भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 834, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 834

८२४ | * मत्स्यपुराण *


एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय

प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि विश्वामित्रके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! अब मैं आपसे महर्षि अत्रिके ही वंशमें उत्पन्न अन्य शाखाका वर्णन कर रहा हूँ। नरेश्वर! महर्षि अत्रिके पुत्र श्रीमान् सोम हुए। उनके वंशमें विश्वामित्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने अपनी तपस्याके बलसे ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया। अब मैं उनके वंशका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। वैश्वामित्र (मधुच्छन्दा), देवरात, वैकृति, गालव, वतण्ड, शलंक, अभय, आयतायन, श्यामायन, याज्ञवल्क्य, जाबाल, सैन्धवायन, वाभ्रव्य, करीष, संश्रुत्य, संश्रुत, उलूप, औपहाव, पयोद, जनपादप, खरबाच, हलयम, साधित तथा वास्तुकौशिक—इन सभी ऋषियोंके वंशमें उत्पन्न होनेवालोंमें विश्वामित्र, देवरात तथा महायशस्वी उद्दाल—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नराधिप! देवश्रवा, सुजातेय, सौमुक, कारुकायण, वैदेहरात तथा कुशिक—इन सभी महर्षियोंके वंशमें देवश्रवा, देवरात तथा विश्वामित्र—ये तीनों प्रवर माने गये हैं। इन वंशजोंमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। राजन्! धनंजय, कपर्देय, परिकूट तथा पाणिनि*—इनके वंशमें विश्वामित्र, धनंजय और माधुच्छन्दस—ये तीन प्रवर माने गये हैं। विश्वामित्र, मधुच्छन्दा और अघमर्षण—इन तीन ऋषियोंके वंशजोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होते॥ १–१२॥
अत्रेरेवापरं वंशं तव वक्ष्यामि पार्थिव।<br>अत्रेः सोमः सुतः श्रीमांस्तस्य वंशोद्भवो नृप॥ १<br>विश्वामित्रस्तु तपसा ब्राह्मण्यं समवाप्तवान्।<br>तस्य वंशमहं वक्ष्ये तन्मे निगदतः शृणु॥ २<br>वैश्वामित्रो देवरातस्तथा वैकृतिगालवः।<br>वतण्डश्च शलंकश्च ह्याभयश्चायतायनः॥ ३<br>श्यामायना याज्ञवल्क्या जाबालाः सैन्धवायनाः।<br>वाभ्रव्याश्च करीषाश्च संश्रुत्या अथ संश्रुताः॥ ४<br>उलूपा औपहावाश्च पयोदजनपादपाः।<br>खरवाचो हलयमाः साधिता वास्तुकौशिकाः॥ ५<br>त्र्यार्षेयाः प्रवरास्तेषां सर्वेषां परिकीर्तिताः।<br>विश्वामित्रो देवरात उद्दालश्च महायशाः॥ ६<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>देवश्रवाः सुजातेयाः सौमुकाः कारुकायणाः॥ ७<br>तथा वैदेहराता ये कुशिकाश्च नराधिप।<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः शुभः॥ ८<br>देवश्रवा देवरातो विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ९<br>धनंजयः कपर्देयः परिकूटश्च पार्थिव।<br>पाणिनिश्चैव त्र्यार्षेयाः सर्व एते प्रकीर्तिताः॥ १०<br>विश्वामित्रस्तथाद्यश्च माधुच्छन्दस एव च।<br>त्र्यार्षेयाः प्रवरा ह्येते ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ११<br>विश्वामित्रो मधुच्छन्दास्तथा चैवाघमर्षणः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १२
कामलायनिजश्चैव अश्मरथ्यस्तथैव च।<br>वञ्जुलिश्चापि त्र्यार्षेयः सर्वेषां प्रवरो मतः॥ १३कामलायनिज, अश्मरथ्य और वञ्जुलि—इन ऋषियोंके विश्वामित्र, अश्मरथ्य और महातपस्वी वञ्जुलि—ये तीनों प्रवर माने गये हैं।

* इससे सिद्ध है कि व्याकरण-कर्ता पाणिनि भी बहुत प्राचीन हैं।