजातम्बिस्तथैव च।<br>दिवावष्टाश्च इत्येते भक्त्या ज्ञेयाश्च काश्यपाः॥ १३<br>त्र्यार्षेयाश्च तथैवैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>वत्सरः कश्यपश्चैव वसिष्ठश्च महातपाः॥ १४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>संयातिश्च नभश्चोभौ पिप्पल्योऽथ जलंधरः ॥ १५<br>भुजातपूरः पूर्यश्च कर्दमो गर्दभीमुखः।<br>हिरण्यबाहुकैरातावुभौ काश्यपगोभिलौ ॥ १६<br>कुलहो वृषकण्डश्च मृगकेतुस्तथोत्तरः।<br>निदाघमसृणौ भर्त्स्या महान्तः केरलाश्च ये ॥ १७<br>शाण्डिल्यो दानवश्चैव तथा वै देवजातयः।<br>पैप्पलादिः सप्रवरा ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ १८उदग्रज, माठर, भोज, विनय लक्षण, शालाहलेय, कौरिष्ट, कन्यक, आसुरायण, मन्दाकिनीमें उत्पन्न मृगय, श्रोतन, भौतपायन, देवयान, गोमयान, अधश्छाय, अभय, कात्यायन, शाक्रायण, बर्हियोग, गदायन, भवनन्दि, महाचक्रि, दाक्षपायण, बोधयान, कार्त्तिक्य, हस्तिदान, वात्स्यायन, निकृतज, आश्वलायनी, प्रागायण, पैलमौलि, आश्ववातायन, कौबेरक, श्याकार, अग्निशर्माण, मेषप, कैकरसप, वभ्रु, प्राचेय, ज्ञानसंज्ञेय, आग्न, प्रासेव्य, श्यामोदर, वैवशप, उद्बलायन, काष्ठाहारिण, मारीच, आजिहायन, हास्तिक, वैकर्णेय, काश्यपेय, सासि, साहारितायन तथा मातङ्गी भृगु—इन ऋषियोंके वत्सर, कश्यप तथा महातपस्वी निध्रुव—ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें भी आपसमें विवाह नहीं होता॥१-१० ३॥<br><br>इसके उपरान्त अब मैं द्वयामुष्यायणके गोत्रमें उत्पन्न ऋषियोंके नामोंको बतला रहा हूँ—अनसूय, नाकुरय, स्नातप, राजवर्तप, शैशिर, उदवहि, सैरन्ध्री, रौपसेवकि, यामुनि, काद्रुपिंगाक्षि, सजातम्बि तथा दिवावष्ट—इन्हें भक्तिपूर्वक कश्यपके वंशमें उत्पन्न समझना चाहिये। इन सभी ऋषियोंके वत्सर, कश्यप तथा महातपस्वी वसिष्ठ—ये तीनों प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। संयाति, नभ, पिप्पल्य, जलंधर, भुजातपूर, पूर्य, कर्दम, गर्दभीमुख, हिरण्यबाहु, कैरात, काश्यप, गोभिल, कुलह, वृषकण्ड, मृगकेतु, उत्तर, निदाघ, मसृण, भर्त्स्य, महान्, केरल, शाण्डिल्य, दानव, देवजाति तथा पैप्पलादि—इन सभी ऋषियोंके
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