मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 835, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १९९ * | ८२५ |
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| विश्वामित्रश्चाश्मरथ्यो वञ्जुलिश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १४<br>विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकः पूरणस्तथा।<br>विश्वामित्रः पूरणश्च तयोर्द्वौ प्रवरौ स्मृतौ॥ १५<br>परस्परमवैवाह्याः पूरणाश्च परस्परम्।<br>लोहिता अष्टकाश्चैषां त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ १६<br>विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकश्च महातपाः।<br>अष्टका लोहितैर्नित्यमवैवाह्याः परस्परम्॥ १७<br>उदरेणुः क्रथकश्च ऋषिश्शोदावहिस्तथा।<br>आर्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः स्मृतः॥ १८<br>ऋणवन् गतिनश्चैव विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>उदुम्बरः सैषिरिटिर्ऋषिस्त्राक्षायणिस्तथा।<br>शाट्यायनिः करीराशी शालंकायनिलावकी।<br>मौञ्जायनिश्च भगवांस्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ २०<br>खिलिखिलिस्तथा विद्द्यो विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ २१<br>एते तवोक्ताः कुशिका नरेन्द्र<br>महानुभावाः सततं द्विजेन्द्राः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ २२ | इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। विश्वामित्र, लोहित, अष्टक और पूरण—इनके विश्वामित्र और पूरण—ये दो प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। पूरण, लोहित तथा अष्टक—इन ऋषियोंके विश्वामित्र, लोहित तथा महातपस्वी अष्टक प्रवर माने गये हैं। इनमें अष्टक वंशवालोंका लोहित वंशवालोंके साथ परस्पर विवाह नहीं होता। उदरेणु, क्रथक तथा उदावहि—इन सबके ऋणवन्, गतिन तथा विश्वामित्र—ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। उदुम्बर, सैषिरिटि, त्राक्षायणि, शाट्यायनि, करीराशी, शालंकायनि, लावकि तथा ऐश्वर्यशाली मौञ्जायनि—इन ऋषियोंके खिलिखिलि, विद्द्य तथा विश्वामित्र—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नरेन्द्र! मैंने आपसे इन कुशिकवंशी महानुभाव द्विजेन्द्रोंका वर्णन कर चुका। इनके नामसंकीर्तनसे मनुष्य समग्र पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १३—२२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने विश्वामित्रवंशानुवर्णनं नामाष्टनवतत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें विश्वामित्रवंशानुवर्णन नामक एक सौ अठानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९८॥
एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय
गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि कश्यपके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य तथा कुले।<br>गोत्रकारानृषीन् वक्ष्ये तेषां नामानि मे शृणु॥ १<br>आश्राायणिर्ऋषिगणो मेषकीरिटकायनाः।<br>उदग्रजा माठराश्च भोजा विनयलक्षणाः॥ २ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! महर्षि मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। अब मैं उन्हीं कश्यपके कुलमें जन्म लेनेवाले गोत्र-प्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर रहा हूँ, उनके नाम मुझसे सुनिये—आश्राायणि, मेपकीरिटकायन, |
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