मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४२ * मत्स्यपुराण *
दसवाँ अध्याय
महाराज पृथुका चरित्र और पृथ्वी-दोहनका वृत्तान्त
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
|---|---|
| बहुभिर्धरणी भुक्ता भूपालैः श्रूयते पुरा।<br>पार्थिवाः पृथिवीयोगात् पृथिवी कस्य योगतः॥ १<br><br>किमर्थं च कृता संज्ञा भूमेः किं पारिभाषिकी।<br>गौरितीयं च विख्याता सूत कस्माद् ब्रवीहि नः॥ २ | सूतजी! सुना जाता है कि पूर्वकालमें बहुत-से भूपाल इस पृथ्वीका उपभोग कर चुके हैं। पृथ्वीके सम्बन्धसे ही वे 'पार्थिव' या पृथ्वीपति कहे गये हैं, परंतु भूमिको 'पृथ्वी' यह पारिभाषिक नाम किस सम्बन्धसे तथा किस कारण पड़ा एवं यह 'गौ' नामसे क्यों विख्यात हुई? इनका रहस्य हमें बतलाइये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
| वंशे स्वायम्भुवस्यासीदङ्गो नाम प्रजापतिः।<br>मृत्योस्तु दुहिता तेन परिणीता सुदुर्मुखा॥ ३<br><br>सुनीथा नाम तस्यास्तु वेनो नाम सुतः पुरा।<br>अधर्मनिरतश्चासीद् बलवान् वसुधाधिपः॥ ४<br><br>लोकेऽप्यधर्मकृज्जातः परभार्यापहारकः।<br>धर्माचारस्य सिद्ध्यर्थं जगतोऽथ महर्षिभिः॥ ५<br><br>अनुनीतोऽपि न ददावनुज्ञां स यदा ततः।<br>शापेन मारयित्वैनमराजकभयार्दिताः॥ ६<br><br>ममन्थुर्ब्राह्मणास्तस्य बलाद् देहमकल्मषाः।<br>तत्कायान्मथ्यमानात्तु निपेतुर्म्लेच्छजातयः॥ ७<br><br>शरीरे मातुरंशेन कृष्णाञ्जनसमप्रभाः।<br>पितुरंशस्य चांशेन धार्मिको धर्मचारिणः॥ ८<br><br>उत्पन्नो दक्षिणाद्धस्तात् सधनुः सशरो गदी।<br>दिव्यतेजोमयवपुः सरत्नकवचाङ्गदः॥ ९<br><br>पृथोरैवाभवद् यत्नात् ततः पृथुरजायत।<br>स विप्रैरभिषिक्तोऽपि तपः कृत्वा सुदारुणम्॥ १०<br><br>विष्णोर्वरेण सर्वस्य प्रभुत्वमगमत् पुनः।<br>निःस्वाध्यायवषट्कारं निर्धर्मं वीक्ष्य भूतलम्॥ ११ | ऋषियो! प्राचीनकालमें स्वायम्भुव मनुके वंशमें अङ्ग नामक एक प्रजापति हुए थे। उन्होंने मृत्युकी कन्या सुनीथाके साथ विवाह किया। सुनीथाका मुख बड़ा कुरूप था। उसके गर्भसे वेन नामक एक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ; किंतु वह सदा अधर्ममें ही निरत रहता था। परायी स्त्रियोंका अपहरण उसका नित्यका काम था। इस प्रकार वह लोकमें भी अधर्मका ही प्रचार करने लगा। तब महर्षियोंने जागतिक धर्माचरणकी सिद्धिके लिये उससे (बड़ी) अनुनय-विनय की; परंतु अन्तःकरण अशुद्ध होनेके कारण जब उसने उनकी बात न मानी (प्रजाको अभय नहीं किया), तब महर्षियोंने उसे शाप देकर मार डाला। तत्पश्चात् (शासकहीन राज्यमें) अराजकताके भयसे भीत होकर उन निष्पाप ब्राह्मणोंने बलपूर्वक वेनके शरीरका मन्थन किया। मन्थन करनेपर उसके शरीरसे शरीरस्थित माताके अंशसे म्लेच्छ जातियाँ प्रकट हुईं, जिनका रंग काले अञ्जनका-सा था। (फिर) उसके शरीरस्थित धर्मपरायण पिता (अङ्ग)-के अंशभूत दाहिने हाथसे एक धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका शरीर दिव्य तेजसे सम्पन्न था। वह रत्नजटित कवच और बाजूबंदसे विभूषित था, उसके हाथोंमें धनुष-बाण और गदा शोभा पा रहे थे। महान् प्रयत्नसे मथे जानेपर वह वेनकी पृथु (मोटी) भुजासे प्रकट हुआ था, अतः पृथु नामसे प्रसिद्ध हुआ। यद्यपि ब्राह्मणोंने उसे (पिताके राज्यपर) अभिषिक्त कर दिया था, तथापि उसने परम दारुण तपस्या करके विष्णुभगवान्को प्रसन्न किया और उनके वरदानके प्रभावसे (चराचर लोकको जीतकर) पुनः स्वयं भी समस्त भूमण्डलकी अध्यक्षता प्राप्त की। तदनन्तर अमित पराक्रमी पृथु भूतळको स्वाध्याय, वषट्कार और धर्मसे विहीन देखकर |