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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

९- मन्वन्तरोंके चौदह देवताओं और सप्तर्षियोंका विवरण

चित्र १

सप्तर्षिगण और पार्वतीजी
(गीताप्रेस, गोरखपुर)


चित्र २

पार्वतीजीकी कठोर तपस्या
(गीताप्रेस, गोरखपुर)

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् मत्स्य

* अध्याय ७ *३३

सातवाँ अध्याय

मरुतोंकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें दितिकी तपस्या, मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन, कश्यपद्वारा दितिको वरदान, गर्भिणी स्त्रियोंके लिये नियम तथा मरुतोंकी उत्पत्ति

संस्कृतहिन्दी
ऋषय ऊचुः<br>दितेः पुत्राः कथं जाता मरुतो देववल्लभाः।<br>देवैर्जग्मुश्च सापत्नैः कस्मात्ते सख्यमुत्तमम्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (दैत्योंकी जननी) दितिके पुत्र उनचास मरुत देवताओंके प्रिय कैसे बन गये? तथा अपने सौतेले भाई देवताओंके साथ उनकी प्रगाढ़ मैत्री कैसे हो गयी?॥ १॥
सूत उवाच<br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु हरिणा सुरैः।<br>पुत्रपौत्रेषु शोकार्ता गत्वा भूर्लोकमप्युत्तमम्॥ २<br>स्यमन्तपञ्चके क्षेत्रे सरस्वत्यास्तटे शुभे।<br>भर्तुराराधनपरा तप उग्रं चचार ह॥ ३<br>तदा दितिर्दैत्यमाता ऋषिरूपेण सुव्रत।<br>फलाहारा तपस्तेपे कृच्छ्रं चान्द्रायणादिकम्॥ ४<br>यावद् वर्षशतं साग्रं जराशोकसमाकुला।<br>ततः सा तपसा तप्ता वसिष्ठादीनपृच्छत॥ ५<br>कथयन्तु भवन्तो मे पुत्रशोकविनाशनम्।<br>व्रतं सौभाग्यफलदमिह लोके परत्र च॥ ६<br>ऊचुर्वसिष्ठप्रमुखा मदनद्वादशीव्रतम्।<br>यस्याः प्रभावादभवत् सुतशोकविवर्जिता॥ ७**सूतजी कहते हैं—**सुव्रत मुनियो! प्राचीनकालकी बात है, देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णु तथा देवगणोंद्वारा अपने पुत्र-पौत्रोंका संहार हो जानेपर दैत्यमाता दिति शोकसे विह्वल हो गयी। वह उत्तम भूलोकमें जाकर स्यमन्तपञ्चकक्षेत्रमें सरस्वतीके मङ्गलमय तटपर अपने पतिदेव महर्षि कश्यपकी आराधनामें तत्पर रहती हुई घोर तपमें निरत हो गयी। उस समय उसने ऋषियोंके समान फलाहारपर निर्भर रहकर कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन किया। इस प्रकार बुढ़ापा और शोकसे अत्यन्त आकुल हुई दिति सौ वर्षोंतक उस कठोर तपका अनुष्ठान करती रही। तदनन्तर उस तपस्यासे सन्तप्त हुई दितिन्ने वसिष्ठ आदि महर्षियोंसे पूछा— 'ऋषियो! आप लोग मुझे ऐसा व्रत बतलाइये, जो पुत्र-शोकका विनाशक तथा इहलोक एवं परलोकमें सौभाग्यरूपी फलका प्रदाता हो।' तब वसिष्ठ आदि ऋषियोंने उसे मदनद्वादशी-व्रतका विधान बतलाया, जिसके प्रभावसे वह पुत्रशोकसे उन्मुक्त हो गयी॥ २—७॥
ऋषय ऊचुः<br>श्रोतुमिच्छामहे सूत मदनद्वादशीव्रतम्।<br>सुतानेकोनपञ्चाशद् येन लेभे दितिः पुनः॥ ८**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! जिसका अनुष्ठान करनेसे दितिको पुनः उनचास पुत्रोंकी प्राप्ति हुई, उस मदन-द्वादशीव्रतके विषयमें हमलोग भी सुनना चाहते हैं॥ ८॥
सूत उवाच<br>यद् वसिष्ठादिभिः पूर्वं दितेः कथितमुत्तमम्।<br>विस्तरेण तदेवेदं मत्सकाशात्रिबोधत॥ ९<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे द्वादश्यां नियतव्रतः।<br>स्थापयेदव्रणं कुम्भं सिततण्डुलपूरितम्॥ १०<br>नानाफलयुतं तद्वदिक्षुदण्डसमन्वितम्।<br>सितवस्त्रयुगच्छन्नं सितचन्दनचर्चितम्॥ ११<br>नानाभक्ष्यसमोपेतं सहिरण्यं तु शक्तितः।<br>ताम्रपात्रं गुडोपेतं तस्योपरि निवेशयेत्॥ १२**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें वसिष्ठ आदि महर्षियोंने दितिके प्रति जिस उत्तम मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन किया था, उसीको आपलोग मुझसे विस्तारपूर्वक सुनिये। व्रतधारीको चाहिये कि वह चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको श्वेत चावलोंसे परिपूर्ण एवं छिद्ररहित एक घट स्थापित करे। उसपर श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा हो तथा वह श्वेत वस्त्रके दो टुकड़ोंसे आच्छादित हो। उसके निकट विभिन्न प्रकारके ऋतुफल और गन्नेके टुकड़े रखे जायें। वह विविध प्रकारकी खाद्य-सामग्रीसे युक्त हो तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डाला जाय। तत्पश्चात् उसके ऊपर गुड़से भरा हुआ ताँबेका पात्र स्थापित करना चाहिये।

१०- महाराज पृथुका चरित्र और पृथ्वी-दोहनका वृत्तान्त

३४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादुपरि कामं तु कदलीदलसंस्थितम्।<br>कुर्याच्छर्करयोपेतां रतिं तस्य च वामतः ॥ १३<br>गन्धं धूपं ततो दद्याद् गीतं वाद्यं च कारयेत्।<br>तदभावे कथां कुर्यात् कामकेशवयोनरः ॥ १४<br>कामनाम्नो हरेरर्चां स्नापयेद् गन्धवारिणा।<br>शुक्लपुष्पाक्षततिलैरर्चयेन्मधुसूदनम् ॥ १५<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे सौभाग्यदाय च।<br>ऊरू स्मरायेति पुनर्मन्मथायेति वै कटिम्॥ १६<br>स्वच्छोदरायेत्युदरमनङ्गायेत्युरो हरेः।<br>मुखं पद्ममुखायेति बाहू पञ्चशराय वै॥ १७<br>नमः सर्वात्मने मौलिमर्चयेदिति केशवम्।<br>ततः प्रभाते तं कुम्भं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १८<br>ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या स्वयं च लवणादृते।<br>भुक्त्वा तु दक्षिणां दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १९<br>प्रीयतामत्र भगवान् कामरूपी जनार्दनः।<br>हृदये सर्वभूतानां य आनन्दोऽभिधीयते॥ २०उसके ऊपर केलेके पत्तेपर काम तथा उसके वाम भागमें शक्करसमन्वित रतिकी स्थापना करे। फिर गन्ध, धूप आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे और गीत, वाद्य आदिका भी प्रबन्ध करे। (अर्थाभावके कारण) गीत-वाद्य आदिका प्रबन्ध न हो सकनेपर मनुष्यको कामदेव और भगवान् विष्णुकी कथाका आयोजन करना चाहिये। पुनः कामदेव नामक भगवान् विष्णुकी अर्चना करते समय उन्हें सुगन्धित जलसे स्नान कराना चाहिये। श्वेत पुष्प, अक्षत और तिलोंद्वारा उन मधुसूदनकी विधिवत् पूजा करे। उस समय उन 'विष्णुके पैरोंमें कामदेव, जङ्घाओंमें सौभाग्यदाता, ऊरुओंमें स्मर, कटिभागमें मन्मथ, उदरमें स्वच्छोदर, वक्षःस्थलमें अनङ्ग, मुखमें पद्ममुख, बाहुओंमें पञ्चशर और मस्तकमें सर्वात्माको नमस्कार है'—यों कहकर भगवान् केशवका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। तदनन्तर प्रातःकाल वह घट ब्राह्मणको दान कर दे। पुनः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी नमकरहित भोजन करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर आनन्द नामसे कहे जाते हैं, वे कामरूपी भगवान् जनार्दन मेरे इस अनुष्ठानसे प्रसन्न हों'॥ ९—२०॥
अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत्।<br>उपवासी त्रयोदश्यामर्चयेद् विष्णुमव्ययम्॥ २१<br>फलमेकं च सम्प्राश्य द्वादश्यां भूतले स्वपेत्।<br>ततस्त्रयोदशे मासि घृतधेनुसमन्विताम्॥ २२<br>शय्यां दद्यादनङ्गाय सर्वोपस्करसंयुताम्।<br>काञ्चनं कामदेवं च शुक्लां गां च पयस्विनीम्॥ २३<br>वासोभिर्द्विजदाम्पत्यं पूज्यं शक्त्या विभूषणैः।<br>शय्यागन्धादिकं दद्यात् प्रीयतामित्युदीरयेत्॥ २४<br>होमः शुक्लतिलैः कार्यः कामनामानि कीर्तयेत्।<br>गव्येन हविषा तद्वत् पायसेन च धर्मवित्॥ २५<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्याद् वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्।<br>इक्षुदण्डानथो दद्यात् पुष्पमालाश्च शक्तितः ॥ २६इसी विधिसे प्रत्येक मासमें मदनद्वादशीव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह द्वादशीके दिन एक फल खाकर भूतलपर शयन करे और त्रयोदशीके दिन अविनाशी भगवान् विष्णुका पूजन करे। तेरहवाँ महीना आनेपर घृतधेनुसहित एवं समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न शय्या, कामदेवकी स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा और श्वेत रंगकी दुधारू गौ अनङ्ग (कामदेव)-को समर्पित करे (अर्थात् अनङ्गके उद्देश्यसे ब्राह्मणको दान दे)। उस समय शक्तिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उन्हें शय्या और सुगन्ध आदि प्रदान करते हुए ऐसा कहना चाहिये कि 'आप प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् उस धर्मज्ञ व्रतीको गोदुग्धसे बनी हुई हवि, खीर और श्वेत तिलोंसे कामदेवके नामोंका कीर्तन करते हुए हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता छोड़कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें यथाशक्ति गन्ना और पुष्पमाला प्रदानकर संतुष्ट करना चाहिये।
* अध्याय ७ *३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यः कुर्याद् विधिनानेन मदनद्वादशीमिमाम्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तः प्राप्नोति हरिसाम्यताम्॥ २७<br><br>इह लोके वरान् पुत्रान् सौभाग्यफलमश्नुते।<br>यः स्मरः संस्मृतो विष्णुरानन्दात्मा महेश्वरः॥ २८<br><br>सुखार्थी कामरूपेण स्मरेदङ्गेशमीश्वरम्।<br>एतच्छ्रुत्वा चकारासौ दितिः सर्वमशेषतः॥ २९जो इस विधिके अनुसार इस मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुकी समताको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्तकर सौभाग्य-फलका उपभोग करता है। जो स्मर, आनन्दात्मा, विष्णु और महेश्वरनामसे कहे गये हैं, उन्हीं अङ्गेश भगवान् विष्णुका सुखार्थीको स्मरण करना चाहिये। यह सुनकर दितिने सारा कार्य यथावत्-रूपसे सम्पन्न किया (अर्थात् मदनद्वादशीव्रतका अनुष्ठान किया)॥ २१—२९॥
कश्यपो व्रतमाहात्म्यादागत्य परया मुदा।<br>चकार कर्कशां भूयो रूपयौवनशालिनीम्॥ ३०<br><br>वरेणच्छन्दयामास सा तु वव्रे ततो वरम्।<br>पुत्रं शक्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्॥ ३१<br><br>वरयामि महात्मानं सर्वामरनिषूदनम्।<br>उवाच कश्यपो वाक्यमिन्द्रहन्तारमूर्जितम्॥ ३२<br><br>प्रदास्याम्यहमेवेह किंत्वेतत् क्रियतां शुभे।<br>आपस्तम्बः करोत्विष्टिं पुत्रीयामद्य सुव्रते॥ ३३<br><br>विधास्यामि ततो गर्भमिन्द्रशत्रुनिषूदनम्।<br>आपस्तम्बस्ततश्चक्रे पुत्रेष्टिं द्रविणाधिकाम्॥ ३४<br><br>इन्द्रशत्रुर्भवस्वेति जुहाव च सविस्तरम्।<br>देवा मुमुदिरे दैत्या विमुखाः स्युश्च दानवाः॥ ३५दितिके उस व्रतानुष्ठानके प्रभावसे प्रभावित होकर महर्षि कश्यप उसके निकट पधारे और परम प्रसन्नता-पूर्वक उन्होंने उसे पुनः रूप-यौवनसे सम्पन्न नवयुवती बना दिया तथा वर माँगनेको कहा। तब वर माँगनेके लिये उद्यत हुई दितिने कहा—'पतिदेव! मैं आपसे एक ऐसे पुत्रका वरदान चाहती हूँ, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ, अमित पराक्रमी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न और समस्त देवताओंका विनाशक हो।' यह सुनकर महर्षि कश्यपने उससे ऐसी बात कही—'शुभे! मैं तुम्हें अत्यन्त ऊर्जस्वी एवं इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र प्रदान करूँगा, किंतु इस विषयमें तुम यह काम करो कि आपस्तम्ब ऋषिसे प्रार्थना करके उनके द्वारा आज ही पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान कराओ। सुव्रते! यज्ञकी समाप्ति होनेपर मैं (तुम्हारे उदरमें) इन्द्ररूपी शत्रुके विनाशक पुत्रका गर्भाधान करूँगा।' तत्पश्चात् महर्षि आपस्तम्बने उस अत्यन्त खर्चीले पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस समय उन्होंने 'इन्द्रशत्रुर्भवस्व—इन्द्रका शत्रु उत्पन्न हो'—इस मन्त्रसे विस्तारपूर्वक अग्निमें आहुति दी। (इस यज्ञसे देवताओंको रुष्ट होना चाहता था, परंतु) वे यह जानकर प्रसन्न हुए कि दैत्यों और दानवोंको इस यज्ञफलसे विमुख होना पड़ेगा॥ ३०—३५॥
दित्यां गर्भमथाधत्त कश्यपः प्राह तां पुनः।<br>त्वया यत्नो विधातव्यो ह्यस्मिन् गर्भे वरानने॥ ३६<br><br>संवत्सरशतं त्वेकमस्मिन्नेव तपोवने।<br>संध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि॥ ३७<br><br>न स्थातव्यं न गन्तव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा।<br>नोपस्करेषूपविशेन्मुसलोलूखलादिषु ॥ ३८<br><br>जले च नावगाहेत शून्यागारं च वर्जयेत्।<br>वल्मीकायां न तिष्ठेत न चोद्विग्नमना भवेत्॥ ३९<br><br>विलिखेन्न नखैर्भूमिं नाङ्गारेण न भस्मना।<br>न शयालुः सदा तिष्ठेद् व्यायामं च विवर्जयेत्॥ ४०<br><br>न तुषाङ्गारभस्मास्थिकपालेषु समाविशेत्।<br>वर्जयेत् कलहं लोकैर्गात्रभङ्गं तथैव च॥ ४१(यज्ञकी समाप्तिके बाद) कश्यपने दितिके उदरमें गर्भाधान किया और पुनः उससे कहा—'वरानने! एक सौ वर्षोंतक तुम्हें इसी तपोवनमें रहना है और इस गर्भकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना है। वरवर्णिनि! गर्भिणी स्त्रीको संध्याकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। उसे न तो कभी वृक्षके मूलपर बैठना चाहिये, न उसके निकट ही जाना चाहिये। वह घरकी सामग्री मूसल, ओखली आदिपर न बैठे, जलमें घुसकर स्नान न करे, सुनसान घरमें न जाय, बिमवटपर न बैठे, मनको उद्विग्न न करे, नखसे, लुआठीसे अथवा राखसे पृथ्वीपर रेखा न खींचे, सदा नींदमें अलसायी हुई न रहे, कठिन परिश्रमका काम न करे, भूसी, लुआठी, भस्म, हड्डी और खोपड़ीपर न बैठे, लोगोंके साथ वाद-विवाद न करे
३६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
न मुक्तकेशा तिष्ठेत नाशुचिः स्यात् कदाचन।<br>न शयीतोत्तरशिरा न चापरेशिराः क्वचित् ॥ ४२<br>न वस्त्रहीना नोद्विग्ना न चार्द्रचरणा सती।<br>नामङ्गल्यां वदेद् वाचं न च हास्याधिका भवेत् ॥ ४३<br>कुर्यात्तु गुरुशुश्रूषां नित्यं माङ्गल्यतत्परा।<br>सर्वौषधीभिः कोष्णेन वारिणा स्नानमाचरेत् ॥ ४४<br>कृतरक्षा सुभूषा च वास्तुपूजनतत्परा।<br>तिष्ठेत् प्रसन्नवदना भर्तुः प्रियहिते रता ॥ ४५<br>दानशीला तृतीयायां पार्वण्यं नक्तमाचरेत्।<br>इतिवृत्ता भवेन्नारी विशेषेण तु गर्भिणी ॥ ४६<br>यस्तु तस्या भवेत् पुत्रः शीलायुर्वृद्धिसंयुतः।<br>अन्यथा गर्भपतनमवाप्नोति न संशयः ॥ ४७<br>तस्मात्त्वमनया वृत्त्या गर्भेऽस्मिन् यत्नमाचर।<br>स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि तथेत्युक्तस्तया पुनः ॥ ४८<br>पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः सा कश्यपोक्तेन विधिना समतिष्ठत ॥ ४९और शरीरको तोड़े-मरोड़े नहीं। वह बाल खोलकर न बैठे, कभी अपवित्र न रहे, उत्तर दिशामें सिरहाना करके एवं कहीं भी नीचे सिर करके न सोये, न नंगी होकर, न उद्विग्नचित्त होकर एवं न भीगे चरणोंसे ही कभी शयन करे, अमङ्गलसूचक वाणी न बोले, अधिक जोरसे हँसे नहीं, नित्य माङ्गलिक कार्योंमें तत्पर रहकर गुरुजनोंकी सेवा करे और (आयुर्वेदद्वारा गर्भिणीके स्वास्थ्यके लिये उपयुक्त बतलायी गयी) सम्पूर्ण ओषधियोंसे युक्त गुनगुने गरम जलसे स्नान करे। वह अपनी रक्षाका ध्यान रखे, स्वच्छ वेष-भूषासे युक्त रहे, वास्तु-पूजनमें तत्पर रहे, प्रसन्नमुखी होकर सदा पतिके हितमें संलग्न रहे, तृतीया तिथिको दान करे, पर्व-सम्बन्धी व्रत एवं नक्तव्रतका पालन करे। जो गर्भिणी स्त्री विशेषरूपसे इन नियमोंका पालन करती है, उसका उस गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शीलवान् एवं दीर्घायु होता है। इन नियमोंका पालन न करनेपर निस्संदेह गर्भपातकी आशङ्का बनी रहती है। प्रिये! इसलिये तुम इन नियमोंका पालन करके इस गर्भकी रक्षाका प्रयत्न करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जा रहा हूँ।' दितिके द्वारा पतिकी आज्ञा स्वीकार कर लेनेपर महर्षि कश्यप वहीं सभी जीवोंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। तब दिति महर्षि कश्यपद्वारा बताये गये नियमोंका पालन करती हुई समय व्यतीत करने लगी॥ ३६–४९॥
अथ भीतस्तथेन्द्रोऽपि दितेः पार्श्वमुपागतः।<br>विहाय देवसदनं तच्छुश्रूषुरवस्थितः ॥ ५०<br>दितिश्छिद्रान्तरप्रेप्सुरभवत् पाकशासनः।<br>विनीतोऽभवद्व्यग्रः प्रशान्तवदनो बहिः ॥ ५१<br>अजानन् किल तत्कार्यमात्मनः शुभमाचरन्।<br>ततो वर्षशतान्ते सा न्यूने तु दिवसैस्त्रिभिः ॥ ५२<br>मेने कृतार्थमात्मानं प्रीत्या विस्मितमानसा।<br>अकृत्वा पादयोः शौचं प्रसुप्ता मुक्तमूर्धजा ॥ ५३<br>निद्राभरसमाक्रान्ता दिवापरशिराः क्वचित्।<br>ततस्तदन्तरं लब्ध्वा प्रविष्टस्तु शचीपतिः ॥ ५४<br>वज्रेण सप्तधा चक्रे तं गर्भं त्रिदशाधिपः।<br>ततः सप्तैव ते जाताः कुमाराः सूर्यवर्चसः ॥ ५५<br>रुदन्तः सप्त ते बाला निषिद्धा गिरिदारिणा।<br>भूयोऽपि रुदतश्चैतानेकैकं सप्तधा हरिः ॥ ५६(इस कार्यकलापकी सूचना पानेपर) इन्द्र भयभीत हो उठे और तुरन्त देवलोकको छोड़कर दितिके निकट आ पहुँचे। वे दितिकी सेवा करनेकी इच्छासे उसके समीप ही रहने लगे। इन्द्र सदा दितिके छिद्रान्वेषणमें ही लगे रहे। ऊपरसे तो वे विनम्र, प्रशान्त और प्रसन्न मुखवाले दीखते थे, परंतु भीतरसे वे दितिके कार्योंकी कुछ परवाह न करके सदा अपने ही हित-साधनमें दत्तचित्त रहते थे। इस प्रकार सौ वर्षोंकी समाप्तिमें जब तीन दिन शेष रह गये, तब दिति प्रसन्नतापूर्वक अपनेको सफलमनोरथ मानने लगी। उस समय आश्चर्यसे युक्त मनवाली दिति नींदके आलस्यसे आक्रान्त होकर पैरोंको बिना धोये बाल खोलकर सिरको नीचे किये कहीं दिनमें ही सो गयी। तब दितिकी उस त्रुटिको पाकर शचीके प्राणपति देवराज इन्द्र उसके उदरमें प्रवेश कर गये और अपने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। उन टुकड़ोंसे सूर्यके समान तेजस्वी सात शिशु उत्पन्न हो गये। वे रोने लगे। रोते हुए उन सातों शिशुओंको

११- सूर्यवंश और चन्द्रवंशका वर्णन तथा इलाका वृत्तान्त

* अध्याय ८ *३७

| चिच्छेद वृत्रहन्ता वै पुनस्तदुदरे स्थितः।<br>एवमेकोनपञ्चाशद् भूत्वा ते रुरुदुर्भृशम्॥ ५७<br>इन्द्रो निवारयामास मा रोदिष्टः पुनः पुनः।<br>ततः स चिन्तयामास किमेतदिति वृत्रहा॥ ५८<br>धर्मस्य कस्य माहात्म्यात् पुनः सञ्जीवितास्त्वमी।<br>विदित्वा ध्यानयोगेन मदनद्वादशीफलम्॥ ५९<br>नूनमेतत् परिणतमधुना कृष्णपूजनात्।<br>वज्रेणापि हताः सन्तो न विनाशमवाप्नुयुः॥ ६०<br>एकोऽप्यनेकतामाप यस्मादुदरगोऽप्यलम्।<br>अवध्या नूनमेते वै तस्माद् देवा भवन्त्विति॥ ६१<br>यस्मान्मा रुदतेत्युक्ता रुदन्तो गर्भसंस्थिताः।<br>मरुतो नाम ते नाम्ना भवन्तु मखभागिनः॥ ६२<br>ततः प्रसाद्य देवेशः क्षमस्वेति दितिं पुनः।<br>अर्थशास्त्रं समास्थाय मयैतद् दुष्कृतं कृतम्॥ ६३<br>कृत्वा मरुद्गणं देवैः समानममराधिपः।<br>दितिं विमानमारोप्य ससुतामनयद् दिवम्॥ ६४<br>यज्ञभागभुजो जाता मरुतस्ते ततो द्विजाः।<br>न जग्मुरैक्यमसुरैरतस्ते सुरवल्लभाः॥ ६५ | इन्द्रने मना किया, (परंतु जब वे चुप नहीं हुए, तब) इन्द्रने पुनः उन रोते हुए शिशुओंमें प्रत्येकके सात-सात टुकड़े कर दिये। उस समय भी इन्द्र दितिके उदरमें ही स्थित थे। इस प्रकार वे टुकड़े उनचास शिशुओंके रूपमें परिवर्तित होकर जोर-जोरसे रुदन करने लगे। इन्द्र उन्हें बारम्बार मना करते हुए कह रहे थे कि ‘मत रोओ।’ (परंतु वे जब चुप नहीं हुए, तब) इन्द्रने मनमें विचार किया कि इसका क्या रहस्य है? किस धर्मके माहात्म्यसे ये सभी (मेरे वज्रद्वारा काटे जानेपर भी) पुनः जीवित हैं? तत्पश्चात् ध्यानयोगके द्वारा इन्द्रको ज्ञात हो गया कि यह मदनद्वादशीव्रतका फल है। अवश्य ही श्रीकृष्णके पूजनके प्रभावसे इस समय यह घटना घटी है, जो वज्रद्वारा मारे जानेपर भी ये शिशु विनाशको नहीं प्राप्त हुए। इसी कारण उदरमें स्थित रहते हुए एकसे अनेक (उनचास) हो गये। इसलिये अवश्य ही ये अवध्य हैं और (मेरी इच्छा है कि ये) देवता हो जायँ। चूँकि गर्भमें स्थित रहकर रोते हुए इनको मैंने ‘मा रुदत’—मत रोओ—ऐसा कहा है, इसलिये ये ‘मरुत्’ नामसे प्रसिद्ध होंगे और इन्हें भी यज्ञोंमें भाग मिलेगा। ऐसा कहकर इन्द्र दितिके उदरसे बाहर निकल आये और दितिको प्रसन्न करके उससे क्षमा-याचना करने लगे—‘देवि! अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर मैंने यह दुष्कर्म कर डाला है, मुझे क्षमा करो।’ इस प्रकार देवराजने मरुद्गणको देवताओंके समान बनाया और पुत्रोंसमेत दितिको विमानमें बैठाकर वे अपने साथ स्वर्गलोकको ले गये। विप्रवरो! इसी कारण मरुद्गण यज्ञोंमें भाग पानेके अधिकारी हुए। उन्होंने असुरोंके साथ एकता नहीं की; इसलिये वे देवताओंके प्रेमपात्र हो गये॥ ५०—६५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मरुदुत्पत्तौ मदनद्वादशीव्रतं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणेके आदिसर्गमें मरुद्गणकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें मदनद्वादशीव्रत-वर्णन नामक सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

प्रत्येक सर्गके अधिपतियोंका अभिषेचन तथा पृथुका राज्याभिषेक

| ऋषय ऊचुः<br>आदिसर्गश्च यः सूत कथितो विस्तरेण तु।<br>प्रतिसर्गे च ये येषामधिपास्तान् वदस्व नः॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आपने हम लोगोंके प्रति जिस आदिसर्ग और प्रतिसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उन सर्गोंमें जो जिस वर्गके अधिपति हुए, उनके विषयमें अब हमें बतलाइये॥ १॥ |

३८ * मत्स्यपुराण *

| सूत उवाच<br>यदाभिषिक्तः सकलह्याधिराज्ये<br>पृथुर्धरित्र्यामधिपो बभूव।<br>तदौषधीनामधिपं चकार<br>यज्ञव्रतानां तपसां च चन्द्रम्॥ २<br>नक्षत्रताराद्विजवृक्षगुल्म-<br>लतावितानस्य च रुक्मगर्भः।<br>अपामधीशं वरुणं धनानां<br>राज्ञां प्रभुं वैश्रवणं च तद्वत्॥ ३<br>विष्णुं रवीणामधिपं वसूना-<br>मग्निं च लोकाधिपतिश्चकार।<br>प्रजापतीनामधिपं च दक्षं<br>चकार शक्रं मरुतामधीशम्॥ ४<br>दैत्याधिपानामथ दानवानां<br>प्रह्लादमीशं च यमं पितॄणाम्।<br>पिशाचरक्षःपशुभूतयक्ष-<br>वेतालराजं त्वथ शूलपाणिम्॥ ५<br>प्रालेयशैलं च पतिं गिरिणा-<br>मीशं समुद्रं ससरिन्नदानाम्।<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार॥ ६<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमादिदेश।<br>दिशां गजानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतं¹ नामधेयम्॥ ७<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार।<br>सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>प्लक्षं पुनः सर्ववनस्पतीनाम्॥ ८<br>पितामहः पूर्वमथाभ्यषिञ्च-<br>च्चैतान्पुनः सर्वदिशाधिनाथान्।<br>पूर्वेण दिक्पालमथाभ्यषिञ्च-<br>न्नाम्नासुधर्माणमरातिकेतुम् ॥ ९<br>ततोऽधिपं दक्षिणतश्चकार<br>सर्वेश्वरं शङ्खपदाभिधानम्।<br>सुकेतुमन्तं दिशि पश्चिमायां<br>चकार पश्चाद् भुवनाण्डगर्भः॥ १०॥ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! जब महाराज पृथु समस्त भूमण्डलके अधिनायक-पदपर अभिषिक्त होकर सबके अधिपति हुए, उस समय उन हिरण्यगर्भ ब्रह्माने चन्द्रमाको ओषधि, यज्ञ, व्रत, तप, नक्षत्र, तारा, द्विज, वृक्ष, गुल्म और लतासमूहका अध्यक्ष बनाया। उन्होंने वरुणको जलका, कुबेरको धन और राजाओंका,² विष्णुको आदित्योंका, अग्निको वसुओंका अधिपति बनाया। दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुतोंका, प्रह्लादको दैत्यों और दानवोंका, यमराजको पितरोंका, शूलपाणि शिवको पिशाच, राक्षस, पशु, भूत, यक्ष और वेतालोंका, हिमालयको पर्वतोंका, समुद्रको छोटी-बड़ी नदियोंका, चित्ररथको गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंका, प्रबल पराक्रमी वासुकिको नागोंका, तक्षकको, सर्पोंका, ऐरावत नामक गजेन्द्रको दिग्गजोंका, गरुड़को पक्षियोंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका, सिंहको वन्य जीवोंका, वृषभको गौओंका और पाकड़को समस्त वनस्पतियोंका अधिनायक नियुक्त किया। फिर ब्रह्माने सर्गारम्भके समय सम्पूर्ण दिशाओंके अधिनायकोंको भी अभिषिक्त किया। उन्होंने शत्रुओंके संहारक सुधर्माको पूर्व दिशाके दिक्पाल-पदपर स्थापित किया। इसके बाद सर्वेश्वर शङ्खपदको दक्षिण दिशाका स्वामी बनाया। सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें अन्तर्भूत करनेवाले ब्रह्माने सुकेतुमान्‌को पश्चिम दिशाका अध्यक्ष बनाया॥ २—१०॥ |


१. पाठान्तर — ऐरावण । २. इसीलिये वेदादिमें कुबेरको 'राजाधिराज वैश्रवण' कहा गया है।

* अध्याय ९ *३९

| हिरण्यरोमाणमुदग्दिगीशं<br>  प्रजापतिर्देवसुतं चकार।<br>अद्यापि कुर्वन्ति दिशामधीशाः<br>  शत्रून् दहन्तस्तु भुवोऽभिरक्षाम्॥ ११॥<br>चतुर्भिरेभिः पृथुनामधेयो<br>  नृपोऽभिषिक्तः प्रथमं पृथिव्याम्।<br>गतेऽन्तरे चाक्षुषनामधेये<br>  वैवस्वताख्ये च पुनः प्रवृत्ते।<br>प्रजापतिः सोऽस्य चराचरस्य<br>  बभूव सूर्यान्वयवंशचिह्नः॥ १२॥ | प्रजापति ब्रह्माने देवपुत्र हिरण्यरोमाको उत्तर दिशाका स्वामित्व प्रदान किया। ये दिक्पालगण आज भी शत्रुओंको सन्तप्त करते हुए पृथिवीकी सब ओरसे रक्षा करते हैं। इन्हीं चारों दिक्पालोंद्वारा पहले-पहल भूतलपर पृथु नामके नरेश अभिषिक्त हुए थे। चाक्षुष-मन्वन्तरकी समाप्तिके बाद पुनः वैवस्वतमन्वन्तरके प्रारम्भ होनेपर सूर्यवंशके चिह्नस्वरूप ये राजा पृथु इस चराचर जगत्के प्रजापति हुए थे॥ ११-१२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽधिपत्याभिषेचनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें आधिपत्याभिषेचन नामक आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८॥


नवाँ अध्याय

मन्वन्तरोंके चौदह देवताओं और सप्तर्षियोंका विवरण

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार सृष्टि-सम्बन्धी वर्णन सुनकर मनुने भगवान् जनार्दनसे पुनः निवेदन किया—मधुसूदन! अब पूर्वमें उत्पन्न हुए मनुओंके चरित्रका वर्णन कीजिये॥ १॥
एवं श्रुत्वा मनुः प्राह पुनरेव जनार्दनम्।<br>पूर्वेषां चरितं ब्रूहि मनूनां मधुसूदन॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>मन्वन्तराणि राजेन्द्र मनूनां चरितं च यत्।<br>प्रमाणं चैव कालस्य तां सृष्टिं च समासतः॥ २<br>एकचित्तः प्रशान्तात्मा शृणु मार्तण्डनन्दन।<br>यामा नाम पुरा देवा आसन् स्वायम्भुवान्तरे॥ ३<br>सप्तैव ऋषयः पूर्वे ये मरीच्यादयः स्मृताः।<br>आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च सहः सवन एव च॥ ४<br>ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यो मेधा मेधातिथिर्वसुः।<br>स्वायम्भुवस्यास्य मनोर्दशैते वंशवर्धनाः॥ ५<br>प्रतिसर्गमिमे कृत्वा जग्मुर्यत् परमं पदम्।<br>एतत् स्वायम्भुवं प्रोक्तं स्वारोचिषमतः परम्॥ ६<br>स्वारोचिषस्य तनयाश्चत्वारो देववर्चसः।<br>नभोनभस्यप्रसृतिभानवः कीर्तिवर्धनाः॥ ७मत्स्यभगवान् कहने लगे—राजेन्द्र! अब मैं मन्वन्तरोंको, मनुओंके सम्पूर्ण चरित्रको, उनमें प्रत्येकके शासनकालको और उनके समयकी सृष्टिके वृत्तान्तको संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ; तुम उसे एकाग्रचित्त एवं प्रशान्त मनसे श्रवण करो। मार्तण्डनन्दन! प्राचीनकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें याम नामक देवगण थे। मरीचि (अत्रि) आदि मुनि ही सप्तर्षि थे। इन स्वायम्भुव मनुके आग्नीध्र, अग्निबाहु, सह, सवन, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, मेधा, मेधातिथि और वसु नामके दस पुत्र थे, जिनसे वंशका विस्तार हुआ। ये सभी प्रतिसर्गकी रचना करके परमपदको प्राप्त हुए। यह स्वायम्भुव-मन्वन्तरका वर्णन हुआ। अब इसके पश्चात् स्वारोचिष मनुका वृत्तान्त सुनो। स्वारोचिष मनुके नभ, नभस्य, प्रसृति और भानु—ये चार पुत्र थे, जो सभी देवताओंके सदृश वर्चस्वी और कीर्तिका विस्तार करनेवाले थे।
४०* मत्स्यपुराण *
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दत्तो निश्च्यवनः स्तम्भः प्राणः कश्यप एव च।<br>और्वो बृहस्पतिश्चैव सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥ ८<br>देवाश्च तुषिता नाम स्मृताः स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>हस्तीन्द्रः सुकृतो मूर्तिरापो ज्योतिरयः स्मयः॥ ९<br>वसिष्ठस्य सुताः सप्त ये प्रजापतयः स्मृताः।<br>द्वितीयमेतत् कथितं मन्वन्तरमतः परम्॥ १०<br>औत्तमीयं प्रवक्ष्यामि तथा मन्वन्तरं शुभम्।<br>मनुर्नामौत्तमिर्यत्र दश पुत्रानजीजनत्॥ ११<br>ईष ऊर्जश्च तर्जश्च शुचिः शुक्रस्तथैव च।<br>मधुश्च माधवश्चैव नभस्योऽथ नभास्तथा॥ १२<br>सहः कनीयानेतेषामुदारः कीर्तिवर्धनः।<br>भावनास्तत्र देवाः स्युरूर्जाः सप्तर्षयः स्मृताः॥ १३<br>कौकुरुण्डिश्च दाल्भ्यश्च शङ्खः प्रवहणः शिवः।<br>सितश्च सम्मितश्चैव सप्तैते योगवर्धनाः॥ १४इस मन्वन्तरमें दत्त, निश्च्यवन, स्तम्भ, प्राण, कश्यप, और्व और बृहस्पति—ये सप्तर्षि बतलाये गये हैं। इस स्वारोचिष-मन्वन्तरमें होनेवाले देवगण तुषित नामसे प्रसिद्ध हैं तथा महर्षि वसिष्ठके हस्तीन्द्र, सुकृत, मूर्ति, आप, ज्योति, अय और स्मय नामक सात पुत्र प्रजापति कहे गये हैं। यह द्वितीय मन्वन्तरका वर्णन हुआ। इसके अनन्तर औत्तमि नामक (तीसरे) शुभकारक मन्वन्तरका वर्णन कर रहा हूँ। इस मन्वन्तरमें औत्तमि नामक मनु हुए थे, जिन्होंने दस पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम हैं—ईष, ऊर्ज, तर्ज, शुचि, शुक्र, मधु, माधव, नभस्य, नभस तथा सह। इनमें सबसे कनिष्ठ सह परम उदार एवं कीर्तिका विस्तारक था। इस मन्वन्तरमें भावना नामक देवगण हुए तथा कौकुरुण्डि, दाल्भ्य, शङ्ख, प्रवहण, शिव, सित और सम्मित—ये सप्तर्षि कहलाये। ये सातों अत्यन्त ऊर्जस्वी और योगके प्रवर्धक थे॥२—१४॥
मन्वन्तरं चतुर्थं तु तामसं नाम विश्रुतम्।<br>कविः पृथुस्तथाग्निरकपिः कपिरेव च॥ १५<br>तथैव जल्पधीमानौ मुनयः सप्त तामसे।<br>साध्या देवगणा यत्र कथितास्तामसेऽन्तरे॥ १६<br>अकल्मषस्तथा धन्वी तपोमूलस्तपोधनः।<br>तपोरतिस्तपस्यश्च तपोद्युतिपरंतपौ॥ १७<br>तपोभोगी तपयोगी धर्माचाररताः सदा।<br>तामसस्य सुताः सर्वे दश वंशविवर्धनाः॥ १८<br>पञ्चमस्य मनोस्तद्वद् रैवतस्यान्तरं शृणु।<br>देवबाहुः सुबाहुश्च पर्जन्यः सोमपो मुनिः॥ १९<br>हिरण्यरोमा सप्ताश्वः सप्तैते ऋषयः स्मृताः।<br>देवाश्चामूर्तरजसस्तथा प्रकृतयः शुभाः॥ २०<br>अरुणस्तत्त्वदर्शी च वित्तवान् हव्यपः कपिः।<br>युक्तो निरुत्सुकः सत्त्वो निर्मोहोऽथ प्रकाशकः॥ २१<br>धर्मवीर्यबलोपेता दशैते रैवतात्मजाः।<br>भृगुः सुधामा विरजाः सहिष्णुर्नाद एव च॥ २२<br>विवस्वानतिनामा च षष्ठे सप्तर्षयोऽपरे।<br>चाक्षुषस्यान्तरे देवा लेखा नाम परिश्रुताः॥ २३चौथा मन्वन्तर तामस नामसे विख्यात है। इस तामस-मन्वन्तरमें कवि, पृथु, अग्नि, अकपि, कपि, जल्प और धीमान्—ये सात मुनि हुए तथा देवगण साध्य नामसे कहे गये। तामस मनुके अकल्मष, धन्वी, तपोमूल, तपोधन, तपोरति, तपस्य, तपोद्युति, परंतप, तपोभोगी और तपयोगी नामक दस पुत्र थे। ये सभी सदा सदाचारमें निरत रहनेवाले एवं वंशविस्तारक थे। अब पाँचवें रैवत-मन्वन्तरका वृत्तान्त सुनो। इस मन्वन्तरमें देवबाहु, सुबाहु, पर्जन्य, सोमप, मुनि, हिरण्योमा और सप्ताश्व—ये सप्तर्षि बतलाये गये हैं। देवगण अमूर्तरजा नामसे विख्यात थे और (सभी छः) प्रकृतियाँ (प्रजाएँ) सत्कर्ममें निरत रहती थीं। अरुण, तत्त्वदर्शी, वित्तवान्, हव्यप, कपि, युक्त, निरुत्सुक, सत्त्व, निर्मोह और प्रकाशक—ये दस रैवत मनुके पुत्र थे, जो सभी धर्म, पराक्रम और बलसे सम्पन्न थे। इसके पश्चात् छठे चाक्षुष-मन्वन्तरमें भृगु, सुधामा, विरजा, सहिष्णु, नाद, विवस्वान् और अतिनामा— ये सप्तर्षि थे तथा देवगण लेखनामसे प्रख्यात थे॥१५—२३॥
* अध्याय ९ *४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषभोऽथ ऋषाद्याश्च वारिमूला दिवौकसः।<br>चाक्षुषस्यान्तरे प्रोक्ता देवानां पञ्चयोनयः॥ २४<br>रुरुप्रभृतयस्तद्वच्चाक्षुषस्य सुता दश।<br>प्रोक्ताः स्वायम्भुवे वंशे ये मया पूर्वमेव तु॥ २५<br>अन्तरं चाक्षुषं चैतन्मया ते परिकीर्तितम्।<br>सप्तमं तत् प्रवक्ष्यामि यद् वैवस्वतमुच्यते॥ २६<br>अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च कश्यपो गौतमस्तथा।<br>भरद्वाजस्तथा योगी विश्वामित्रः प्रतापवान्॥ २७<br>जमदग्निश्च सप्तैते साम्प्रतं ये महर्षयः।<br>कृत्वा धर्मव्यवस्थानं प्रयान्ति परमं पदम्॥ २८<br>साध्या विश्वे च रुद्राश्च मरुतो वसवोऽश्विनौ।<br>आदित्याश्च सुरास्तद्वत् सप्त देवगणाः स्मृताः॥ २९<br>इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चास्य दश पुत्राः स्मृता भुवि।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु सप्त सप्त महर्षयः॥ ३०<br>कृत्वा धर्मव्यवस्थानं प्रयान्ति परमं पदम्।इसी प्रकार उस मन्वन्तरमें लेखा, ऋषभ, ऋषाद्य, वारिमूल और दिवौकस नामसे देवताओंकी पाँच योनियाँ बतलायी गयी हैं। पहले स्वायम्भुव मनुके वंश-वर्णनमें मैंने जैसा तुमसे कहा है, (कि स्वायम्भुव मनुके दस पुत्र थे) वैसे ही चाक्षुष मनुके भी रुरु आदि दस पुत्र थे। इस प्रकार मैंने तुम्हें चाक्षुष-मन्वन्तरका परिचय दे दिया। अब उस सातवें मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, जो (वर्तमानमें) वैवस्वत नामसे विख्यात है। इस मन्वन्तरमें अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, योगी, भरद्वाज, प्रतापी, विश्वामित्र और जमदग्नि—ये सात महर्षि इस समय भी वर्तमान हैं। ये सप्तर्षि धर्मकी व्यवस्था करके अन्तमें परमपदको प्राप्त करते हैं। वैवस्वत-मन्वन्तरमें साध्य, विश्वेदेव, रुद्र, मरुत्, वसु, अश्विनीकुमार और आदित्य—ये सात देवगण कहे जाते हैं। वैवस्वत मनुके भी इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हुए, जो भूमण्डलमें प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें सात-सात महर्षि होते हैं, जो धर्मकी व्यवस्था करके अन्तमें परमपदको चले जाते हैं॥ २४—३० १/२॥
सावर्ण्यस्य प्रवक्ष्यामि मनोर्भावि तथान्तरम्॥ ३१<br>अश्वत्थामा शरद्वांश्च कौशिको गालवस्तथा।<br>शतानन्दः काश्यपश्च रामश्च ऋषयः स्मृताः॥ ३२<br>धृतिर्वरीयान् यवसः सुवर्णो वृष्टिरेव च।<br>चरिष्णुरीड्यः सुमतिर्वसुः शुक्रश्च वीर्यवान्॥ ३३<br>भविष्या दश सावार्णेर्मनोः पुत्राः प्रकीर्तिताः।<br>रौच्यादयस्तथान्येऽपि मनवः सम्प्रकीर्तिताः॥ ३४<br>रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नाम भविष्यति।<br>मनुर्भूतिसुतस्तद्वद् भौत्यो नाम भविष्यति॥ ३५<br>ततस्तु मेरुसावर्णिर्ब्रह्मसूनुर्मनुः स्मृतः।<br>ऋतश्च ऋतधामा च विष्वक्सेनो मनुस्तथा॥ ३६<br>अतीतानागताश्चैते मनवः परिकीर्तिताः।<br>षडूर्नं युगसाहस्रमेभिर्व्याप्तं नराधिप॥ ३७<br>स्वे स्वेऽन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्य सचराचरम्।<br>कल्पक्षये विनिर्वृत्ते मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह॥ ३८<br>एते युगसहस्रान्ते विनश्यन्ति पुनः पुनः।<br>ब्रह्माद्या विष्णुसायुज्यं याता यास्यन्ति वै द्विजाः॥ ३९राजर्षे ! अब मैं भावी सावणि-मन्वन्तरका वर्णन कर रहा हूँ। इस मन्वन्तरमें अश्वत्थामा, शरद्वान्, कौशिक, गालव, शतानन्द, काश्यप और राम (परशुराम)—ये सात ऋषि बतलाये गये हैं। सावणि मनुके धृति, वरीयान्, यवस, सुवर्ण, वृष्टि, चरिष्णु, ईड्य, सुमति, वसु और पराक्रमी शुक्र—ये दस पुत्र होंगे, ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार भविष्यमें होनेवाले रौच्य आदि अन्यान्य मन्वन्तरोंका भी वर्णन किया गया है। उस समय प्रजापति रुचिका पुत्र रौच्य मनुके नामसे विख्यात होगा तथा उसी तरह भूतिका पुत्र भौत्य मनुके नामसे पुकारा जायगा। उसके बाद ब्रह्माके पुत्र मेरुसावर्णि मनु नामसे प्रसिद्ध होंगे। इनके अतिरिक्त ऋत, ऋतधामा* और विष्वक्सेन नामक तीन मनु और उत्पन्न होंगे। नरेश्वर ! इस प्रकार मैंने तुम्हें अतीत तथा भविष्यमें होनेवाले मनुओंका वृत्तान्त बतला दिया। यह भूमण्डल नौ सौ चौरानबे (९९४) (प्रायः एक सहस्र युगोंतक इन मनुओंस व्यास रहता है (अर्थात् इन १४ मनुओमें प्रत्येक मनुका कार्यकाल ७१ दिव्य (चतुर्) युगोंतक रहता है)। इस प्रकार वे सभी अपने-अपने कार्यकालमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न करके कल्पान्तके समय ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाते हैं। द्विजवरो ! इस तरह ये सभी मनु एक सहस्र युगके अन्तमें बारम्बार उत्पन्न होकर विनष्ट होते रहते हैं और ब्रह्मा आदि देवगण विष्णु-सायुज्यको प्राप्त हो जाते हैं तथा भविष्यमें भी इसी प्रकार प्राप्त करते रहेंगे॥ ३१—३९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकीर्तन नामक नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९॥


* पद्मादिपुराणोंमें ये ऋभु और वीतधामा नामसे निर्दिष्ट हैं।

१२- इलाका वृत्तान्त तथा इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन

४२ * मत्स्यपुराण *


दसवाँ अध्याय

महाराज पृथुका चरित्र और पृथ्वी-दोहनका वृत्तान्त

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
बहुभिर्धरणी भुक्ता भूपालैः श्रूयते पुरा।<br>पार्थिवाः पृथिवीयोगात् पृथिवी कस्य योगतः॥ १<br><br>किमर्थं च कृता संज्ञा भूमेः किं पारिभाषिकी।<br>गौरितीयं च विख्याता सूत कस्माद् ब्रवीहि नः॥ २सूतजी! सुना जाता है कि पूर्वकालमें बहुत-से भूपाल इस पृथ्वीका उपभोग कर चुके हैं। पृथ्वीके सम्बन्धसे ही वे 'पार्थिव' या पृथ्वीपति कहे गये हैं, परंतु भूमिको 'पृथ्वी' यह पारिभाषिक नाम किस सम्बन्धसे तथा किस कारण पड़ा एवं यह 'गौ' नामसे क्यों विख्यात हुई? इनका रहस्य हमें बतलाइये॥ १-२॥
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
वंशे स्वायम्भुवस्यासीदङ्गो नाम प्रजापतिः।<br>मृत्योस्तु दुहिता तेन परिणीता सुदुर्मुखा॥ ३<br><br>सुनीथा नाम तस्यास्तु वेनो नाम सुतः पुरा।<br>अधर्मनिरतश्चासीद् बलवान् वसुधाधिपः॥ ४<br><br>लोकेऽप्यधर्मकृज्जातः परभार्यापहारकः।<br>धर्माचारस्य सिद्ध्यर्थं जगतोऽथ महर्षिभिः॥ ५<br><br>अनुनीतोऽपि न ददावनुज्ञां स यदा ततः।<br>शापेन मारयित्वैनमराजकभयार्दिताः॥ ६<br><br>ममन्थुर्ब्राह्मणास्तस्य बलाद् देहमकल्मषाः।<br>तत्कायान्मथ्यमानात्तु निपेतुर्म्लेच्छजातयः॥ ७<br><br>शरीरे मातुरंशेन कृष्णाञ्जनसमप्रभाः।<br>पितुरंशस्य चांशेन धार्मिको धर्मचारिणः॥ ८<br><br>उत्पन्नो दक्षिणाद्धस्तात् सधनुः सशरो गदी।<br>दिव्यतेजोमयवपुः सरत्नकवचाङ्गदः॥ ९<br><br>पृथोरैवाभवद् यत्नात् ततः पृथुरजायत।<br>स विप्रैरभिषिक्तोऽपि तपः कृत्वा सुदारुणम्॥ १०<br><br>विष्णोर्वरेण सर्वस्य प्रभुत्वमगमत् पुनः।<br>निःस्वाध्यायवषट्कारं निर्धर्मं वीक्ष्य भूतलम्॥ ११ऋषियो! प्राचीनकालमें स्वायम्भुव मनुके वंशमें अङ्ग नामक एक प्रजापति हुए थे। उन्होंने मृत्युकी कन्या सुनीथाके साथ विवाह किया। सुनीथाका मुख बड़ा कुरूप था। उसके गर्भसे वेन नामक एक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ; किंतु वह सदा अधर्ममें ही निरत रहता था। परायी स्त्रियोंका अपहरण उसका नित्यका काम था। इस प्रकार वह लोकमें भी अधर्मका ही प्रचार करने लगा। तब महर्षियोंने जागतिक धर्माचरणकी सिद्धिके लिये उससे (बड़ी) अनुनय-विनय की; परंतु अन्तःकरण अशुद्ध होनेके कारण जब उसने उनकी बात न मानी (प्रजाको अभय नहीं किया), तब महर्षियोंने उसे शाप देकर मार डाला। तत्पश्चात् (शासकहीन राज्यमें) अराजकताके भयसे भीत होकर उन निष्पाप ब्राह्मणोंने बलपूर्वक वेनके शरीरका मन्थन किया। मन्थन करनेपर उसके शरीरसे शरीरस्थित माताके अंशसे म्लेच्छ जातियाँ प्रकट हुईं, जिनका रंग काले अञ्जनका-सा था। (फिर) उसके शरीरस्थित धर्मपरायण पिता (अङ्ग)-के अंशभूत दाहिने हाथसे एक धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका शरीर दिव्य तेजसे सम्पन्न था। वह रत्नजटित कवच और बाजूबंदसे विभूषित था, उसके हाथोंमें धनुष-बाण और गदा शोभा पा रहे थे। महान् प्रयत्नसे मथे जानेपर वह वेनकी पृथु (मोटी) भुजासे प्रकट हुआ था, अतः पृथु नामसे प्रसिद्ध हुआ। यद्यपि ब्राह्मणोंने उसे (पिताके राज्यपर) अभिषिक्त कर दिया था, तथापि उसने परम दारुण तपस्या करके विष्णुभगवान्‌को प्रसन्न किया और उनके वरदानके प्रभावसे (चराचर लोकको जीतकर) पुनः स्वयं भी समस्त भूमण्डलकी अध्यक्षता प्राप्त की। तदनन्तर अमित पराक्रमी पृथु भूतळको स्वाध्याय, वषट्कार और धर्मसे विहीन देखकर
  • अध्याय १० * | ४३ --- | ---:

| दग्धुमेवोद्यतः कोपाच्छरेणामितविक्रमः।<br>ततो गोरूपमास्थाय भूः पलायितुमुद्यता ॥ १२<br><br>पृष्ठतोऽनुगतस्तस्याः पृथुर्दीप्तशरासनः।<br>ततः स्थित्वैकदेशे तु किं करोमीति चाब्रवीत् ॥ १३<br><br>पृथुरप्यवदद् वाक्यमीप्सितं देहि सुव्रते।<br>सर्वस्य जगतः शीघ्रं स्थावरस्य चरस्य च ॥ १४<br><br>तथैव साब्रवीद् भूमिर्दुदोह स नराधिपः।<br>स्वके पाणौ पृथुर्वत्सं कृत्वा स्वायम्भुवं मनुम् ॥ १५<br><br>तदन्नमभवच्छुद्धं प्रजा जीवन्ति येन वै।<br>ततस्तु ऋषिभिर्दुग्धा वत्सः सोमस्तदाभवत् ॥ १६<br><br>दोग्धा बृहस्पतिर्भूत् पात्रं वेदस्तपो रसः।<br>देवैश्च वसुधा दुग्धा दोग्धा मित्रस्तदाभवत् ॥ १७<br><br>इन्द्रो वत्सः समभवत् क्षीरमूर्जस्करं बलम्।<br>देवानां काञ्चनं पात्रं पितॄणां राजतं तथा ॥ १८<br><br>अन्तकश्चाभवद् दोग्धा यमो वत्सः स्वधा रसः।<br>अलाबुपात्रं नागानां तक्षको वत्सकोऽभवत् ॥ १९<br><br>विषं क्षीरं ततो दोग्धा धृतराष्ट्रोऽभवत् पुनः।<br>असुरैरपि दुग्धेयमायसे शक्रपीडिनीम् ॥ २०<br><br>पात्रे मायामभूद् वत्सः प्रह्लादिस्तु विरोचनः।<br>दोग्धा द्विमूर्धा तत्रासीन्माया येन प्रवर्तिता ॥ २१<br><br>यक्षैश्च वसुधा दुग्धा पुरान्तर्धानमीप्सुभिः।<br>कृत्वा वैश्रवणं वत्समामपात्रे महीपते ॥ २२<br><br>प्रेतरक्षोगणैर्दुग्धा धारारुधिरमुल्बणम्।<br>रौप्यनाभोऽभवद् दोग्धा सुमाली वत्स एव तु ॥ २३<br><br>गन्धर्वैश्च पुरा दुग्धा वसुधा साप्सरोगणैः।<br>वत्सं चैत्ररथं कृत्वा गन्धान् पद्मदले तथा ॥ २४ | क्रुद्ध हो उठे और धनुषपर बाण चढ़ाकर उसे भस्म कर देनेके लिये उद्यत हो गये। यह देखकर भूमि (भयभीत होकर) गौका रूप धारणकर भाग चली। इधर प्रचण्ड धनुर्धर पृथु भी उसके पीछे दौड़ पड़े। (इस प्रकार पृथुको पीछा करते देख वह गौरूपा भूमि हताश होकर) एक स्थानपर खड़ी हो गयी और बोली '(नाथ! आपकी प्रसन्नताके लिये) मैं क्या करूँ?' तब पृथुने ऐसी बात कही—'सुव्रते! तुम शीघ्र ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को मनोवाञ्छित वस्तुएँ प्रदान करो।' यह सुनकर पृथ्वी बोली—'अच्छा, ऐसा ही होगा।' (इस प्रकार पृथ्वीकी अनुमति जानकर) उन नरेश्वर पृथुने स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बनाकर अपनी हथेलीमें गौरूपी पृथ्वीका दोहन किया। वह दुहा हुआ पदार्थ शुद्ध अन्न हुआ, जिससे प्रजाका जीवन-निर्वाह होता है॥ ३—१५ १/२॥<br><br>(फिर क्या था? अब तो दोहनकी शृङ्खला ही चल पड़ी) पुनः ऋषियोंने भी उस पृथ्वीको दुहा। उस समय चन्द्रमा बछड़ा, दुहनेवाले महर्षि बृहस्पति, पात्र वेद और दुहा गया पदार्थ तप हुआ। देवताओंने भी पृथ्वीका दोहन किया। उस समय दुहनेवाले मित्र (देवता), इन्द्र बछड़ा तथा क्षीर (दुहा गया रस) ऊर्जस्वी बल हुआ। उस दोहनमें देवताओंका पात्र स्वर्णमय था। अन्तकने भी पृथ्वीका दोहन किया, उसमें यमराज बछड़ा बने और स्वधा रस था। पितरोंका पात्र रजतमय था। नागोंके दोहनमें नागराज धृतराष्ट्र दुहनेवाले, नागराज तक्षक बछड़ा, पात्र तुम्बी और क्षीर—दुहा हुआ पदार्थ—विष था। असुरोंद्वारा भी इस पृथ्वीका दोहन किया गया था। उन्होंने लौहमय पात्रमें इन्द्रको पीड़ित करनेवाली मायाको दुहा। उस कार्यमें प्रह्लाद-पुत्र विरोचन बछड़ा और मायाका प्रवर्तक द्विमूर्धा दुहनेवाला था। महीपते! यक्षोंको अन्तर्धान-विद्याकी अभिलाषा थी, अतः उन्होंने कुबेरको बछड़ा बनाकर कच्चे पात्रमें पृथ्वीका दोहन किया था। प्रेतों और राक्षसोंनें पृथ्वीसे भयंकर रुधिरकी धाराका दोहन किया। उसमें रौप्यनाभ नामक प्रेत दुहनेवाला और सुमाली नामक प्रेत बछड़ा बना था। अप्सराओंके साथ गन्धर्वोंने भी पूर्वकालमें चैत्ररथको बछड़ा बनाकर कमलके पत्तेमें पृथ्वीसे सुगन्धोंका दोहन किया था; |

४४ * मत्स्यपुराण *

| दोग्धा वररुचिर्नाम नाट्यवेदह्रास्य पारगः।<br>गिरिभिर्वसुधा दुग्धा रत्नानि विविधानि च॥ २५<br>औषधानि च दिव्यानि दोग्धा मेरुर्महाचलः।<br>वत्सोऽभूद्धिमवांस्तत्र पात्रं शैलमयं पुनः॥ २६<br>वृक्षैश्च वसुधा दुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम्।<br>पालाशपात्रे दोग्धा तु शालः पुष्पलताकुलः॥ २७<br>प्लक्षोऽभवत्ततो वत्सः सर्ववृक्षधनाधिपः।<br>एवमन्यैश्च वसुधा तदा दुग्धा यथेप्सितम्॥ २८<br>आयुर्धनानि सौख्यं च पृथौ राज्यं प्रशासति।<br>न दरिद्रस्तदा कश्चिन्न रोगी न च पापकृत्॥ २९<br>नोपसर्गभयं किञ्चित् पृथौ राजनि शासति।<br>नित्यं प्रमुदिता लोका दुःखशोकविवर्जिताः॥ ३०<br>धनुष्कोट्या च शैलेन्द्रानुत्सार्य स महाबलः।<br>भुवस्तलं समं चक्रे लोकानां हितकाम्यया॥ ३१<br>न पुरग्रामदुर्गाणि न चायुधधरा नराः।<br>क्षयातिशयदुःखं च नार्थशास्त्रस्य चादरः॥ ३२<br>धर्मैकवासना लोकाः पृथौ राज्यं प्रशासति।<br>कथितानि च पात्राणि यत् क्षीरं च मया तव॥ ३३<br>येषां यत्र रुचिस्तत्तद् देयं तेभ्यो विजानता।<br>यज्ञश्राद्धेषु सर्वेषु मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ३४<br>दुहितृत्वं गता यस्मात् पृथोर्धर्मवतो मही।<br>तदानुरागयोगाच्च पृथिवी विश्रुता बुधैः॥ ३५ | उस कार्यमें नाट्य-वेदका पारगामी विद्वान् वररुचि नामक गन्धर्व दुहनेवाला था। पर्वतोंने पृथ्वीसे अनेक प्रकारके रत्नों और दिव्य ओषधियोंका दोहन किया। उसमें महाचल सुमेरु दुहनेवाला, हिमवान् बछड़ा और पात्र शैलमय था। वृक्षोंने पृथ्वीसे पलाशपत्रके पात्रमें (टहनी आदिके) कटनेके बाद पुनः उगनेवाला दूध दुहा। उस समय पुष्प और लताओंसे लदा हुआ शालवृक्ष दुहनेवाला था और समृद्धिशाली एवं सर्ववृक्षमय पाकड़का वृक्ष बछड़ा बना था। इसी प्रकार अन्यान्य वर्गके प्राणियोंने भी उस समय अपने-अपने इच्छानुसार पृथ्वीका दोहन किया था॥ १६—२८॥<br>महाराज पृथुके राज्यमें प्रजा दीर्घायु, धन-धान्य एवं सुख-समृद्धिसे सम्पन्न थी। उस समय न कोई दरिद्र था, न रोगी और न कोई पाप-कर्म ही करता था। महाराज पृथुके शासनकालमें किसी उपसर्ग (आधिदैविक एवं आधिभौतिक उपद्रव)-का भय नहीं था। लोग दुःख-शोकसे रहित होकर सदा सुखमय जीवनयापन करते थे। उन महाबली पृथुने प्रजाओंकी हितकामनासे प्रेरित होकर अपने धनुषकी कोटिसे बड़े-बड़े पर्वतोंको उखाड़कर पृथ्वीके धरातलको समतल कर दिया था। पृथुके राज्यकालमें न तो पुर, ग्राम और दुर्ग थे, न मनुष्य अस्त्र-शस्त्र धारण करते थे। (उस समय आत्मरक्षाके लिये इनकी कोई आवश्यकता न थी।) रोगोंका सर्वथा अभाव था। क्षय-विनाश एवं सातिशयता—परस्परकी विषमताका दुःख* उन्हें नहीं देखना पड़ता था। प्रजाओंमें अर्थशास्त्रके प्रति आदर नहीं था, अर्थात् लोभका चिह्नमात्र भी नहीं था। उनमें एकमात्र धर्मकी ही वासना थी। ऋषियो! इस प्रकार मैंने आपसे पृथ्वीके दोहनपात्रोंका तथा जैसा-जैसा दूध दुहा गया था, उसका भी वर्णन किया। उनमें जिस वर्गके प्राणियोंकी जिस पदार्थकी प्राप्तिकी रुचि हो, उसे वही पदार्थ यज्ञों और श्राद्धोंमें अर्पित करना चाहिये। इस प्रकार यह पृथ्वी-दोहनका प्रसङ्ग मैंने तुम्हें सुना दिया। यतः पृथ्वी धर्मात्मा पृथुकी कन्या बन चुकी थी, अतः पृथुके अतिशय अनुरागके कारण विद्वानोंद्वारा 'पृथ्वी' नामसे कही जाने लगी॥२९—३५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वैन्याभिवर्णनो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वैन्याभिवर्णन नामक दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०॥


* इसे विस्तारसे समझनेके लिये योगवासिष्ठ १।१।३०—४० देखना चाहिये।

* अध्याय ११ * | ४५


ग्यारहवाँ अध्याय

सूर्यवंश और चन्द्रवंशका वर्णन तथा इलाका वृत्तान्त

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>आदित्यवंशमखिलं वद सूत यथाक्रमम्।<br>सोमवंशं च तत्त्वज्ञ यथावद् वक्तुमर्हसि॥ १**ऋषियोंने पूछा—**तत्त्वज्ञ सूतजी! अब आप हम लोगोंसे सम्पूर्ण सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका क्रमशः यथार्थ-रूपसे वर्णन कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>विवस्वान् कश्यपात् पूर्वमदित्यामभवत् सुतः।<br>तस्य पत्नीत्रयं तद्वत् संज्ञा राज्ञी प्रभा तथा॥ २**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें महर्षि कश्यपसे अदितिको विवस्वान् (सूर्य) पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उनकी संज्ञा, राज्ञी तथा प्रभा नामकी तीन पत्नियाँ थीं।
रेवतस्य सुता राज्ञी रैवतं सुषुवे सुतम्।<br>प्रभा प्रभातं सुषुवे त्वाष्ट्री संज्ञा तथा मनुम्॥ ३इनमें रेवतकी कन्या राज्ञीने रैवत नामक पुत्रको तथा प्रभाने प्रभात नामक पुत्रको उत्पन्न किया। संज्ञा त्वाष्ट्र (विश्वकर्मा)-की पुत्री थी। उसने वैवस्वत मनु और यम नामक दो पुत्र एवं यमुना नामकी एक कन्याको उत्पन्न किया।
यमश्च यमुना चैव यमलौ तु बभूवतुः।<br>ततस्तेजोमयं रूपमसहन्ती विवस्वतः॥ ४इनमें यम और यमुना जुड़वे पैदा हुए थे।* कुछ समयके पश्चात् जब सुन्दरी त्वाष्ट्री (संज्ञा) विवस्वान्‌के तेजोमय रूपको सहन न कर सकी,
नारीमुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम्।<br>त्वाष्ट्री स्वरूपरूपेण नाम्ना छायेति भामिनी॥ ५तब उसने अपने शरीरसे अपने ही रूपके समान एक अनिन्द्यसुन्दरी नारीको उत्पन्न किया। वह 'छाया' नामसे प्रसिद्ध हुई।
पुरतः संस्थितां दृष्ट्वा संज्ञा तां प्रत्यभाषत।<br>छाये त्वं भज भर्तारमस्मदीयं वरानने॥ ६उस छायाको अपने सामने खड़ी देखकर संज्ञाने उससे कहा—'वरानने छाये! तुम हमारे पतिदेवकी सेवा करना,
अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय।<br>तथेत्युक्त्वा च सा देवमगात् कामाय सुव्रता॥ ७साथ ही मेरी संतानोंका माताके समान स्नेहसे पालन-पोषण करना।' तब 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'—कहकर वह सुव्रता पतिकी सेवाभावनासे विवस्वान्‌देवके निकट गयी।
कामयामास देवोऽपि संज्ञेयमिति चादरात्।<br>जनयामास तस्यां तु पुत्रं च मनुरूपिणम्॥ ८इधर विवस्वान्‌देव भी 'यह संज्ञा ही है'—ऐसा समझकर छायाके साथ आदरपूर्वक पूर्ववत् व्यवहार करते रहे। यथासमय उन्होंने उसके गर्भसे मनुके समान रूपवाले एक पुत्रको उत्पन्न किया।
सवर्णत्वाच्च सावर्णिर्मनोर्वैवस्वतस्य च।<br>ततः शनिं च तपतीं विष्टिं चैव क्रमेण तु॥ ९ये वैवस्वत मनुके सवर्ण (रूप-रंगवाला) होनेके कारण 'सावर्णि' नामसे प्रसिद्ध हुए।
छायायां जनयामास संज्ञेयमिति भास्करः।<br>छाया स्वपुत्रेऽभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तथा॥ १०तदुपरांत सूर्यने 'यह संज्ञा ही है'—ऐसा मानकर छायाके गर्भसे क्रमशः एक शनि नामका पुत्र और तपती एवं विष्टि नामकी दो कन्याओंको भी उत्पन्न किया। छाया अपने पुत्र मनुके प्रति अन्य संतानोंसे अधिक स्नेह रखती थी।
पूर्वो मनुस्तु चक्षाम न यमः क्रोधमूर्च्छितः।<br>संतर्जयामास तदा पादमुद्यम्य दक्षिणम्॥ ११उसके इस व्यवहारको संज्ञा-नन्दन मनु तो सहन कर लेते थे, परंतु यम (एक दिन सहन न होनेके कारण) क्रुद्ध हो उठे और अपने दाहिने पैरको उठाकर छायाको मारनेकी धमकी देने लगे।
शशाप च यमं छाया भक्षितः कृमिसंयुतः।<br>पादोऽयमेको भविता पूयशोणितविस्रवः॥ १२तब छायाने यमको शाप देते हुए कहा—'तुम्हारे इस एक पैरको कीड़े काट खायेंगे और इससे पीब एवं

* इसका मूल ऋक् ० १०। १७। १-२ में 'त्वष्टा दुहित्रे...............यमस्य माता...............कृत्वी सवर्णा' आदिमें है।

१३- पितृ-वंश-वर्णन तथा सतीके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें देवीके एक सौ आठ नामोंका विवरण

४६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निवेदयामास पितुर्यमः शापादमर्शितः।<br>निष्कारणमहं शप्तो मात्रा देव सकोपया॥ १३<br><br>बालभावान्मया किंचिदुद्यतश्चरणः सकृत्।<br>मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद् विभो॥ १४<br><br>प्रायो न माता सास्माकं शापेनाहं यतो हतः।<br>देवोऽप्याह यमं भूयः किं करोमि महामते॥ १५<br><br>मौर्ख्यात् कस्य न दुःखं स्यादथवा कर्मसंततिः।<br>अनिवार्या भवस्यापि का कथान्येषु जन्तुषु॥ १६<br><br>कृकवाकुर्मया दत्तो यः कृमीन् भक्षयिष्यति।<br>क्लेदं च रुधिरं चैव वत्सायमपनेष्यति॥ १७रुधिर टपकता रहेगा।' इस शापको सुनकर अमर्षसे भरे हुए यम पिताके पास जाकर निवेदन करते हुए बोले—'देव! क्रुद्ध हुई माताने मुझे अकारण ही शाप दे दिया है। विभो! बालचापुल्यके कारण मैंने एक बार अपना दाहिना पैर कुछ ऊपर उठा दिया था, (इस तुच्छ अपराधपर) भाई मनुके मना करनेपर भी उसने मुझे ऐसा शाप दे दिया है। चूँकि इसने हमपर शापद्वारा प्रहार किया है, इसलिये यह हम लोगोंकी माता नहीं प्रतीत होती (अपितु बनावटी माता है)।' यह सुनकर विवस्वान्देवने पुनः यमसे कहा—'महाबुद्धे! मैं क्या करूँ? अपनी मूर्खताके कारण किसको दुःख नहीं भोगना पड़ता। अथवा (जन्मान्तरीय शुभाशुभ) कर्मपरम्पराका फलभोग अनिवार्य है। यह नियम तो शिवजीपर भी लागू है, फिर अन्य प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है। इसलिये बेटा! मैं तुम्हें यह एक मुर्गा (या मोर) दे रहा हूँ, जो पैरमें पड़े हुए कीड़ोंको खा जायगा और उससे निकलते हुए मज्जा (पीब) एवं खूनको भी दूर कर देगा'॥ २—१७॥
एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीव्रं महायशाः।<br>गोकर्णतीर्थे वैराग्यात् फलपत्रानिलाशनः॥ १८<br><br>आराधयन् महादेवं यावद् वर्षायुतायुतम्।<br>वरं प्रदान्महादेवः संतुष्टः शूलभृत् तदा॥ १९<br><br>वव्रे स लोकपालत्वं पितृलोके नृपालयम्।<br>धर्माधर्मात्मकस्यापि जगतस्तु परीक्षणम्॥ २०<br><br>एवं स लोकपालत्वमगमच्छूलपाणिनः।<br>पितॄणां चाधिपत्यं च धर्माधर्मस्य चानघ॥ २१पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महायशस्वी यमके मनमें विराग उत्पन्न हो गया। वे गोकर्णतीर्थमें जाकर फल, पत्ता और वायुका आहार करते हुए कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये। इस प्रकार वे बीस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करते रहे। कुछ समयके पश्चात् त्रिशूलधारी महादेव उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर प्रकट हुए। तब यमने उनसे वररूपमें लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और जगत्‌के धर्म-अधर्मका निर्णायक पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। महादेवजीने उन्हें सभी वरदान दे दिये। निष्पाप शौनक! इस प्रकार यमको शूलपाणि भगवान् शंकरसे लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और धर्माधर्मके निर्णायक पदकी प्राप्ति हुई है।
विवस्वानथ तज्ज्ञात्वा संज्ञायाः कर्मचेष्टितम्।<br>त्वष्टुः समीपमगमदाचचक्षे च रोषवान्॥ २२<br><br>तमुवाच ततस्त्वष्टा सांत्वपूर्वं द्विजोत्तमाः।<br>तवासहन्ती भगवन् महस्तीव्रं तमोनुदम्॥ २३<br><br>वडवारूपमास्थाय मत्सकाशमिहागता।<br>निवारिता मया सा तु त्वया चैव दिवाकर॥ २४<br><br>यस्मादविज्ञाततया मत्सकाशमिहागता।<br>तस्मान्मदीयं भवनं प्रवेष्टुं न त्वमर्हसि॥ २५<br><br>एवमुक्ता जगामाथ मरुदेशमनिन्दिता।<br>वडवारूपमास्थाय भूतले सम्प्रतिष्ठिता॥ २६इधर विवस्वान् संज्ञाकी उस कर्मचेष्टाको जानकर त्वष्टा (विश्वकर्मा)के निकट गये और क्रुद्ध होकर उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाये। द्विजवरो! तब त्वष्टाने सान्त्वनापूर्वक विवस्वान्‌से कहा—'भगवन्! अन्धकारका विनाश करनेवाले आपके प्रचण्ड तेजको न सहन करनेके कारण संज्ञा घोड़ीका रूप धारण करके यहाँ मेरे समीप अवश्य आयी थी, परंतु दिवाकर! मैंने उसे यह कहते हुए (घरमें घुसनेसे) मना कर दिया—'चूँकि तू अपने पतिदेवकी जानकारीके बिना छिपकर यहाँ मेरे पास आयी है, इसलिये मेरे भवनमें प्रवेश नहीं कर सकती।' इस प्रकार मेरे निषेध करनेपर आपके और मेरे—दोनों स्थानोंसे निराश होकर वह अनिन्दिता संज्ञा मरुदेशको चली गयी और वहाँ उसी घोड़ी-रूपसे ही भूतलपर स्थित है।
* अध्याय ११ *४७
तस्मात् प्रसादं कुरु मे यद्यनुग्रहभागहम्।<br>अपनेष्यामि ते तेजो यन्त्रे कृत्वा दिवाकर॥ २७<br>रूपं तव करिष्यामि लोकानन्दकरं प्रभो।<br>तथेत्युक्तः स रविणा भ्रमौ कृत्वा दिवाकरम्॥ २८<br>पृथक् चकार तत्तेजश्चक्रं विष्णोरकल्पयत्।<br>त्रिशूलं चापि रुद्रस्य वज्रमिन्द्रस्य चाधिकम्॥ २९<br>दैत्यदानवसंहर्तुः सहस्रकिरणात्मकम्।<br>रूपं चाप्रतिमं चक्रे त्वष्टा पद्भ्यामृते महत्॥ ३०<br>न शशाकाथ तद् द्रष्टुं पादरूपं रवेः पुनः।<br>अर्चास्वपि ततः पादौ न कश्चित् कारयेत् क्वचित्॥ ३१<br>यः करोति स पापिष्ठां गतिमाप्नोति निन्दिताम्।<br>कुष्ठरोगमवाप्नोति लोकेऽस्मिन् दुःखसंयुतः॥ ३२<br>तस्माच्च धर्मकामार्थी चित्रेष्वायतनेषु च।<br>न क्वचित् कारयेत् पादौ देवदेवस्य धीमतः॥ ३३इसलिये 'दिवाकर! यदि मैं आपका अनुग्रह-भाजन हूँ तो आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये (और मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये)। प्रभो! मैं आपके इस असह्य तेजको (खरादनेवाले) यन्त्रपर चढ़ाकर कुछ कम कर दूँगा। इस प्रकार आपके रूपको लोगोंके लिये आनन्ददायक बना दूँगा।' सूर्यद्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लिये जानेपर त्वष्टाने सूर्यको अपने (खराद) यन्त्रपर बैठाकर उनके कुछ तेजको छाँटकर अलग कर दिया। उस छाँटे हुए तेजसे उन्होंने विष्णुके सुदर्शनचक्रका, भगवान् रुद्रके त्रिशूलका और दैत्यों एवं दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्रके वज्रका निर्माण किया। इस प्रकार त्वष्टाने पैरोंके अतिरिक्त सूर्यके सहस्र किरणोंवाले रूपको अनुपम सौन्दर्यशाली बना दिया। उस समय वे सूर्यके पैरोंके तेजको देखनेमें समर्थ न हो सके (इसलिये वह तेज ज्यों-का-त्यों बना ही रह गया)। अतः अर्चा-विग्रहोंमें भी कोई सूर्यके चरणोंका निर्माण नहीं (करता-) कराता। यदि कोई वैसा करता है तो उसे (मरनेपर) अत्यन्त निन्दित पापिष्ठ गति प्राप्त होती है तथा इस लोकमें वह दुःख भोगता हुआ कुष्ठरोगी हो जाता है। इसलिये धर्मात्मा मनुष्यको चित्रों एवं मन्दिरोंमें कहीं भी बुद्धिमान् देवदेवेश्वर सूर्यके पैरोंको नहीं (बनाना-) बनवाना चाहिये॥ १८-३३॥
ततः स भगवान् गत्वा भूर्लोकंममराधिपः।<br>कामयामास कामार्तो मुख एव दिवाकरः॥ ३४<br>अश्वरूपेण महता तेजसा च समावृतः।<br>संज्ञा च मनसा क्षोभमगमद् भयविह्वला॥ ३५<br>नासापुटाभ्यामुत्सृष्टं परोऽयमिति शङ्कया।<br>तद्रेतस्तत्ततो जातावश्विनाविति निश्चितम्॥ ३६<br>दस्रौ सुतत्वात् संजातौ नासत्यौ नासिकाग्रतः।<br>ज्ञात्वा चिराच्च तं देवं सन्तोषमगमत् परम्।<br>विमानेनागमत् स्वर्गं पत्या सह मुदान्विता॥ ३७<br>सावर्णिऽपि मनुर्मेरावद्याप्यास्ते तपोधनः।<br>शनिस्तपोबलादाप ग्रहसाम्यं ततः पुनः॥ ३८<br>यमुना तपती चैव पुनर्नद्यौ बभूवतुः।<br>विष्टिर्घोरात्मिका तद्वत् कालत्वेन व्यवस्थिता॥ ३९<br>मनोर्वैवस्वतस्यासन् दश पुत्रा महाबलाः।<br>इलस्तु प्रथमस्तेषां पुत्रेष्ट्यां समजायत॥ ४०त्वष्टाद्वारा संज्ञाका पता बतला दिये जानेपर वे देवेश्वर भगवान् सूर्य भूलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उनके द्वारा संज्ञासे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई—यह एकदम तथ्य बात है। संज्ञाकी नासिकाके अग्रभागसे उत्पन्न होनेके कारण वे दोनों नासत्य और दस्र नामसे भी विख्यात हुए। कुछ दिनोंके पश्चात् अश्वरूपधारी सूर्यदेवको पहचानकर त्वाष्ट्री (संज्ञा) परम सन्तुष्ट हुई और हर्षपूर्ण चित्तसे पतिके साथ विमानपर बैठकर स्वर्गलोक (आकाश)-को चली गयी। (छायाकी संतानोंमें) तपोधन सावर्ण मनु आज भी सुमेरुगिरिपर विराजमान हैं। शनिने अपनी तपस्याके प्रभावसे ग्रहोंकी समता प्राप्त की। बहुत दिनोंके बाद यमुना और तपती—ये दोनों कन्याएँ नदीरूपमें परिणत हो गयीं। उसी प्रकार भयंकर रूपवाली तीसरी कन्या विष्टि (भद्रा) काल (करण)-रूपमें अवस्थित हुई। वैवस्वत मनुके दस महाबली पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनमें इल ज्येष्ठ थे, जो पुत्रेष्टि-यज्ञके फलस्वरूप पैदा हुए थे।
४८* मत्स्यपुराण *
Sanskrit ShlokaHindi Translation
इक्ष्वाकुः कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ट एव च।<br>नरिष्यन्तः करूषश्च शर्यातिश्च महाबलः।<br>पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुषाः॥ ४१<br>अभिषिच्य मनुः पुत्रमिलं ज्येष्ठं स धार्मिकः।<br>जगाम तपसे भूयः स महेन्द्रवनालयम्॥ ४२<br>अथ दिग्विजयसिद्धयर्थमिलः प्रायान्महीमिमाम्।<br>भ्रमन् द्वीपानि सर्वाणि क्ष्माभृतः सम्प्रधर्षयन्॥ ४३<br>जगामोपवनं शम्भोरश्वाकृष्टः प्रतापवान्।<br>कल्पद्रुमलताकीर्णं नाम्ना शरवणं महत्॥ ४४<br>रमते यत्र देवेशः शम्भुः सोमार्धशेखरः।<br>उमया समयस्तत्र पुरा शरवणे कृतः॥ ४५<br>पुन्नाम सत्त्वं यत्किञ्चिदागमिष्यति ते वने।<br>स्त्रीत्वमेष्यति तत् सर्वं दशयोजनमण्डले॥ ४६<br>अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणे पुरा।<br>स्त्रीत्वमाप विशन्नेव वडवात्वं ह्यस्तदा॥ ४७शेष नौ पुत्रोंके नाम हैं—इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, धृष्ट नरिष्यन्त, करूष, शर्याति, पृषध्र और नाभाग। ये सब-के-सब महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं दिव्य पुरुष थे। वृद्धावस्था आनेपर परम धर्मात्मा महाराज मनु अपने ज्येष्ठ पुत्र इलको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं तपस्या करनेके लिये महेन्द्रपर्वतके वनमें चले गये। तदनन्तर नये भूपाल इल दिग्विजय करनेकी इच्छासे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगे। वे भूपालोंको पराजित करते हुए सभी द्वीपोंमें घूम रहे थे। इसी बीच प्रतापी इल घोड़ा दौड़ाते हुए शिवजीके उपवनके निकट जा पहुँचे। यह महान् उपवन कल्पद्रुम और लताओंसे भरा हुआ 'शरवण' नामसे प्रसिद्ध था। उस उपवनमें चन्द्रार्धको ललाटमें धारण करनेवाले देवेश्वर शम्भु उमाके साथ क्रीडा करते हैं। उन्होंने इस शरवणके विषयमें पहले ही उमाके साथ यह समय (शर्त) निर्धारित कर दिया था कि 'तुम्हारे इस दस योजन विस्तारवाले वनमें जो कोई भी पुरुषवाचक जीव प्रवेश करेगा, वह स्त्रीत्वको प्राप्त हो जायगा।' राजा इलको पहलेसे इस 'समय' (शर्त)के विषयमें जानकारी नहीं थी, अतः वे स्वच्छन्दगतिसे शरवणमें प्रविष्ट हुए। प्रवेश करते ही वे स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये। उसी समय वह घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें परिवर्तित हो गया। इलके शरीरसे सारा पुरुषत्व नष्ट हो गया। इस प्रकार स्त्री-रूप हो जानेपर राजाको परम विस्मय हुआ॥ ३४—४७ १/२॥
पुरुषत्वं हृतं सर्वं स्त्रीरूपे विस्मितो नृपः।<br>इलेति साभवन्नारी पीनोन्नतघनस्तनी॥ ४८<br>उन्नतश्रोणिजघना पद्मपत्रायतेक्षणा।<br>पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासोल्लासितेक्षणा॥ ४९<br>मूलोन्नतायतभुजा नीलकुञ्चितमूर्धजा।<br>तनुलोमा सुदशना मृदुगम्भीरभाषिणी॥ ५०<br>श्यामगौरेण वर्णेन हंसवारणगामिनी।<br>कार्मुकभ्रूयुगोपेता तनुताम्रनखाङ्कुरा॥ ५१<br>भ्रमन्ती च वने तस्मिंश्चिन्तयामास भामिनी।<br>को मे पिताथवा भ्राता का मे माता भवेदिह॥ ५२<br>कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद वत्स्यामि भूतले।<br>चिन्तयन्तीति ददृशे सोमपुत्रेण साङ्गना॥ ५३<br>इलारूपसमाक्षिप्तमनसा वरवर्णिनीम्।<br>बुधस्तदासये यत्नमकरोत् कामपीडितः॥ ५४वह नारी इला नामसे प्रख्यात हुई। उसका रूप बड़ा सुन्दर था। उसके नेत्र कमलदलके समान बड़े-बड़े थे। उसके मुखकी कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश थी। उसका शरीर हलका था। उसके नेत्र चकित-से दीख रहे थे। उसके बाहुमूल उन्नत और भुजाएँ लम्बी थीं तथा बाल नीले एवं घुँघराले थे। उसके शरीरके रोएँ सूक्ष्म और दाँत अत्यन्त मनोहर थे। वह मृदु और गम्भीर स्वरसे बोलनेवाली थी। उसके शरीरका रंग श्याम-गौरमिश्रित था। वह हंस और हस्तीकी-सी चालसे चल रही थी। उसकी दोनों भौंहें धनुषके आकारके सदृश थीं। वह छोटे एवं ताँबेके समान लाल नखाङ्कुरोंसे विभूषित थी। इस प्रकार वह सुन्दरी 'नारी' उस वनमें भ्रमण करती हुई सोचने लगी कि 'इस घोर वनमें कौन मेरा पिता अथवा भाई है तथा कौन मेरी माता है। मैं किस पतिके हाथमें समर्पित की गयी हूँ अर्थात् कौन मेरा पति है! इस भूतलपर मुझे कितने दिनोंतक रहना पड़ेगा!' इस प्रकार वह चिन्तन कर ही रही थी कि इसी बीच सोम-पुत्र बुधने उसे देख लिया और वे उसे प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करने लगे।
* अध्याय ११ *४९
विशिष्टाकारवान् दण्डी सकमण्डलुपुस्तकः।<br>वेणुदण्डकृतावेशः पवित्रकखनित्रकः॥ ५५<br><br>द्विज्यरूपः शिखी ब्रह्म निगदन् कर्णकुण्डलः।<br>वटुभिश्चान्वितो युक्तैः समित्पुष्पकुशोदकैः॥ ५६<br><br>किलान्विषन् वने तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम्।<br>बहिर्वनस्यान्तरितः किल पादपमण्डले॥ ५७उस समय बुधने एक विशिष्ट वेष-भूषावाले दण्डीका रूप धारण कर लिया। उनके हाथोंमें कमण्डलु और पुस्तक शोभा पा रहे थे। उन्होंने बाँसके डंडेमें अनेकों पवित्र वस्तुओंको बाँध रखा था। वे ब्रह्मचारी-वेषमें लम्बी-मोटी शिखा धारण किये हुए थे। समिधा, पुष्प, कुश और जल लिये हुए वटुकोंके साथ वे वेदका पाठ कर रहे थे। वे अपनेको ऐसा प्रकट कर रहे थे मानो उस वनमें किसी वस्तुकी खोज कर रहे हों। इस प्रकार उस वनके बहिर्भागमें वृक्षसमूहोंके झुरमुटमें बैठकर वे उस इलाको बुलाने लगे।
ससम्भ्रममकस्मात् तां सोपालम्भमिवावदत्।<br>त्यक्त्वाग्निहोत्रशुश्रूषां क्व गता मन्दिरान्मम॥ ५८<br><br>इयं विहारवेला ते ह्यतिक्रामति साम्प्रतम्।<br>एहोहि पृथुसुश्रोणि सम्भ्रान्ता केन हेतुना॥ ५९<br><br>इयं सायंतनी वेला विहारस्येह वर्तते।<br>कृत्वोपलेपनं पुष्पैरलङ्कुरु गृहं मम॥ ६०<br><br>सा त्वब्रवीद् विस्मृताहं सर्वमेतत् तपोधन।<br>आत्मानं त्वां च भर्तारं कुलं च वद मेऽनघ॥ ६१इलाके निकट आनेपर वे अकस्मात् चकपकाये हुएकी भाँति उलाहना देते हुए उससे बोले—'सुन्दरि! अग्निहोत्र आदि सेवा-शुश्रूषाका परित्याग करके तुम मेरे घरसे कहाँ चली आयी हो?'<br>यह सुनकर इलाने कहा—'तपोधन! मैं अपनेको, आपको, पतिको और कुलको—इन सभीको भूल गयी हूँ, अतः निष्पाप! आप अपने और मेरे कुलका परिचय दीजिये।'
बुधः प्रोवाच तां तन्वीमिला त्वं वरवर्णिनि।<br>अहं च कामुको नाम बहुविद्यो बुधः स्मृतः॥ ६२<br><br>तेजस्विनः कुले जातः पिता मे ब्राह्मणाधिपः।<br>इति सा तस्य वचनात् प्रविष्टा बुधमन्दिरम्॥ ६३इलाके इस प्रकार पूछनेपर बुधने उस सुन्दरीसे कहा—'वरवर्णिनि! तुम इला हो और मैं बहुत-सी विद्याओंका ज्ञाता बुध नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं तेजस्वी कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और मेरे पिता ब्राह्मणोंके अधिपति हैं।' बुधके इस कथनपर विश्वास करके इला बुधके उस भवनमें प्रविष्ट हुई, जिसमें रत्नोंके खम्भे लगे थे तथा जिसका निर्माण दिव्य मायाके द्वारा हुआ था।
रत्नस्तम्भसमायुक्तं दिव्यमायाविनिर्मितम्।<br>इला कृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनस्थिता॥ ६४<br><br>अहो वृत्तमहो रूपमहो धनमहो कुलम्।<br>मम चास्य च मे भर्तुरहो लावण्यमुत्तमम्॥ ६५<br><br>रेमे च सा तेन सममतिकालमिला ततः।<br>सर्वभोगमये गेहे यथेन्द्रभवने तथा॥ ६६उस भवनमें पहुँचकर इला अपनेको कृतार्थ मानने लगी। (वह कहने लगी—) 'कैसा सुन्दर चरित्र है! कैसा अद्भुत रूप है! कितना प्रचुर धन है! कैसा ऊँचा कुल है तथा मेरा और मेरे पतिदेवका कैसा अनुपम सौन्दर्य है!' तदनन्तर वह इला बुधके साथ बहुत समयतक उस सम्पूर्ण भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न घरमें उसी प्रकार सुखसे रहने लगी, जैसे इन्द्रभवनमें हो॥ ४८—६६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे इलाबुधसङ्गमो नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इला-बुध-सम्बन्ध नामक ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११॥

१४- अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार

५० * मत्स्यपुराण *


बारहवाँ अध्याय

इलाका वृत्तान्त तथा इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन

सूत उवाच
अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः।<br>इक्ष्वाकुप्रमुखा जग्मुस्तदा शरवणान्तिकम्॥ १<br><br>ततस्ते ददृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।<br>रत्नपर्याणकिरणदीप्तकायामनुत्तमाम् ॥ २<br><br>पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मयमागताः।<br>अयं चन्द्रप्रभो नाम वाजी तस्य महात्मनः॥ ३<br><br>अगमद् वडवारूपमुत्तमं केन हेतुना।<br>ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रच्छुस्ते पुरोधसम्॥ ४<br><br>किमित्येतदभूच्चित्रं वद योगविदां वर।<br>वसिष्ठश्चाब्रवीत् सर्वं दृष्ट्वा तद् ध्यानचक्षुषा॥ ५<br><br>समयः शम्भुदयिताकृतः शरवणे पुरा।<br>यः पुमान् प्रविशेदत्र स नारीत्वमवाप्स्यति॥ ६<br><br>अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद् राज्ञा सहैव तु।<br>पुनः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः॥ ७<br><br>तथैव यत्नः कर्तव्यश्चाराध्यैव पिनाकिनम्।<br>ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः॥ ८<br><br>तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ।<br>तावूचतुरलङ्घ्योऽयं समयः किंतु साम्प्रतम्॥ ९<br><br>इक्ष्वाकोरश्वमेधेन यत् फलं स्यात् तदावयोः।<br>दत्त्वा किम्पुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम्॥ १०<br><br>तथेत्युक्तास्ततस्ते तु जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः।<br>इक्ष्वाकोश्चाश्वमेधेन चेलः किम्पुरुषोऽभवत्॥ ११**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (बहुत दिनोंतक राजा इलके राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर) उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्न)-का अन्वेषण करते हुए उसी शरवणके निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभागमें खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ीको देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीनकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। तत्पश्चात् जीनको पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये (और परस्पर कहने लगे—) 'अरे! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इलका चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है! किस कारण यह सुन्दर घोड़ीके रूपमें परिणत हो गया!' तब वे सभी लौटकर अपने कुल-पुरोहित महर्षि वसिष्ठके पास जाकर पूछने लगे—'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई? इसका रहस्य हमें बताइये।' तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टिद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर इक्ष्वाकु आदिसे बोले—'राजपुत्रो! पूर्वकालमें शम्भु-पत्नी उमाने इस शरवणके विषयमें ऐसा समय (शर्त) निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवणमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री-रूपमें परिवर्तित हो जायगा।' इसी कारण राजा इलके साथ-ही-साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्वको प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेरकी भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगोंको पिनाकधारी शंकरकी आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठकी आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वरका स्तवन किया। (उस स्तवनसे प्रसन्न होकर) पार्वती और परमेश्वरने कहा—'राजकुमारो! यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, तथापि इस समय उसके निवारणके लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकुद्वारा किये गये अश्वमेध-यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा-का-सारा हम दोनोंको समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर) हो जायेंगे।' यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'—यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानीको लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकुने अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य-फल पार्वती-परमेश्वरको अर्पित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष हो गये।